“सुप्रीम कोर्ट कोई 10 से 5 की नौकरी नहीं”: जजों की छुट्टियों पर उठे सवालों के बीच अदालत में हुई तीखी बहस, तुषार मेहता ने किया जोरदार बचाव
भारत के न्यायिक तंत्र में समय-समय पर एक प्रश्न बार-बार उठता रहा है—क्या उच्च न्यायालयों और विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के जजों को बहुत अधिक छुट्टियां मिलती हैं? यह बहस नई नहीं है, लेकिन बुधवार को Supreme Court of India में हुई एक सुनवाई के दौरान यह मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया। दिलचस्प बात यह रही कि इस बार बहस अदालत के बाहर नहीं, बल्कि अदालत के भीतर हुई, जहां न्यायाधीशों और देश के शीर्ष विधि अधिकारियों ने जजों की छुट्टियों को लेकर अपनी स्पष्ट राय रखी।
सुनवाई के दौरान Tushar Mehta ने जजों की छुट्टियों का खुलकर बचाव किया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का काम किसी सामान्य सरकारी या निजी नौकरी की तरह सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक सीमित नहीं होता। उन्होंने कहा कि न्यायिक कार्य की प्रकृति को समझे बिना केवल छुट्टियों की अवधि देखकर टिप्पणी करना उचित नहीं है।
किस मामले की सुनवाई के दौरान हुई यह चर्चा?
यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया जब जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय की जानी थी। चूंकि अदालत की छुट्टियां निकट थीं, इसलिए यह प्रश्न उठा कि मामले को कब सूचीबद्ध किया जाए। इसी दौरान अदालत की छुट्टियों और न्यायाधीशों के कार्यभार को लेकर चर्चा शुरू हो गई।
यह चर्चा धीरे-धीरे व्यापक न्यायिक व्यवस्था और न्यायाधीशों की कार्य परिस्थितियों तक पहुंच गई।
तुषार मेहता का स्पष्ट संदेश
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि जजों की छुट्टियों की आलोचना करने वाले लोगों को न्यायिक कार्य की वास्तविकता समझनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीश प्रतिदिन बड़ी संख्या में मामलों की फाइलें पढ़ते हैं। केवल अदालत में बैठकर सुनवाई करना ही उनका काम नहीं है। सुनवाई के बाद भी उन्हें तथ्यों, कानूनों, पूर्व निर्णयों और संवैधानिक प्रश्नों का गहन अध्ययन करना पड़ता है।
मेहता ने कहा कि आम धारणा यह है कि अदालत का काम अदालत कक्ष में बैठकर सुनवाई करने तक सीमित है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों का काम किसी भी दृष्टि से “10 से 5” की नौकरी नहीं माना जा सकता।
उनका कहना था कि न्यायाधीशों को हर दिन बड़ी संख्या में फाइलों का अध्ययन करना पड़ता है और कई बार वकीलों का वास्तविक काम भी अदालत की कार्यवाही समाप्त होने के बाद शुरू होता है।
मानसिक श्रम और न्यायिक जिम्मेदारी
मेहता ने यह भी कहा कि न्यायिक कार्य अत्यधिक मानसिक श्रम वाला कार्य है। किसी भी संवैधानिक या जटिल कानूनी मामले में न्यायाधीशों को विभिन्न पक्षों की दलीलों, पूर्व न्यायिक दृष्टांतों और विधिक सिद्धांतों का गहराई से अध्ययन करना पड़ता है।
उन्होंने तर्क दिया कि प्रभावी कार्य निष्पादन के लिए समय-समय पर विश्राम आवश्यक है। उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी निरंतर मानसिक दबाव में काम करने वाले व्यक्तियों को पर्याप्त आराम मिलना चाहिए ताकि वे बेहतर निर्णय लेने में सक्षम रह सकें।
उनके अनुसार, न्यायिक निर्णय केवल कानूनी विवादों का निपटारा नहीं करते, बल्कि कई बार लाखों लोगों के अधिकारों और देश की नीतियों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में निर्णय प्रक्रिया की गुणवत्ता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की टिप्पणी
बहस के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी न्यायाधीशों के कार्यभार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों की अवधि पहले की तुलना में कम की जा चुकी है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तथाकथित छुट्टियों के दौरान भी न्यायाधीश पूरी तरह निष्क्रिय नहीं रहते।
उन्होंने कहा कि “पार्शियल वर्किंग डेज” यानी आंशिक कार्य दिवसों में भी सुनवाई जारी रहती है और कई महत्वपूर्ण मामलों पर काम होता रहता है। न्यायाधीश इस दौरान लंबित मामलों, आदेशों और निर्णयों पर लगातार कार्य करते हैं।
यह टिप्पणी इस धारणा को चुनौती देती है कि न्यायालय की छुट्टियों के दौरान न्यायिक कार्य पूरी तरह बंद हो जाता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने क्यों बताया छुट्टियों को आवश्यक?
