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राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलने का रहस्य: हरियाणा के नए कानून और कानूनी व्याख्या का विस्तृत विश्लेषण

राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलने का रहस्य: हरियाणा के नए कानून और कानूनी व्याख्या का विस्तृत विश्लेषण

प्रस्तावना

       डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बार-बार पैरोल और फरलो मिलने का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। साध्वी यौन शोषण मामले में दोषसिद्धि और 20 वर्ष के कारावास की सजा के बावजूद राम रहीम कई बार जेल से बाहर आ चुके हैं। उनके जेल से बाहर आने की अवधि 400 दिनों से अधिक बताई जाती है, जिससे आम जनता, कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के बीच लगातार बहस छिड़ी रहती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद राम रहीम को इतनी बार पैरोल और फरलो कैसे मिल जाती है? इस प्रश्न का उत्तर हरियाणा सरकार द्वारा वर्ष 2022 में लागू किए गए “हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पररी रिलीज) एक्ट, 2022” तथा उससे जुड़ी कानूनी व्याख्याओं में छिपा हुआ है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय जेल व्यवस्था, कैदियों के अधिकारों, पैरोल नीति और न्यायिक पारदर्शिता से जुड़े व्यापक प्रश्नों को भी सामने लाता है।


पैरोल और फरलो क्या होती हैं?

राम रहीम के मामले को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि पैरोल और फरलो में क्या अंतर होता है।

पैरोल

पैरोल एक अस्थायी रिहाई होती है जो किसी विशेष कारण के आधार पर दी जाती है। जैसे—

  • परिवार में मृत्यु
  • गंभीर बीमारी
  • कृषि कार्य
  • पारिवारिक दायित्व
  • सामाजिक कारण

पैरोल को कैदी का अधिकार नहीं माना जाता, बल्कि सक्षम प्राधिकारी की संतुष्टि पर आधारित राहत माना जाता है।

फरलो

फरलो अपेक्षाकृत अलग व्यवस्था है। यह अच्छे आचरण वाले कैदियों को समय-समय पर दी जाने वाली अस्थायी रिहाई होती है ताकि वे समाज और परिवार से जुड़े रह सकें।

फरलो को कई न्यायिक निर्णयों में सुधारात्मक व्यवस्था (Reformative Measure) माना गया है।


राम रहीम को सजा कैसे मिली?

वर्ष 2017 में विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दो साध्वियों के यौन शोषण के मामले में दोषी ठहराया था।

इसके बाद उन्हें 20 वर्ष की कारावास की सजा सुनाई गई।

इसके अतिरिक्त राम रहीम को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या के मामलों में भी दोषी ठहराया जा चुका है।

वर्तमान में वे हरियाणा की सुनारिया जेल में सजा काट रहे हैं।


1988 का पुराना कानून क्या कहता था?

हरियाणा में लंबे समय तक “हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पररी रिलीज) एक्ट, 1988” लागू था।

इस कानून के तहत पैरोल और फरलो प्राप्त करना अपेक्षाकृत कठिन था।

पुराने कानून में—

  • पात्रता की शर्तें सीमित थीं।
  • गंभीर अपराधियों पर अधिक प्रतिबंध थे।
  • प्रशासनिक विवेकाधिकार अधिक था।
  • सुरक्षा संबंधी आकलन को विशेष महत्व दिया जाता था।

इस व्यवस्था में बार-बार पैरोल प्राप्त करना आसान नहीं माना जाता था।


2022 का नया कानून क्यों लाया गया?

हरियाणा सरकार ने वर्ष 2022 में नया कानून लागू किया जिसे “हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पररी रिलीज) एक्ट, 2022” कहा गया।

सरकार का तर्क था कि जेल सुधारों को आधुनिक बनाना और कैदियों के पुनर्वास को बढ़ावा देना आवश्यक है।

नए कानून में—

  • पैरोल की अवधि बढ़ाई गई।
  • फरलो के अवसर बढ़ाए गए।
  • पात्रता संबंधी प्रावधानों को पुनर्परिभाषित किया गया।
  • हार्डकोर कैदियों की नई परिभाषा जोड़ी गई।

यहीं से राम रहीम के मामले को नया कानूनी आधार मिला।


हार्डकोर कैदी की अवधारणा क्या है?

