धर्म परिवर्तन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: ADM की कार्रवाई पर फटकार के बाद प्रोफेसर के धर्मांतरण को मिली आधिकारिक मंजूरी
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक विवेकाधिकार की सीमा पर महत्वपूर्ण फैसलाधर्म परिवर्तन के मामलों में राज्य की भूमिका, प्रशासनिक अधिकारियों की शक्तियों की सीमा तथा व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। अदालत ने इस बात को स्पष्ट किया कि यदि कोई वयस्क व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से धर्म परिवर्तन करता है और उसने कानून द्वारा निर्धारित सभी प्रक्रियाओं का पालन किया है, तो प्रशासनिक अधिकारी अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
इसी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष आए एक मामले में प्रयागराज के अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) ने अंततः एक मुस्लिम व्यक्ति के हिंदू धर्म ग्रहण करने के आवेदन को मंजूरी दे दी। यह मंजूरी तब दी गई जब हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और उनके पूर्व आदेश को अनुचित माना।
कौन हैं याचिकाकर्ता?
मामले के याचिकाकर्ता अनिल पंडित हैं, जिनका पूर्व नाम मोहम्मद अहसान था। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने वर्ष 2022 में अपनी इच्छा से सनातन धर्म स्वीकार किया था और इसके लिए उत्तर प्रदेश विधि के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था।
हालांकि धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्हें लगातार प्रशासनिक और पुलिस जांच का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्होंने अंततः हाईकोर्ट की शरण ली।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन पूरी तरह स्वेच्छा से किया था। प्रारंभिक पुलिस जांच रिपोर्टों में भी यह स्पष्ट रूप से पाया गया था कि धर्म परिवर्तन में किसी प्रकार का दबाव, प्रलोभन, धोखा या अवैध साधन शामिल नहीं थे।
इसके बावजूद उनके ससुर द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत के आधार पर प्रशासन ने दोबारा जांच शुरू कर दी। याचिकाकर्ता के अनुसार उनके ससुर इस विवाह से नाराज थे और इसी कारण उन्होंने शिकायत दर्ज कराई थी।
पहले से मौजूद दो अनुकूल पुलिस रिपोर्टों को नजरअंदाज करते हुए अपर जिला मजिस्ट्रेट ने एक और जांच का आदेश दिया। बाद में प्राप्त रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है। इसी आधार पर अगस्त 2024 में धर्म परिवर्तन संबंधी आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया।
एक लाख रुपये के लेन-देन को बनाया गया आधार
ADM ने अपने आदेश में वर्ष 2021 में याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी के बीच हुए लगभग एक लाख रुपये के आर्थिक लेन-देन को भी महत्वपूर्ण माना। अधिकारी ने इसे संभावित प्रलोभन अथवा अनुचित प्रभाव का संकेत बताया।
हालांकि बाद में अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता की पत्नी ने स्पष्ट किया कि यह राशि किसी धर्म परिवर्तन या विवाह के लिए नहीं दी गई थी। उन्होंने बताया कि परिवार में एक गंभीर चिकित्सीय आपातस्थिति उत्पन्न हो गई थी और उस समय एक मित्र के रूप में याचिकाकर्ता ने आर्थिक सहायता प्रदान की थी।
पत्नी ने अदालत के सामने यह भी कहा कि विवाह और धर्म परिवर्तन दोनों ही उनकी स्वतंत्र इच्छा से हुए थे।
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक रवैये पर जताई नाराजगी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने प्रशासनिक अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की।
अदालत ने पाया कि प्रारंभिक जांच रिपोर्टों में धर्म परिवर्तन को वैध और स्वैच्छिक बताया गया था। इसके बावजूद बार-बार पुलिस रिपोर्ट मंगाना और एक असंबंधित आपराधिक मामले को धर्म परिवर्तन की वैधता से जोड़ना उचित नहीं था।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि आपराधिक जांच का संचालन पुलिस और संबंधित आपराधिक न्याय प्रणाली का विषय है। अपर जिला मजिस्ट्रेट का कार्य धर्म परिवर्तन संबंधी वैधानिक प्रक्रिया का परीक्षण करना है, न कि आपराधिक जांच को प्रभावित करना।
अदालत ने टिप्पणी की कि अधिकारी ने अपनी वैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कार्रवाई की और इससे याचिकाकर्ता के अधिकार प्रभावित हुए।
अदालत ने स्वयं पक्षकारों से की बातचीत
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता तथा उनकी पत्नी दोनों से बातचीत की। अदालत ने यह समझने का प्रयास किया कि विवाह और धर्म परिवर्तन किन परिस्थितियों में हुए थे।
