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आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से बड़ी राहत: उम्रकैद की सजा के बीच स्वास्थ्य अधिकारों पर अदालत का महत्वपूर्ण संदेश

आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से बड़ी राहत: उम्रकैद की सजा के बीच स्वास्थ्य अधिकारों पर अदालत का महत्वपूर्ण संदेश

      भारतीय न्याय व्यवस्था में यह सिद्धांत लंबे समय से स्थापित है कि किसी व्यक्ति के अपराध सिद्ध हो जाने और उसे कारावास की सजा मिलने के बाद भी उसके मौलिक मानवीय अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते। जेल की सजा का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना है, न कि उसे जीवन और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित करना। इसी सिद्धांत को एक बार फिर रेखांकित करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम को स्वास्थ्य संबंधी राहत प्रदान की है।

राजस्थान हाई कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि आसाराम को उनकी स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि उनकी तबीयत अधिक खराब होती है अथवा जेल परिसर के भीतर पर्याप्त उपचार संभव नहीं हो पाता है, तो उन्हें आयुर्वेद अस्पताल में भर्ती कराकर इलाज कराने की अनुमति दी जा सकती है। यह आदेश न केवल एक कैदी के स्वास्थ्य अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि जेल प्रशासन की जिम्मेदारियों और भारतीय संविधान के मानवीय दृष्टिकोण को भी सामने लाता है।

स्वास्थ्य को लेकर लंबे समय से चल रही थी कानूनी लड़ाई

आसाराम पिछले कई वर्षों से जोधपुर की केंद्रीय जेल में बंद हैं। वर्ष 2018 में एक नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के मामले में विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद से वे जेल में अपनी सजा काट रहे हैं।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनकी बढ़ती उम्र और लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को लेकर कई बार अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया। उनके वकीलों का लगातार यह दावा रहा कि आसाराम विभिन्न गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं और उन्हें विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है।

कई मौकों पर उन्हें चिकित्सकीय परीक्षण और उपचार के लिए अस्पतालों में भी ले जाया गया। जोधपुर स्थित एम्स अस्पताल में भी उनका इलाज कराया जा चुका है। इसके बावजूद उनकी ओर से यह तर्क दिया जाता रहा कि उन्हें निरंतर और विशेष चिकित्सा निगरानी की आवश्यकता है।

इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान हाई कोर्ट के समक्ष यह मामला पहुंचा, जहां उनकी स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सा सुविधाओं को लेकर राहत मांगी गई थी।

हाई कोर्ट ने क्या कहा

मामले की सुनवाई राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने की। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध चिकित्सा दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।

अदालत ने माना कि जेल में बंद किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य की देखभाल करना राज्य और जेल प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि कोई कैदी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, तो उसे आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन का कर्तव्य है।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि आसाराम के उपचार में किसी भी प्रकार की लापरवाही या कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। जेल प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि उन्हें समय पर जांच, दवाइयां और विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श मिलता रहे।

यह आदेश इस बात की भी पुष्टि करता है कि कानून की नजर में कैदी होने के बावजूद व्यक्ति अपने स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार से वंचित नहीं होता।

आयुर्वेदिक उपचार को लेकर विशेष अनुमति

इस आदेश का सबसे चर्चित पहलू आयुर्वेदिक उपचार से जुड़ा हुआ है। अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में आसाराम की तबीयत गंभीर रूप से खराब होती है और जेल अथवा उपलब्ध चिकित्सा संस्थानों में उनका समुचित उपचार संभव नहीं हो पाता, तो उन्हें आयुर्वेद अस्पताल में भर्ती कराकर इलाज कराया जा सकता है।

यह राहत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आसाराम की ओर से लंबे समय से यह इच्छा व्यक्त की जाती रही है कि उन्हें आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से उपचार प्राप्त करने दिया जाए।

भारत में आयुर्वेद को मान्यता प्राप्त चिकित्सा प्रणाली का दर्जा प्राप्त है। आयुष मंत्रालय के तहत आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाता है। ऐसे में यदि कोई मरीज अपनी इच्छा से आयुर्वेदिक उपचार लेना चाहता है और चिकित्सकीय परिस्थितियां इसकी अनुमति देती हैं, तो अदालतें कई मामलों में इस विकल्प पर विचार करती रही हैं।

हालांकि कोर्ट ने यह अनुमति बिना शर्त नहीं दी है। आदेश का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक परिस्थितियों में वैकल्पिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।

वकीलों की दलीलों का प्रभाव

सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं। उनके वकीलों ने अदालत को बताया कि आसाराम की उम्र काफी अधिक हो चुकी है और वे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