2022 के कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “हार्डकोर प्रिजनर” की परिभाषा है।

कानून के अनुसार कुछ विशेष श्रेणी के अपराधियों को हार्डकोर कैदी माना जाता है।

इनमें सामान्यतः शामिल हैं—

  • सीरियल किलर
  • सामूहिक बलात्कार के दोषी
  • बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों में दोषी
  • संगठित अपराध से जुड़े अपराधी
  • अत्यंत जघन्य अपराध करने वाले कैदी

ऐसे कैदियों को पैरोल और फरलो देने के मामले में अधिक प्रतिबंध लागू होते हैं।


राम रहीम को हार्डकोर कैदी क्यों नहीं माना गया?

यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया।

हरियाणा सरकार ने वर्ष 2022 में एडवोकेट जनरल से कानूनी राय प्राप्त की थी।

कानूनी राय में कहा गया कि राम रहीम को नए कानून के तहत हार्डकोर दोषी कैदी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

इसका मुख्य आधार यह था कि कानून में हार्डकोर कैदी की जो परिभाषा दी गई है, उसमें राम रहीम के विरुद्ध दर्ज और सिद्ध अपराध तकनीकी रूप से उस श्रेणी में फिट नहीं बैठते।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी व्यक्ति की पात्रता का निर्धारण भावनात्मक या सामाजिक धारणा से नहीं बल्कि कानून की शब्दावली और उसकी व्याख्या के आधार पर किया जाता है।

यही कारण है कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि के बावजूद उन्हें हार्डकोर कैदी नहीं माना गया।


धारा 302 और 120-बी की भूमिका

राम रहीम के खिलाफ हत्या के मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 तथा धारा 120-बी के तहत दोषसिद्धि हुई।

धारा 302

यह हत्या के अपराध से संबंधित है।

धारा 120-बी

यह आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) से संबंधित है।

कानूनी राय में यह व्याख्या की गई कि केवल इन धाराओं के तहत दोषसिद्धि अपने-आप किसी कैदी को हार्डकोर कैदी नहीं बनाती, जब तक कि वह कानून में वर्णित विशिष्ट श्रेणियों में न आता हो।

इसी व्याख्या के कारण राम रहीम पैरोल और फरलो के लिए पात्र माने गए।


नए कानून में पैरोल की अवधि

2022 के कानून के तहत कैदियों को कई श्रेणियों में अस्थायी रिहाई दी जा सकती है।

व्यवस्था के अनुसार—

  • एक वर्ष में लगभग 10 सप्ताह तक पैरोल मिल सकती है।
  • इसके अतिरिक्त 3 सप्ताह तक फरलो का प्रावधान है।
  • अच्छे आचरण को महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

यदि किसी कैदी का जेल रिकॉर्ड संतोषजनक हो और सुरक्षा एजेंसियां विशेष आपत्ति न करें, तो उसे अस्थायी रिहाई मिल सकती है।


राम रहीम को कितनी बार पैरोल और फरलो मिली?

अक्टूबर 2020 में राम रहीम पहली बार जेल से बाहर आए।

इसके बाद उन्हें कई बार—

  • पैरोल
  • फरलो
  • अस्थायी रिहाई

प्रदान की गई।

जनवरी 2024 में उन्हें 50 दिनों की पैरोल मिली थी, जिसे उनकी सबसे लंबी अस्थायी रिहाइयों में से एक माना गया।

समय-समय पर दी गई इन रिहाइयों को जोड़कर देखा जाए तो वे सैकड़ों दिन जेल से बाहर रह चुके हैं।


क्या पैरोल देना कानूनी अधिकार है?