बातचीत के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि दोनों वयस्क हैं और उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा से विवाह किया है। किसी प्रकार के दबाव, धोखे या लालच का कोई विश्वसनीय प्रमाण अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया गया।
इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि प्रशासन द्वारा उठाए गए कई संदेह वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाते।
ADM का पुराना आदेश रोका गया
5 मई को पारित अपने आदेश में हाईकोर्ट ने ADM द्वारा जारी अस्वीकृति आदेश के प्रभाव को रोक दिया। साथ ही संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे मामले का पुनर्विचार करें और कानून तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नया निर्णय लें।
अदालत ने यह भी कहा कि मामले को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और केवल आशंकाओं या अनुमानों के आधार पर किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
अदालत के आदेश के बाद मिली मंजूरी
हाईकोर्ट की टिप्पणी और निर्देशों के बाद प्रयागराज के अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) ने 14 मई को नया आदेश पारित किया।
इस आदेश में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 9(4) के अंतर्गत याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत आवेदन को स्वीकृति प्रदान कर दी गई।
27 मई को जब मामला पुनः हाईकोर्ट के समक्ष आया, तब अदालत को इस नए आदेश की जानकारी दी गई। आदेश का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने इसे संज्ञान में लिया और आगे की वैधानिक प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए।
धारा 9(4) और 9(6) का महत्व
उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 में धर्म परिवर्तन के लिए कुछ प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं निर्धारित की गई हैं।
धारा 9(4) के अनुसार धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को संबंधित प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपनी पहचान तथा अपने घोषणा-पत्र की पुष्टि करनी होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया गया है।
वहीं धारा 9(6) के अंतर्गत प्राधिकारी को अंतिम आदेश पारित करना होता है, जिसके बाद संबंधित अभिलेखों में आवश्यक परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
हाईकोर्ट ने निर्धारित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर धारा 9(6) के तहत आवश्यक कार्रवाई पूरी की जाए।
नाम परिवर्तन संबंधी निर्देश
मामले का निपटारा करते समय अदालत ने याचिकाकर्ता को एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि उन्हें अपने सभी आधिकारिक दस्तावेजों में नाम परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
इसमें शैक्षणिक प्रमाण-पत्र, सेवा अभिलेख, पहचान पत्र तथा अन्य सरकारी रिकॉर्ड शामिल हैं। ऐसा करने से भविष्य में किसी प्रकार की प्रशासनिक या कानूनी जटिलता उत्पन्न नहीं होगी।
संवैधानिक दृष्टि से फैसले का महत्व
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि राज्य का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना है कि धर्म परिवर्तन स्वैच्छिक और वैधानिक हो। यदि कोई व्यक्ति स्वतंत्र इच्छा से धर्म बदलता है तो प्रशासनिक अधिकारियों को कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही कार्य करना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय प्रशासनिक विवेकाधिकार की सीमाओं को रेखांकित करता है और यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनावश्यक संदेह या अत्यधिक प्रशासनिक हस्तक्षेप का शिकार नहीं बनाया जा सकता।
निष्कर्ष
अनिल पंडित उर्फ मोहम्मद अहसान के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही केवल एक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन की मंजूरी तक सीमित नहीं है। यह निर्णय नागरिक स्वतंत्रता, धार्मिक विकल्प के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों को भी मजबूत करता है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब कोई व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करता है और धर्म परिवर्तन उसकी स्वतंत्र इच्छा का परिणाम होता है, तब प्रशासनिक अधिकारियों को निष्पक्ष और विधिसम्मत तरीके से कार्य करना चाहिए। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में देखा जा सकता है, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक शक्तियों के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।