BNSS के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, बोला- पुलिस कमिश्नरों को मिली मजिस्ट्रेट की शक्तियों का हो रहा गलत इस्तेमाल
उत्तर प्रदेश में नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मिली प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत की शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने प्रयागराज और गाजियाबाद जैसे जिलों में पुलिस कमिश्नरों को दी गई मजिस्ट्रेट वाली शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे “चौंकाने वाली स्थिति” बताया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि शांति भंग की आशंका मात्र के आधार पर लोगों को कई दिनों तक जेल भेजना कानून की भावना के खिलाफ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एहतियाती कार्रवाई का उद्देश्य अपराध रोकना है, न कि किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के हिरासत में रखना।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस राशि की वसूली जिम्मेदार अधिकारी से की जाए और उसके खिलाफ विभागीय जांच कराई जाए।
क्या था पूरा मामला
मामला प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता मंसूर अहमद ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) दाखिल की थी।
याचिका के अनुसार, 19 मार्च की रात करीब 12 बजकर 50 मिनट पर पुलिसकर्मी जबरन उनके घर पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गए। परिवार वालों द्वारा पूछे जाने के बावजूद पुलिस ने हिरासत में लेने का स्पष्ट कारण नहीं बताया।
याचिकाकर्ता की पत्नी ने पुलिस कार्रवाई का विरोध किया तो आरोप है कि उन्हें भी धक्का देकर अलग कर दिया गया। इसके बाद मंसूर अहमद को हिरासत में रखा गया।
करीब आठ दिन बाद 27 मार्च को उन्हें रिहा किया गया। यह रिहाई उस समय हुई जब उनकी पत्नी की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की जा चुकी थी।
पुलिस ने क्या दलील दी
राज्य सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि याचिकाकर्ता ने ग्रामीणों के साथ गाली-गलौज की थी, जिससे क्षेत्र में शांति भंग होने की आशंका पैदा हुई।
पुलिस ने कार्रवाई को BNSS की धाराओं के तहत उचित बताते हुए कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाया गया था।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि हिरासत में लेने के बाद याचिकाकर्ता को सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के सामने पेश किया गया। चूंकि वह उस समय जमानत के लिए आवश्यक व्यक्तिगत बॉन्ड प्रस्तुत नहीं कर सके, इसलिए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
बाद में 27 मार्च को व्यक्तिगत बॉन्ड देने के बाद उन्हें रिहा किया गया।
हाईकोर्ट ने पकड़ी बड़ी कानूनी गलती
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच की तो उसे एक महत्वपूर्ण कमी नजर आई।
अदालत ने पाया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं था जिससे यह साबित हो कि 19 मार्च को ACP के सामने पेश किए जाने के समय याचिकाकर्ता ने शांति बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत बॉन्ड देने से इनकार किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एक प्रिंटेड फॉर्म पर आदेश लिख देना पर्याप्त नहीं है। कानून के तहत अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होता है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का उचित अवसर मिले।
अदालत ने कहा कि यदि व्यक्ति 19 मार्च को बॉन्ड नहीं दे पाया था तो अगली तारीख 20 मार्च रखी जानी चाहिए थी ताकि उसे बॉन्ड देने का मौका मिल सके।
इसके बजाय उसे सीधे आठ दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, जो कानून के प्रावधानों के विपरीत था।
पुलिस कमिश्नरों की शक्तियों पर सवाल
हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान जब अन्य मामलों की जानकारी मांगी तो एहतियाती हिरासत के इस्तेमाल से जुड़े कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए।
अदालत ने कहा कि पुलिस कमिश्नरों को मजिस्ट्रेट की शक्तियां कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दी गई हैं, लेकिन इन शक्तियों का उपयोग सावधानी और जिम्मेदारी से होना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रयागराज कमिश्नरेट में ऐसी शक्तियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जो चिंता का विषय है।
प्रयागराज में हजारों लोगों को हिरासत
चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज कमिश्नरेट में वर्ष 2025 के दौरान BNSS के प्रिवेंटिव डिटेंशन प्रावधानों के तहत बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया।
रिपोर्ट में बताया गया कि 1321 लोगों को एहतियाती कार्रवाई के नाम पर हिरासत में रखा गया और कई मामलों में हिरासत की अवधि काफी लंबी रही।
वर्ष 2026 में भी अब तक सैकड़ों लोगों को इसी प्रकार हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों से पता चलता है कि कानून में दी गई शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझकर नहीं किया जा रहा।
गाजियाबाद के मामलों पर भी चिंता
हाईकोर्ट ने गाजियाबाद कमिश्नरेट के आंकड़ों की भी समीक्षा की।
रिकॉर्ड के अनुसार, मई 2025 से अप्रैल 2026 के बीच बड़ी संख्या में लोगों को एक से 17 दिनों तक हिरासत में रखा गया।
अदालत ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना संविधान द्वारा दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है।
₹25 हजार प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा
हाईकोर्ट ने अवैध हिरासत को गंभीर मानते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को बिना कानूनी आधार के 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है तो राज्य को मुआवजा देना होगा।
अदालत ने मुआवजे का आधार 25 हजार रुपये प्रतिदिन तय किया।
चूंकि याचिकाकर्ता को आठ दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया था, इसलिए अदालत ने कुल 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
यह राशि छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने को कहा गया है।
अधिकारी से वसूली जाएगी रकम
अदालत ने केवल मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया बल्कि जिम्मेदारी भी तय की।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि संबंधित दोषी ACP के वेतन से वसूली जाए।
इसके अलावा अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने का आदेश भी दिया गया है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा जरूरी
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की शक्ति राज्य को जरूर दी गई है, लेकिन यह शक्ति कानून के अनुसार और उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही इस्तेमाल की जा सकती है।
एहतियाती हिरासत का उद्देश्य अपराध होने से पहले खतरे को रोकना है, लेकिन इसका इस्तेमाल सजा देने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी मूल सिद्धांत को मजबूत करती है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं में रहकर करना होगा।
अदालत का संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को पुलिस प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी माना जा रहा है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता से मनमाना खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।
BNSS जैसे नए कानूनों के तहत अधिकारियों को मिली शक्तियां जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल की जानी चाहिए। यदि उनका दुरुपयोग होता है तो न केवल हिरासत अवैध घोषित हो सकती है बल्कि संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।