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कॉकरोच जनता पार्टी और युवाओं का गुस्सा: क्या व्यवस्था के खिलाफ उठ रही आवाज को साजिश बताना उचित है?

कॉकरोच जनता पार्टी और युवाओं का गुस्सा: क्या व्यवस्था के खिलाफ उठ रही आवाज को साजिश बताना उचित है?

       भारत की राजनीति में समय-समय पर ऐसे आंदोलन उभरते रहे हैं, जिन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों, सरकारों और सामाजिक विमर्श को चुनौती दी है। कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हुआ, कभी किसानों ने अपनी मांगों के लिए सड़कों पर संघर्ष किया, तो कभी छात्रों और युवाओं ने शिक्षा तथा रोजगार के मुद्दों पर आवाज उठाई। आज देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और रोजगार के घटते अवसरों को लेकर युवाओं में गहरा असंतोष दिखाई दे रहा है। इसी पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया पर उभरे एक मंच “कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)” ने बड़ी संख्या में युवाओं का ध्यान आकर्षित किया है।

लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि जहां एक ओर हजारों युवा इस मंच के माध्यम से अपनी समस्याओं को उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों, वैचारिक समूहों और सोशल मीडिया इकोसिस्टम का एक बड़ा हिस्सा इस आंदोलन के मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय इसके संचालकों की पृष्ठभूमि खंगालने में लगा हुआ है। कोई इसे भाजपा का प्रोजेक्ट बता रहा है, कोई कांग्रेस विरोधी अभियान कह रहा है, तो कोई इसे अर्बन नक्सल या राजनीतिक प्रयोग घोषित करने में जुटा है।

सवाल यह है कि क्या हर आंदोलन को किसी राजनीतिक साजिश के चश्मे से ही देखना आवश्यक है? क्या युवाओं के असंतोष को स्वाभाविक जनभावना मानने में कोई समस्या है?

युवाओं के सामने वास्तविक संकट

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वर्तमान समय में युवाओं की सबसे बड़ी चिंता क्या है। देश में लाखों छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च कर देता है। छात्र अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष नौकरी पाने की उम्मीद में लगा देते हैं। लेकिन जब परीक्षाएं रद्द होती हैं, पेपर लीक होते हैं, भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लटकी रहती हैं या परिणामों को लेकर विवाद खड़े हो जाते हैं, तब स्वाभाविक रूप से निराशा और गुस्सा पैदा होता है।

यह गुस्सा किसी राजनीतिक दल ने पैदा नहीं किया है। यह उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनका सामना लाखों युवा प्रतिदिन कर रहे हैं। जब मेहनत का उचित परिणाम नहीं मिलता, तब असंतोष का पैदा होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसी असंतोष को व्यक्त करने के लिए यदि कोई मंच सामने आता है और युवाओं को अपनी बात कहने का अवसर देता है, तो उसे केवल इसलिए संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उसके संचालकों का राजनीतिक अतीत किसी को पसंद नहीं है।

आंदोलन से ज्यादा चर्चा आंदोलनकारियों की

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और उससे जुड़े अन्य लोगों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। किसी के पुराने ट्वीट खोजे जा रहे हैं, किसी के राजनीतिक विचारों की पड़ताल की जा रही है, तो किसी के पूर्व संबंधों को मुद्दा बनाया जा रहा है।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी आंदोलन की वैधता उसके संचालकों की पुरानी राजनीतिक पसंद से तय होगी या उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों से?

यदि कोई व्यक्ति पहले किसी राजनीतिक दल का समर्थक रहा हो, तो क्या वह बाद में सरकार की आलोचना नहीं कर सकता? यदि किसी ने किसी नेता का समर्थन किया हो, तो क्या वह भविष्य में किसी नीति का विरोध नहीं कर सकता?

लोकतंत्र में विचारों का परिवर्तन और राजनीतिक स्वतंत्रता मूल अधिकारों का हिस्सा हैं। इसलिए किसी आंदोलन की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उसके मुद्दों और कार्यप्रणाली के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल उसके नेताओं के पुराने राजनीतिक झुकाव के आधार पर।

क्या विपक्ष अपनी भूमिका निभाने में विफल रहा?

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है। आम तौर पर बेरोजगारी, परीक्षा घोटाले और शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं विपक्षी दलों के प्रमुख मुद्दे माने जाते हैं। लेकिन यदि इन मुद्दों पर कोई स्वतंत्र मंच युवाओं के बीच अधिक प्रभाव पैदा कर रहा है, तो यह विपक्ष के लिए आत्ममंथन का विषय हो सकता है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुख्य विपक्षी दल युवाओं की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल होते, तो शायद किसी नए मंच को इतनी तेजी से लोकप्रियता हासिल नहीं होती।

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि सीजेपी के पास न कोई बड़ा संगठन है, न विशाल संसाधन हैं और न ही पारंपरिक राजनीतिक संरचना। इसके बावजूद यदि लाखों लोग सोशल मीडिया पर उससे जुड़ रहे हैं और हजारों लोग सड़कों पर प्रदर्शन में भाग ले रहे हैं, तो यह युवाओं की वास्तविक नाराजगी का संकेत हो सकता है।

सोशल मीडिया की नई राजनीति

आज का दौर पारंपरिक राजनीति से काफी अलग है। पहले बड़े आंदोलन खड़े करने के लिए संगठनों, कार्यालयों, कार्यकर्ताओं और लंबे अभियान की आवश्यकता होती थी। लेकिन सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार की प्रकृति बदल दी है।

