कानपुर में फर्जी डिग्री बनाने वाले गिरोह का पर्दाफाश: हाईस्कूल से पीएचडी तक के नकली प्रमाणपत्र तैयार, विदेशों तक फैले तार
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पुलिस ने शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देने वाले एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा करने का दावा किया है। पुलिस ने फर्जी अंकपत्र, डिग्री और शैक्षणिक प्रमाणपत्र तैयार करने वाले एक हाईटेक गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के लिए चिंता की बात यह है कि इस गिरोह के तार केवल देश के अलग-अलग राज्यों तक ही सीमित नहीं बल्कि विदेशों तक जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है।
पुलिस के मुताबिक यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और बेहद शातिर तरीके से असली जैसे दिखने वाले नकली दस्तावेज तैयार कर रहा था। आरोपियों ने इसके लिए रिहायशी इलाके में ही एक ऐसा सेटअप तैयार कर रखा था, जहां से कंप्यूटर, प्रिंटर और अन्य आधुनिक तकनीक की मदद से फर्जी प्रमाणपत्र बनाए जा रहे थे।
छापेमारी के दौरान पुलिस को बड़ी संख्या में नकली दस्तावेज बनाने की सामग्री मिली है। बरामद सामान से यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि गिरोह का नेटवर्क काफी बड़ा था और कई वर्षों से यह अवैध कारोबार चल रहा था।
किदवई नगर और बेकनगंज में हुई कार्रवाई
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई कानपुर के किदवई नगर और बेकनगंज क्षेत्र में की गई। मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने एक रिहायशी इमारत में छापा मारा।
छापेमारी के दौरान पुलिस को वहां एक हाईटेक अवैध प्रिंटिंग सेटअप मिला। मौके पर कंप्यूटर सिस्टम, प्रिंटर और दस्तावेज तैयार करने से जुड़ी कई चीजें बरामद हुईं।
पुलिस का कहना है कि आरोपी सामान्य प्रिंटिंग के नाम पर यह काम नहीं कर रहे थे, बल्कि पूरी योजना के साथ विश्वविद्यालयों और बोर्डों के नाम से ऐसे प्रमाणपत्र तैयार करते थे, जिन्हें पहली नजर में पहचानना आसान नहीं होता था।
गिरोह का कथित सरगना और उसके भाई गिरफ्तार
पुलिस ने इस मामले में कथित मुख्य आरोपी जिया-उल-हसन उर्फ समीर उर्फ आतिफ को गिरफ्तार किया है। उसकी उम्र करीब 32 वर्ष बताई गई है। वह कानपुर के हीरामन पुरवा का रहने वाला है और वर्तमान में चमनगंज क्षेत्र में रह रहा था।
उसके साथ उसके तीन भाइयों को भी गिरफ्तार किया गया है। इनमें हसन आसिफ, आमिर अहमद और नूरुद्दीन शामिल हैं।
पुलिस जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस गिरोह में और कितने लोग शामिल थे और नकली प्रमाणपत्र तैयार कराने वाले ग्राहक कहां-कहां मौजूद हैं।
हाईस्कूल से पीएचडी तक की डिग्री बनाने का आरोप
जांच में सामने आया है कि आरोपी केवल सामान्य अंकपत्र नहीं बनाते थे, बल्कि हाईस्कूल से लेकर पीएचडी स्तर तक की फर्जी शैक्षणिक डिग्रियां तैयार करने का काम करते थे।
इन दस्तावेजों का इस्तेमाल नौकरी, विदेश जाने, दाखिले और अन्य सरकारी तथा निजी कामों के लिए किए जाने की आशंका है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार कुछ नकली प्रमाणपत्र इतने बेहतर तरीके से तैयार किए गए थे कि पहली नजर में वे असली दस्तावेज जैसे दिखाई देते थे।
कई मामलों में प्रिंटिंग और डिजाइन की गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि सामान्य जांच में इन्हें पकड़ना मुश्किल हो सकता था।
छापेमारी में मिली बड़ी मात्रा में सामग्री
पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में सामान बरामद किया है। इसमें दो लैपटॉप, एक डेस्कटॉप कंप्यूटर, कलर प्रिंटर, सीपीयू, तीन हार्ड डिस्क और वाई-फाई राउटर शामिल हैं।
इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों के नाम वाले 141 रबर स्टांप, होलोग्राम स्ट्रिप, होलोग्राम बनाने की सामग्री, डाई, पंच मशीन और करीब 830 खाली मार्कशीट भी मिली हैं।
