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POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: दोषी से शादी के बाद रद्द हुई 10 साल की सजा

POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: दोषी से शादी के बाद रद्द हुई 10 साल की सजा, लेकिन अदालत ने कहा- यह आदेश विशेष परिस्थितियों तक सीमित

      सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज यानी POCSO एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने यह फैसला उस विशेष परिस्थिति में दिया, जहां पीड़िता ने बालिग होने के बाद उसी व्यक्ति से शादी कर ली, जिसके खिलाफ उसने पहले यौन अपराध का मुकदमा दर्ज कराया था।

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ में न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर शामिल थे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है। इसे भविष्य के अन्य मामलों में सामान्य नियम या उदाहरण के तौर पर नहीं माना जाएगा।

क्या था पूरा मामला

मामला उस समय का है जब पीड़िता स्कूल में पढ़ाई कर रही थी। वह 12वीं कक्षा की छात्रा थी और आरोपी के साथ उसके संबंध थे। दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की बात सामने आई थी।

पीड़िता ने आरोपी से शादी करने की इच्छा जताई, लेकिन आरोपी ने उस समय शादी से इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से मना कर दिया।

चूंकि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए पुलिस ने आरोपी के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। जांच के बाद आरोपी को गिरफ्तार किया गया और मामला अदालत पहुंचा।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 10 साल की सजा

निचली अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी को POCSO एक्ट की धारा 5(1) और धारा 6 के तहत दोषी पाया। अदालत ने उसे गंभीर अपराध का दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी।

POCSO एक्ट में नाबालिग बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए कठोर प्रावधान बनाए गए हैं। इस कानून के तहत बच्चे की सहमति को भी वैध सहमति नहीं माना जाता, क्योंकि कानून नाबालिग को विशेष संरक्षण देता है।

सजा के बाद आरोपी जेल गया, लेकिन बाद में उसे जमानत मिल गई।

परिस्थितियों में आया बड़ा बदलाव

मामले में आगे एक अलग मोड़ आया। पीड़िता ने किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ली। लेकिन कुछ समय बाद उसके पति को उसके पुराने संबंध के बारे में जानकारी हुई, जिसके बाद पति ने उसे छोड़ दिया।

इसके बाद महिला अपने पिता के साथ रहने लगी। इसी दौरान POCSO मामले में सजा पाए व्यक्ति से उसकी दोबारा बातचीत शुरू हुई।

दोनों के बीच पुराने विवाद खत्म हुए और उन्होंने आपसी सहमति से शादी कर ली। इसके बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रहने लगे।

महिला ने अदालत में कहा कि अब वह अपने पति के साथ रह रही है और पुराने मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उसने पति की सजा खत्म करने की मांग की।

मद्रास हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

पीड़िता ने पहले मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने पति की सजा को रद्द करने की मांग की थी।

उसका कहना था कि अब दोनों के बीच समझौता हो चुका है और वे वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। इसलिए आपराधिक कार्रवाई समाप्त कर दी जाए।

हालांकि हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 का सहारा लिया। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह किसी लंबित मामले में “पूर्ण न्याय” करने के लिए आवश्यक आदेश जारी कर सके।

पीठ ने कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। पीड़िता अब बालिग है और उसने अपनी इच्छा से आरोपी से विवाह किया है। दोनों साथ रह रहे हैं और सामाजिक रूप से पति-पत्नी के रूप में जीवन जी रहे हैं।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पीड़िता को मुआवजे की राशि भी मिल चुकी है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बालिग होने के बाद आरोपी से विवाह करने और दोनों के साथ रहने की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि विशेष तथ्यों के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का इस्तेमाल करना उचित होगा।

इसके बाद आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया और उसे मामले से बरी कर दिया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि दोनों अब समाज में पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं।

फैसले का महत्व

यह फैसला कानूनी क्षेत्र में चर्चा का विषय बना है, क्योंकि POCSO एक्ट बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों पर कठोर कार्रवाई हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कानून के उद्देश्य और मामले की वर्तमान परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर POCSO मामले में आरोपी और पीड़िता के बीच शादी होने पर सजा खत्म कर दी जाएगी।

POCSO कानून और सहमति का सवाल

POCSO एक्ट के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ यौन संबंध अपराध माना जाता है। कानून में यह माना जाता है कि नाबालिग व्यक्ति किसी भी प्रकार की यौन सहमति देने की स्थिति में नहीं होता।

इसी कारण ऐसे मामलों में अदालतें आमतौर पर केवल समझौते या बाद में हुए विवाह के आधार पर मुकदमे खत्म नहीं करतीं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अलग परिस्थिति को देखते हुए अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग किया।

न्याय और सामाजिक वास्तविकता के बीच संतुलन

कई आपराधिक मामलों में अदालतों के सामने यह चुनौती होती है कि कानून के उद्देश्य को बनाए रखते हुए मामले की वास्तविक परिस्थितियों को कैसे देखा जाए।

इस मामले में पीड़िता और आरोपी के बीच बाद में विवाह हो गया और दोनों ने साथ रहने का फैसला किया। अदालत ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया।

हालांकि कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और यह निर्णय केवल इसी मामले तक सीमित रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह दिखाता है कि न्यायालय कानून के साथ-साथ मामले की वास्तविक स्थिति और न्याय के व्यापक उद्देश्य को भी ध्यान में रखता है। :::