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हुक्का बार चलाना मौलिक अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की महत्वपूर्ण टिप्पणी,

हुक्का बार चलाना मौलिक अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की महत्वपूर्ण टिप्पणी, ‘Res Extra Commercium’ सिद्धांत पर आधारित कानूनी विमर्श

       भारत में व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता को संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों में शामिल किया गया है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है। कुछ गतिविधियां ऐसी होती हैं जिन्हें कानून और न्यायालय सामान्य व्यापारिक गतिविधियों की श्रेणी में नहीं मानते। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए Allahabad High Court की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में टिप्पणी की है कि नागरिकों के पास हुक्का बार संचालित करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि हुक्का बार जैसी गतिविधियां “Res Extra Commercium” अर्थात “वाणिज्य के दायरे से बाहर की वस्तु या गतिविधि” के सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं।

यह टिप्पणी केवल एक हुक्का बार संचालक की याचिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि संविधान के तहत व्यापार करने की स्वतंत्रता की सीमा क्या है, राज्य किस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में प्रतिबंध लगा सकता है, और न्यायालय किन परिस्थितियों में किसी व्यवसाय को संवैधानिक संरक्षण देने से इनकार कर सकते हैं।

मामला क्या था?

यह मामला होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय से जुड़ी कंपनी एम्पेरियो ग्रैंड प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। कंपनी का कहना था कि उसके पास खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग द्वारा जारी वैध लाइसेंस है, जिसके आधार पर वह रेस्टोरेंट और खाद्य सेवाएं संचालित कर रही है।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब उसके पास वैध व्यापारिक लाइसेंस है, तब उसे अपने प्रतिष्ठान में हुक्का बार संचालित करने की अनुमति भी मिलनी चाहिए। कंपनी ने यह भी आशंका व्यक्त की कि पुलिस या अन्य प्रशासनिक अधिकारी उसे और उसके ग्राहकों को हुक्का सेवन से रोक सकते हैं।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे हुक्का बार के संचालन में हस्तक्षेप न करें तथा उसे आवश्यक अनुमति प्रदान करें।

अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी व्यक्ति या संस्था को हुक्का बार चलाने का संवैधानिक या मौलिक अधिकार प्राप्त है?

दूसरा प्रश्न यह था कि यदि कोई व्यक्ति रेस्टोरेंट या होटल का लाइसेंस रखता है, तो क्या उसे स्वतः हुक्का बार संचालित करने का अधिकार भी प्राप्त हो जाता है?

तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या हुक्का बार संचालन के लिए कोई वैधानिक लाइसेंस व्यवस्था मौजूद है और यदि नहीं है तो न्यायालय ऐसी गतिविधि को संरक्षण प्रदान कर सकता है या नहीं।

खंडपीठ की टिप्पणी

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या हुक्का बार संचालन के लिए कोई अलग या विशेष लाइसेंस लिया गया है।

इस प्रश्न के उत्तर में अदालत को बताया गया कि राज्य में आज तक हुक्का बार संचालन के लिए कोई विशेष लाइसेंस जारी नहीं किया गया है।

यह तथ्य सामने आने के बाद अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हुक्का बार चलाना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियां “Res Extra Commercium” के सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं।

क्या है ‘Res Extra Commercium’ का सिद्धांत?

यह एक लैटिन कानूनी अभिव्यक्ति है जिसका अर्थ है—ऐसी वस्तुएं या गतिविधियां जो सामान्य वाणिज्य या व्यापार के दायरे से बाहर हैं।

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर इस सिद्धांत का उपयोग कुछ विशेष प्रकार की गतिविधियों के संबंध में किया है। जब कोई गतिविधि समाज के स्वास्थ्य, नैतिकता या सार्वजनिक हित के लिए हानिकारक मानी जाती है, तब न्यायालय उसे सामान्य व्यापारिक स्वतंत्रता का हिस्सा मानने से इनकार कर सकते हैं।

इस सिद्धांत का प्रयोग विशेष रूप से शराब, जुआ, सट्टेबाजी और अन्य नियंत्रित गतिविधियों के मामलों में किया गया है। न्यायालयों ने कई अवसरों पर कहा है कि इन गतिविधियों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्राप्त व्यापारिक स्वतंत्रता के समान स्तर का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

हुक्का बार से संबंधित वर्तमान मामले में अदालत ने इसी सिद्धांत का उल्लेख किया।

अनुच्छेद 19(1)(g) और उसकी सीमाएं

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई भी वैध व्यवसाय, व्यापार या पेशा अपनाने का अधिकार प्रदान करता है।

लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(6) राज्य को यह शक्ति देता है कि वह जनहित, सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से उचित प्रतिबंध लगा सके।

अर्थात यदि कोई गतिविधि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है, तो राज्य उसके संचालन को नियंत्रित कर सकता है या आवश्यक होने पर उस पर प्रतिबंध भी लगा सकता है।

अदालत की टिप्पणी इसी संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप दिखाई देती है।