यह समझना आवश्यक है कि पैरोल का अर्थ सजा समाप्त होना नहीं होता।

पैरोल के दौरान—

  • दोषसिद्धि बरकरार रहती है।
  • कैदी कानूनी रूप से सजा भुगत रहा होता है।
  • निर्धारित शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है।
  • अवधि समाप्त होने पर जेल वापस लौटना पड़ता है।

भारतीय न्यायालयों ने कई मामलों में कहा है कि पैरोल सुधारात्मक न्याय प्रणाली का हिस्सा है और इसका उद्देश्य कैदी को समाज से पूरी तरह कटने से बचाना है।


राजनीतिक विवाद क्यों होता है?

राम रहीम की रिहाई अक्सर राजनीतिक विवाद का विषय बन जाती है।

विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि—

  • चुनावों के आसपास पैरोल दी जाती है।
  • रिहाई का राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है।
  • सरकारें वोट बैंक को ध्यान में रखकर निर्णय लेती हैं।

दूसरी ओर सरकार का कहना होता है कि सभी निर्णय कानून और जेल नियमों के अनुसार लिए जाते हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि यदि कोई कैदी कानून के तहत पात्र है, तो उसे केवल जनभावनाओं के आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।


न्यायिक दृष्टिकोण क्या कहता है?

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि पैरोल और फरलो से जुड़े निर्णय कानून के अनुरूप होने चाहिए।

न्यायालय यह भी कहते हैं कि—

  • प्रत्येक कैदी के मामले का व्यक्तिगत मूल्यांकन होना चाहिए।
  • सुरक्षा संबंधी पहलुओं की जांच आवश्यक है।
  • अच्छे आचरण को महत्व दिया जाना चाहिए।
  • कानून में निर्धारित शर्तों का पालन अनिवार्य है।

यदि प्रशासन द्वारा लिया गया निर्णय कानून के अनुरूप है, तो केवल लोकप्रिय भावना के आधार पर उसे अवैध नहीं कहा जा सकता।


क्या नया कानून न्याय व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करता है?

राम रहीम के मामले ने निश्चित रूप से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।

जैसे—

  1. क्या हार्डकोर कैदी की परिभाषा पर्याप्त रूप से व्यापक है?
  2. क्या गंभीर अपराधों में दोषी व्यक्तियों को इतनी बार पैरोल मिलनी चाहिए?
  3. क्या वर्तमान कानून में संशोधन की आवश्यकता है?
  4. क्या पैरोल नीति में अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए?
  5. क्या सभी कैदियों के साथ समान व्यवहार हो रहा है?

इन प्रश्नों पर कानूनी विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच मतभेद मौजूद हैं।


निष्कर्ष

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बार-बार पैरोल और फरलो मिलने के पीछे मुख्य कारण हरियाणा का “गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पररी रिलीज) एक्ट, 2022” और उसके तहत हार्डकोर कैदी की कानूनी परिभाषा है। सरकार द्वारा प्राप्त कानूनी राय के अनुसार राम रहीम इस श्रेणी में नहीं आते, जिसके कारण वे कानून के तहत पैरोल और फरलो के पात्र माने गए।

हालांकि यह विषय कानूनी से अधिक सामाजिक और राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक पक्ष इसे कानून के अनुसार दिया गया वैधानिक लाभ मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे न्याय की भावना के विपरीत बताता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में तथ्य यही है कि राम रहीम को मिलने वाली पैरोल और फरलो का आधार न्यायालय द्वारा दी गई सजा में कोई कमी नहीं, बल्कि हरियाणा के पैरोल कानून की वह कानूनी संरचना है जो पात्र कैदियों को अस्थायी रिहाई की अनुमति देती है।

इस पूरे विवाद ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया है कि जेल सुधार, कैदियों के अधिकार और समाज की न्याय संबंधी अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना भारतीय विधि व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।