दलीलों में कहा गया कि उन्हें हृदय संबंधी परेशानियां, उम्रजनित रोग तथा अन्य शारीरिक जटिलताएं हैं, जिनके लिए निरंतर चिकित्सा निगरानी आवश्यक है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत मेडिकल रिकॉर्ड और स्वास्थ्य रिपोर्टों का भी उल्लेख किया गया।

वकीलों ने यह तर्क रखा कि जेल प्रशासन को उनके स्वास्थ्य की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उचित उपचार व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। इन दलीलों और उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों का अध्ययन करने के बाद हाई कोर्ट ने अपना आदेश पारित किया।

कैदियों के स्वास्थ्य अधिकारों पर न्यायपालिका का दृष्टिकोण

भारतीय न्यायपालिका ने अनेक मामलों में यह स्पष्ट किया है कि जेल की सजा व्यक्ति के सभी अधिकारों को समाप्त नहीं करती। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

सुप्रीम कोर्ट कई ऐतिहासिक फैसलों में यह कह चुका है कि जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन, स्वास्थ्य सुविधाएं और आवश्यक चिकित्सा सहायता भी शामिल हैं।

कैदियों के संदर्भ में भी अदालतों ने बार-बार कहा है कि राज्य का दायित्व केवल उन्हें हिरासत में रखना नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल करना भी है।

इसी सिद्धांत के आधार पर कई बार गंभीर रूप से बीमार कैदियों को विशेष चिकित्सा सुविधा, अस्पताल में भर्ती होने की अनुमति या आवश्यक उपचार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाते रहे हैं।

राजस्थान हाई कोर्ट का यह आदेश भी उसी न्यायिक परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है।

क्या यह आदेश सजा में राहत है?

इस मामले को लेकर कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या अदालत का यह आदेश आसाराम की सजा में किसी प्रकार की राहत या कमी का संकेत है।

कानूनी दृष्टि से इसका उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है।

अदालत ने न तो उनकी दोषसिद्धि को चुनौती दी है और न ही उम्रकैद की सजा में कोई बदलाव किया है। यह आदेश केवल उनके स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं से संबंधित है।

अर्थात वे अब भी उसी सजा के अधीन रहेंगे जो अदालत द्वारा सुनाई गई है। केवल यह सुनिश्चित किया गया है कि उनकी चिकित्सकीय आवश्यकताओं की अनदेखी न हो।

इसलिए इस आदेश को सजा में छूट या रिहाई से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

2018 का चर्चित फैसला

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में जोधपुर की विशेष अदालत ने नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के मामले में आसाराम को दोषी ठहराया था। यह मामला देशभर में व्यापक चर्चा का विषय बना था।

लंबी सुनवाई और विभिन्न गवाहों के बयानों के बाद अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद उन्हें जोधपुर केंद्रीय जेल भेज दिया गया, जहां वे वर्तमान में बंद हैं।

मामले की संवेदनशीलता और व्यापक जनचर्चा के कारण यह देश के सबसे चर्चित आपराधिक मुकदमों में से एक माना जाता है।

जेल प्रशासन की जिम्मेदारी बढ़ी

हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद जेल प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। अब प्रशासन को नियमित रूप से यह सुनिश्चित करना होगा कि अदालत के निर्देशों का पालन हो।

यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई गंभीर स्थिति उत्पन्न होती है, तो आवश्यक चिकित्सकीय राय लेकर उचित कदम उठाने होंगे। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता में कोई कमी न रहे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के ऐसे आदेश जेल प्रशासन के लिए जवाबदेही तय करने का काम करते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि किसी भी कैदी की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।

निष्कर्ष

राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा आसाराम को दी गई यह राहत भारतीय न्याय व्यवस्था के उस मानवीय पक्ष को सामने लाती है, जिसमें अपराध की गंभीरता और सजा के बावजूद व्यक्ति के बुनियादी स्वास्थ्य अधिकारों को महत्व दिया जाता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जेल प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कैदी को हिरासत में रखना नहीं, बल्कि उसके स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करना भी है।

आदेश का सार यह है कि कानून के शासन में दंड और मानवाधिकार दोनों साथ-साथ चलते हैं। दोषसिद्ध व्यक्ति को सजा मिलना आवश्यक है, लेकिन उसकी चिकित्सा आवश्यकताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसी संतुलन को बनाए रखते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने जेल प्रशासन को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने और जरूरत पड़ने पर आयुर्वेदिक उपचार की व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं।

आने वाले समय में यह आदेश कैदियों के स्वास्थ्य अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि यह पुनः स्थापित करता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार जेल की दीवारों के भीतर भी समाप्त नहीं होता।