पुलिस ने कई नकली प्रमाणपत्र और डिग्रियां भी बरामद की हैं, जिनकी जांच की जा रही है।
बरामद सामग्री से यह संकेत मिलता है कि आरोपी केवल कुछ दस्तावेज नहीं बना रहे थे बल्कि बड़े स्तर पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने का नेटवर्क चला रहे थे।
आठ विश्वविद्यालयों के नाम का इस्तेमाल
पुलिस जांच में प्रारंभिक तौर पर सामने आया है कि गिरोह कई विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के नाम से नकली दस्तावेज तैयार कर रहा था।
इनमें अन्नामलाई विश्वविद्यालय, लिंगायाज विद्यापीठ, कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी, उस्मानिया यूनिवर्सिटी, डीवाई पाटिल विद्यापीठ, अलगप्पा यूनिवर्सिटी, आचार्य नागार्जुन यूनिवर्सिटी और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के नाम शामिल बताए गए हैं।
हालांकि पुलिस अभी यह जांच कर रही है कि कितने लोगों को ऐसे प्रमाणपत्र उपलब्ध कराए गए और कितने दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जा चुका है।
10 से 15 हजार रुपये में तैयार होते थे प्रमाणपत्र
पुलिस अधिकारियों के अनुसार गिरोह फर्जी अंकपत्र और प्रमाणपत्र बनाने के बदले मोटी रकम वसूलता था।
प्रारंभिक जांच में पता चला है कि एक नकली प्रमाणपत्र के लिए 10 हजार से 15 हजार रुपये तक लिए जाते थे।
डिमांड के हिसाब से प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे। कुछ लोगों को केवल अंकपत्र चाहिए होते थे तो कुछ लोग पूरी डिग्री और वेरिफिकेशन सिस्टम तक की मांग करते थे।
फर्जी ऑनलाइन वेरिफिकेशन सिस्टम भी बनाया
गिरोह की कार्यप्रणाली ने जांच अधिकारियों को भी चौंका दिया है। आरोप है कि आरोपी केवल कागजी दस्तावेज ही नहीं बनाते थे, बल्कि फर्जी ऑनलाइन वेरिफिकेशन सिस्टम भी तैयार करते थे।
इससे जब कोई व्यक्ति प्रमाणपत्र की ऑनलाइन जांच करता था तो उसे दस्तावेज असली दिखाई देता था।
पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि यह तकनीकी काम कौन करता था और क्या गिरोह में साइबर विशेषज्ञ भी शामिल थे।
कनाडा तक जुड़े तार
जांच के दौरान पुलिस को इस गिरोह के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की जानकारी भी मिली है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार मुख्य आरोपी जिया-उल-हसन के संपर्क कनाडा में रहने वाले दो लोगों से थे। आरोप है कि वह उन्हें नकली दस्तावेजों की पीडीएफ और डिजाइन फाइलें भेजता था।
इन दस्तावेजों का इस्तेमाल विदेशों में नौकरी या अन्य उद्देश्यों के लिए किए जाने की आशंका जताई गई है।
अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि विदेशों में कितने लोगों ने इन फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।
शिक्षा व्यवस्था और सुरक्षा पर बड़ा सवाल
फर्जी डिग्री और अंकपत्र का कारोबार केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है।
किसी व्यक्ति की योग्यता का आधार उसकी वास्तविक शिक्षा होती है। अगर नकली दस्तावेजों के जरिए कोई व्यक्ति नौकरी या किसी महत्वपूर्ण पद तक पहुंच जाता है तो इसका नुकसान योग्य उम्मीदवारों को होता है।
ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी मानी जाती है ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति शिक्षा संबंधी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ करने की हिम्मत न कर सके।
अन्य आरोपियों की तलाश जारी
पुलिस ने गिरफ्तार चारों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अब जांच टीम गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की तलाश कर रही है।
पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस नेटवर्क ने अब तक कितने फर्जी प्रमाणपत्र बनाए, किन लोगों को दिए और किन संस्थानों में उनका इस्तेमाल हुआ।
कानपुर में सामने आया यह मामला एक बड़े नेटवर्क की ओर संकेत कर रहा है। आने वाले दिनों में जांच आगे बढ़ने के साथ कई और खुलासे होने की संभावना है।