जनगणना कार्य में LIC कर्मचारियों की तैनाती पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की रोक, अधिकार क्षेत्र को लेकर उठे सवाल
जनगणना जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश दिया है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एलआइसी कर्मचारियों को जनगणना 2027 के कार्य में लगाए जाने संबंधी आदेश के संचालन पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने प्रथमदृष्टया माना है कि संबंधित अधिकारी को एलआइसी कर्मचारियों की सेवाएं जनगणना कार्य के लिए अधिग्रहीत करने का अधिकार नहीं था।
यह मामला अब अधिकार क्षेत्र, जनगणना कानून और सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं के उपयोग से जुड़े बड़े कानूनी सवालों को सामने ला रहा है। हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए छह जुलाई 2026 की तारीख तय की है। तब तक विवादित आदेश पर रोक जारी रहेगी।
एलआइसी कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी लगाने का आदेश
मामला कानपुर नगर निगम क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। नगर निगम कानपुर के जोन-एक के चार्ज अधिकारी ने पांच मई 2026 को एक आदेश जारी कर एलआइसी कर्मचारियों को जनगणना 2027 के कार्य में लगाने का निर्देश दिया था। इसके तहत एलआइसी के कर्मचारियों को गणनाकर्ता (Enumerator) और पर्यवेक्षक (Supervisor) के रूप में जिम्मेदारी सौंपे जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
इस आदेश को एलआइसी कर्मचारियों के संगठन नार्थ सेंट्रल जोन इंश्योरेंस एम्प्लाइज फेडरेशन ने चुनौती दी। संगठन का कहना था कि एलआइसी एक सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा संस्था है, लेकिन वह स्थानीय निकाय नहीं है। ऐसे में उसके कर्मचारियों को इस प्रकार जनगणना कार्य में लगाने का आदेश कानून के अनुरूप नहीं है।
पहले एकलपीठ ने याचिका की थी खारिज
इस मामले में पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकलपीठ ने एलआइसी कर्मचारियों को राहत देने से इनकार कर दिया था। न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकलपीठ ने कहा था कि जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियम, 1990 के तहत अधिकृत अधिकारी किसी भी संस्था के कर्मचारियों को जनगणना कार्य के लिए नियुक्त कर सकते हैं।
एकलपीठ ने यह माना था कि जनगणना देश का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है और इसके लिए प्रशासन को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं। अदालत ने कहा था कि यदि कानून के तहत किसी अधिकारी को अधिकार प्राप्त है तो केवल इस आधार पर आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता कि कर्मचारी किसी अन्य संस्था से संबंधित हैं।
इसी आदेश के खिलाफ एलआइसी कर्मचारियों के संगठन ने विशेष अपील दाखिल की थी।
खंडपीठ ने जताई कानूनी अधिकार को लेकर आपत्ति
विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने अलग दृष्टिकोण अपनाया।
खंडपीठ ने प्रथमदृष्टया कहा कि जिस अधिकारी ने एलआइसी कर्मचारियों की सेवाएं जनगणना के लिए लेने का आदेश जारी किया, उसके अधिकार क्षेत्र पर विचार किया जाना जरूरी है।
अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि कोई कार्य राष्ट्रीय महत्व का है, किसी आदेश को अपने आप वैध नहीं बना देता। किसी भी प्रशासनिक आदेश का कानून के प्रावधानों के अनुरूप होना आवश्यक है।
जनगणना अधिनियम की धारा 7(सी) पर बहस
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से मुख्य तर्क जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 7(सी) को लेकर दिया गया।
यूनियन की ओर से कहा गया कि किसी संस्था के कर्मचारियों से जनगणना कार्य में सहायता तभी ली जा सकती है जब वह कार्य उसी संस्था के परिसर या उसके अधिकार क्षेत्र के भीतर हो। एलआइसी कर्मचारियों को उनके नियमित कार्य से अलग करके बाहरी क्षेत्रों में जनगणना ड्यूटी पर लगाना कानून की भावना के खिलाफ है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि जनगणना के लिए स्थानीय निकायों के कर्मचारियों की व्यवस्था कानून में की गई है, लेकिन एलआइसी स्थानीय निकाय की श्रेणी में नहीं आती।
उनकी ओर से हाई कोर्ट के वर्ष 2011 के एक पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया गया, जिसमें इसी प्रकार की स्थिति में कर्मचारियों की तैनाती को लेकर कानूनी सीमाएं बताई गई थीं।
सरकार की ओर से क्या था पक्ष
इस मामले में प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जनगणना एक राष्ट्रीय महत्व का कार्य है और इसके सफल संचालन के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। कानून में सक्षम अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे विभिन्न संस्थानों के कर्मचारियों की सेवाएं ले सकें।
सरकार पक्ष का कहना था कि जनगणना केवल सरकारी विभागों तक सीमित कार्य नहीं है, बल्कि पूरे देश की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ अभियान है। इसलिए एलआइसी जैसे सार्वजनिक संस्थान के कर्मचारियों की सहायता लेना गलत नहीं है।
हालांकि खंडपीठ ने फिलहाल इन दलीलों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है और केवल प्रथमदृष्टया आधार पर आदेश पर रोक लगाई है।
हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश क्यों महत्वपूर्ण है
हाई कोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों की सेवाओं के उपयोग की सीमा पर विचार किया जा रहा है।
कई बार सरकारें बड़े सार्वजनिक कार्यों के लिए अलग-अलग विभागों और संस्थानों के कर्मचारियों की सेवाएं लेती रही हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी संस्था के कर्मचारियों को उनके मूल कार्य से हटाकर दूसरे कार्य में लगाया जा सकता है और इसके लिए संबंधित अधिकारी के पास कानूनी अधिकार है या नहीं।
अदालत इसी बिंदु पर विचार कर रही है।
जनगणना कार्य और कानून का संतुलन
जनगणना देश की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक योजना का आधार होती है। सरकारें जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाती हैं और विकास योजनाओं को दिशा देती हैं।
लेकिन न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि महत्वपूर्ण कार्य होने के बावजूद हर प्रशासनिक कदम को कानून की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
किसी भी सरकारी आदेश की वैधता केवल उसके उद्देश्य से तय नहीं होती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसे जारी करने वाले अधिकारी के पास वैधानिक शक्ति थी या नहीं।
अब छह जुलाई को होगी अगली सुनवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पांच मई 2026 के उस आदेश के संचालन पर रोक लगा दी है जिसके तहत एलआइसी कर्मचारियों को जनगणना कार्य में लगाया जा रहा था।
अब छह जुलाई 2026 को मामले की अगली सुनवाई होगी। उस दिन अदालत यह तय करेगी कि एलआइसी कर्मचारियों को जनगणना कार्य में लगाए जाने का आदेश कानूनी रूप से सही था या नहीं।
फिलहाल एलआइसी कर्मचारियों को राहत मिली है, लेकिन अंतिम फैसला आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। यह मामला भविष्य में सरकारी कर्मचारियों की अस्थायी तैनाती और प्रशासनिक अधिकारों की सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।