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने भी जजों की छुट्टियों की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत है। यहां दिए गए निर्णयों का प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे देश के लिए कानूनी मिसाल बन जाते हैं।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि यदि सर्वोच्च अदालत से कोई गंभीर त्रुटि हो जाए तो उसके परिणाम व्यापक हो सकते हैं। इसलिए न्यायाधीशों को मामलों पर गहराई से विचार करने और निर्णय लिखने के लिए पर्याप्त समय चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि आंशिक कार्य दिवसों के दौरान उन्हें स्वयं अनेक निर्णय तैयार करने होते हैं। यह कार्य केवल अदालत में बैठकर सुनवाई करने से कहीं अधिक समय और एकाग्रता की मांग करता है।
उनकी टिप्पणी से यह स्पष्ट संकेत मिला कि न्यायिक अवकाश का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य लंबित निर्णयों को तैयार करना और मामलों पर गहन अध्ययन करना भी है।
अटॉर्नी जनरल की प्रतिक्रिया
बहस में भारत के अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani ने भी भाग लिया।
उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोग वास्तविक स्थिति को अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन जब वे इस विषय पर खुलकर बोलते हैं तो विवाद पैदा हो जाता है और जब नहीं बोलते तब भी आलोचना जारी रहती है।
उनकी टिप्पणी ने यह संकेत दिया कि न्यायपालिका के कामकाज को लेकर सार्वजनिक धारणा और वास्तविकता के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है।
सोशल मीडिया पर तुषार मेहता का तंज
बहस के दौरान तुषार मेहता ने सोशल मीडिया पर न्यायपालिका की आलोचना करने वालों पर भी कटाक्ष किया।
उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया ने अनेक ऐसे “विशेषज्ञ” पैदा कर दिए हैं जो बिना पूरी जानकारी के हर विषय पर राय देते हैं।
उन्होंने एक रोचक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार लोग सड़क किनारे खड़े होकर विश्वस्तरीय क्रिकेट खिलाड़ियों की तकनीक पर टिप्पणी करने लगते हैं, उसी प्रकार कई लोग न्यायिक कार्य की जटिलताओं को समझे बिना अदालतों और न्यायाधीशों पर टिप्पणी कर देते हैं।
उनका कहना था कि सोशल मीडिया के दौर में किसी भी विषय पर त्वरित प्रतिक्रिया देना आसान हो गया है, लेकिन इससे विशेषज्ञता स्वतः प्राप्त नहीं हो जाती।
न्यायिक छुट्टियों को लेकर बहस क्यों होती है?
भारत में न्यायिक छुट्टियों का विषय लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है। आलोचकों का तर्क है कि अदालतों में पहले से ही लाखों मामले लंबित हैं और ऐसे में लंबी छुट्टियां न्याय वितरण की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
दूसरी ओर न्यायपालिका और विधि समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि न्यायिक कार्य की प्रकृति अन्य सरकारी सेवाओं से अलग है। न्यायाधीशों का अधिकांश कार्य अदालत के बाहर अध्ययन, शोध, आदेश लेखन और निर्णय तैयार करने में व्यतीत होता है।
इसलिए केवल अदालत में बैठने के दिनों के आधार पर उनके कार्यभार का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग नियुक्ति कानून का मामला
जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह बहस हुई, वह स्वयं भी संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अनुरोध किया था कि अदालत खुलने के तुरंत बाद जुलाई के दूसरे सप्ताह में मामले की सुनवाई की जाए।
हालांकि पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को निर्धारित की।
‘इंजन को वार्म-अप होने में समय लगता है’
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने हल्के हास्यपूर्ण अंदाज में कहा कि लंबी छुट्टियों के बाद इंजन को भी “वार्म-अप” होने में थोड़ा समय लगता है।
अदालत की यह टिप्पणी भले ही मजाकिया अंदाज में की गई हो, लेकिन इससे यह भी संकेत मिला कि न्यायिक अवकाश के बाद मामलों की सुनवाई को व्यवस्थित रूप से पुनः प्रारंभ करने के लिए कुछ समय आवश्यक होता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट में हुई यह चर्चा केवल जजों की छुट्टियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने न्यायिक कार्य की वास्तविक प्रकृति, मानसिक दबाव, निर्णय लेखन की जटिलता और न्यायपालिका के प्रति सार्वजनिक धारणा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी सामने रखा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की टिप्पणियों से यह स्पष्ट हुआ कि न्यायपालिका अपने कार्यभार को केवल अदालत में बिताए गए घंटों से नहीं मापती। न्यायाधीशों के लिए सुनवाई के अतिरिक्त अध्ययन, अनुसंधान, विचार-विमर्श और निर्णय लेखन भी उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यद्यपि न्यायिक छुट्टियों को लेकर सार्वजनिक बहस आगे भी जारी रह सकती है, लेकिन इस सुनवाई ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्य केवल अदालत कक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का एक बड़ा हिस्सा अदालत की औपचारिक कार्यवाही के बाहर भी संपन्न होता है।