अब कोई भी मंच, यदि वह लोगों की वास्तविक समस्याओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त कर सके, तो बहुत कम समय में व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर सकता है।

सीजेपी का उभार भी इसी डिजिटल राजनीति का उदाहरण माना जा सकता है। यह मंच मुख्य रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से सक्रिय हुआ और उसने उन मुद्दों को उठाया जिनसे बड़ी संख्या में युवा सीधे प्रभावित हैं।

जंतर-मंतर का संदेश

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को लेकर अनेक प्रकार की बहसें हुईं। किसके साथ कितने लोग आए, किसने कितना प्रभावशाली भाषण दिया, कौन पहले चला गया और कौन बाद तक रुका रहा—इन बातों पर काफी चर्चा हुई।

लेकिन वास्तविक महत्व उस संदेश का था जो इस प्रदर्शन से निकलकर सामने आया। वहां मौजूद लोग केवल एक संगठन के समर्थक नहीं थे। उनमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र थे, बेरोजगार युवा थे, रोजगार की संभावनाओं को लेकर चिंतित परिवार थे और व्यवस्था से निराश नागरिक भी थे।

इस प्रकार के प्रदर्शन यह संकेत देते हैं कि समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष मौजूद है और वह अपने लिए अभिव्यक्ति का मंच तलाश रहा है।

हर आंदोलन को साजिश क्यों माना जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। किसी भी विरोध प्रदर्शन या आंदोलन को अक्सर किसी न किसी साजिश, विदेशी फंडिंग, टूलकिट या राजनीतिक एजेंडे से जोड़ दिया जाता है।

किसान आंदोलन के दौरान भी ऐसे आरोप लगे। छात्रों के आंदोलनों के दौरान भी यही देखने को मिला। कई बार सरकारी कर्मचारियों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के आंदोलनों को भी इसी नजरिए से देखा गया।

इसका परिणाम यह हुआ है कि सार्वजनिक जीवन में अविश्वास की भावना बढ़ी है। लोग किसी भी जनआंदोलन को सहज रूप से स्वीकार करने के बजाय पहले उसमें छिपे कथित षड्यंत्र खोजने लगते हैं।

हालांकि लोकतंत्र में सतर्कता आवश्यक है, लेकिन हर असहमति को साजिश मान लेना भी स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

अन्ना आंदोलन की स्मृति और वर्तमान संदेह

बहुत से लोगों की आशंकाओं के पीछे एक ऐतिहासिक अनुभव भी काम कर रहा है। 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था।

उस आंदोलन से जुड़े कई चेहरे बाद में सक्रिय राजनीति में आए और भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदल गया। परिणामस्वरूप आज जब कोई नया सामाजिक या राजनीतिक मंच उभरता है, तो लोग स्वाभाविक रूप से उसके भविष्य और वास्तविक उद्देश्यों को लेकर सवाल उठाने लगते हैं।

यह सतर्कता समझी जा सकती है, लेकिन केवल संभावनाओं के आधार पर किसी आंदोलन को खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके वर्तमान कार्यों और घोषित उद्देश्यों के आधार पर होना चाहिए।

विपक्ष और सत्ता दोनों के लिए संदेश

सीजेपी जैसे मंचों का उभार सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए संदेश लेकर आता है।

सरकार के लिए संदेश यह है कि युवाओं की समस्याओं को केवल प्रशासनिक मुद्दा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और रोजगार के अवसरों का विस्तार ऐसे विषय हैं जिन पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है।

वहीं विपक्ष के लिए संदेश यह है कि यदि वह जनता की वास्तविक समस्याओं को पर्याप्त मजबूती से नहीं उठाएगा, तो नए मंच और समूह उस खाली स्थान को भरने का प्रयास करेंगे।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं होती। उन्हें समाज की विभिन्न चिंताओं को अभिव्यक्ति देने का माध्यम भी बनना पड़ता है।

युवाओं का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष युवा हैं। वे किसी राजनीतिक दल की रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने भविष्य को लेकर चिंतित नागरिक हैं।

यदि लगातार उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाएगा या उनके आंदोलनों को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा, तो उनमें व्यवस्था के प्रति निराशा और अविश्वास बढ़ सकता है।

लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिकों को यह विश्वास हो कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और उनकी समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास किया जाएगा।

निष्कर्ष

कॉकरोच जनता पार्टी या सीजेपी को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस जारी रह सकती है। इसके संस्थापकों, समर्थकों या भविष्य की दिशा को लेकर भी अलग-अलग मत हो सकते हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है।

लेकिन एक तथ्य से इनकार करना कठिन है कि देश का बड़ा युवा वर्ग आज परीक्षा प्रणाली की गड़बड़ियों, बेरोजगारी और अवसरों की कमी को लेकर चिंतित है। यदि कोई मंच इन मुद्दों को सामने ला रहा है, तो सबसे पहले चर्चा उन समस्याओं पर होनी चाहिए जिन्हें वह उठा रहा है।

किसी आंदोलन की आलोचना की जा सकती है, उसके तरीकों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, उसके नेतृत्व की जांच भी हो सकती है। लेकिन केवल संदेह के आधार पर उसे खारिज कर देना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल, सरकार, मीडिया और समाज सभी युवाओं की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान दें। क्योंकि अंततः किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका नेतृत्व नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़ी जनता की भावनाएं होती हैं। यदि उन भावनाओं को समझने में चूक हुई, तो असंतोष और अविश्वास दोनों ही बढ़ेंगे, जिसका प्रभाव केवल राजनीति पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।