हुक्का बार और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न

पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक राज्यों में हुक्का बार को लेकर विवाद उत्पन्न हुए हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हुक्का सेवन तंबाकू सेवन का ही एक रूप है और इससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।

अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि हुक्का सिगरेट की तुलना में कम हानिकारक होता है, लेकिन चिकित्सा अनुसंधानों में कई बार यह पाया गया है कि लंबे समय तक हुक्का सेवन फेफड़ों, हृदय और श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

इसी कारण कई राज्य सरकारों ने हुक्का बारों के संचालन पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाए हैं या उनके लिए कठोर नियमन लागू किए हैं।

लाइसेंस का कानूनी महत्व

याचिकाकर्ता का एक प्रमुख तर्क यह था कि उसके पास खाद्य सेवाएं और रेस्टोरेंट संचालन का लाइसेंस मौजूद है।

लेकिन अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया कि किसी एक प्रकार का लाइसेंस किसी अन्य गतिविधि के संचालन का स्वतः अधिकार नहीं देता।

उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के पास रेस्टोरेंट चलाने का लाइसेंस है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह उसी लाइसेंस के आधार पर कोई अन्य नियंत्रित गतिविधि भी संचालित कर सकता है।

कानून में प्रत्येक गतिविधि के लिए अलग-अलग नियामक व्यवस्था हो सकती है और संबंधित अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है।

अदालत ने अंतरिम राहत क्यों नहीं दी?

याचिकाकर्ता चाहता था कि अदालत तत्काल आदेश जारी करके प्रशासन को हस्तक्षेप से रोके।

लेकिन अदालत ने ऐसा कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया।

इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि इसी प्रकार के अन्य मामले पहले से न्यायालय में लंबित बताए गए। जब किसी मुद्दे पर पहले से कई याचिकाएं विचाराधीन हों, तब अदालतें अक्सर सभी मामलों को एक साथ सुनना उचित समझती हैं ताकि एक समान और व्यापक निर्णय दिया जा सके।

इसी कारण खंडपीठ ने याचिका को अन्य संबंधित मामलों के साथ सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

न्यायिक संयम का उदाहरण

अंतरिम राहत न देने का निर्णय न्यायिक संयम का भी उदाहरण माना जा सकता है।

न्यायालय कई बार ऐसे मामलों में तत्काल राहत देने से बचते हैं जिनमें व्यापक नीतिगत या सार्वजनिक हित के प्रश्न जुड़े हों। यदि अदालत बिना विस्तृत सुनवाई के अंतरिम आदेश दे देती, तो इसका प्रभाव राज्य की नियामक व्यवस्था पर पड़ सकता था।

इसलिए अदालत ने अंतिम निर्णय से पहले व्यापक सुनवाई को प्राथमिकता दी।

हुक्का बार विवाद का व्यापक कानूनी प्रभाव

यह मामला केवल एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव उन सभी संस्थानों पर पड़ सकता है जो रेस्टोरेंट, कैफे या लाउंज के साथ हुक्का सेवाएं भी प्रदान करना चाहते हैं।

यदि भविष्य में अदालत यह निष्कर्ष निकालती है कि हुक्का बार वास्तव में “Res Extra Commercium” की श्रेणी में आते हैं, तो ऐसे व्यवसायों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।

दूसरी ओर यदि विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत कुछ सीमित परिस्थितियों में संचालन की अनुमति योग्य मानती है, तो राज्य सरकारों को स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार करना पड़ सकता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम व्यापारिक स्वतंत्रता

यह विवाद मूल रूप से दो महत्वपूर्ण संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन का प्रश्न है।

एक ओर नागरिकों और व्यवसायियों का यह तर्क होता है कि उन्हें व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता प्राप्त है। दूसरी ओर राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों के स्वास्थ्य और सार्वजनिक हित की रक्षा करे।

भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर यह माना है कि जब व्यापारिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच टकराव हो, तब सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जा सकती है।

हुक्का बार विवाद भी इसी व्यापक संवैधानिक बहस का हिस्सा है।

भविष्य की दिशा

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत ने केवल अंतरिम राहत देने से इनकार किया है और याचिका को अन्य समान मामलों के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।

आने वाले समय में जब इन सभी मामलों की संयुक्त सुनवाई होगी, तब अदालत को हुक्का बारों की कानूनी स्थिति, लाइसेंस व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उसने स्पष्ट संकेत दिया है कि हुक्का बार चलाना कोई मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। अदालत ने “Res Extra Commercium” सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ गतिविधियां सामान्य व्यापारिक स्वतंत्रता के दायरे से बाहर हो सकती हैं।

यद्यपि मामले का अंतिम निर्णय अभी शेष है, फिर भी यह आदेश व्यापारिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और राज्य की नियामक शक्तियों के बीच संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि किसी व्यवसाय को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने के लिए केवल आर्थिक गतिविधि होना पर्याप्त नहीं है; उसे कानून और सार्वजनिक हित की कसौटी पर भी खरा उतरना होता है।