अब हर मामले में सीधे एफआईआर नहीं होगी : यूपी में 31 अधिनियमों पर बड़ा बदलाव, हाईकोर्ट के आदेश के बाद नई व्यवस्था लागू
पुलिस और परिवाद प्रणाली को लेकर बड़ा प्रशासनिक निर्णय
उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है। अब कई विशेष अधिनियमों में पुलिस थानों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को अदालत में परिवाद (Complaint Case) दायर करना होगा। यह व्यवस्था इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों और शासन स्तर पर जारी आदेशों के बाद लागू की जा रही है।
बरेली पुलिस द्वारा कुछ विशेष अधिनियमों में सीधे मुकदमा दर्ज करने पर आपत्ति जताए जाने के बाद यह पूरा मामला गंभीरता से शासन के सामने आया। इसके बाद पुलिस महानिदेशक अभियोजन कार्यालय ने विभिन्न कानूनों का परीक्षण कराया और दो अलग-अलग सूचियां तैयार कीं। पहली सूची में 31 ऐसे अधिनियम शामिल किए गए जिनमें सीधे परिवाद दायर करने का प्रावधान है, जबकि दूसरी सूची में 39 ऐसे अधिनियम रखे गए जिनमें पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज कर सकती है।
शासन ने इन सूचियों को प्रदेश के सभी जिलों में भेजते हुए स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जिन अधिनियमों में परिवाद दायर करने की व्यवस्था है, उनमें किसी भी थाने में सीधे प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी। हालांकि दहेज निषेध अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम को इससे अलग रखा गया है। इन दोनों कानूनों में परिवाद का प्रावधान होने के बावजूद पुलिस मुकदमा दर्ज कर सकेगी।
आखिर क्या है पूरा विवाद
पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे मामले सामने आ रहे थे जिनमें विशेष अधिनियमों के तहत पुलिस थानों में सीधे एफआईआर दर्ज कर ली जाती थी, जबकि संबंधित कानून में ऐसा करने का स्पष्ट अधिकार पुलिस को नहीं था। कई मामलों में अदालतों ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
बरेली पुलिस ने इस संबंध में शासन को अवगत कराया कि अनेक अधिनियमों में मुकदमा दर्ज करने का अधिकार सीधे पुलिस को नहीं दिया गया है। इन कानूनों में पीड़ित पक्ष या अधिकृत अधिकारी को सीधे न्यायालय में परिवाद दाखिल करना होता है। यदि पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज करती है तो बाद में कानूनी जटिलताएं पैदा होती हैं और मुकदमे न्यायालय में टिक नहीं पाते।
इसी आपत्ति के बाद शासन स्तर पर व्यापक कानूनी समीक्षा शुरू हुई। पुलिस महानिदेशक अभियोजन कार्यालय ने विभिन्न अधिनियमों का अध्ययन कर यह तय किया कि किन मामलों में पुलिस कार्रवाई कर सकती है और किन मामलों में न्यायालय में परिवाद ही वैधानिक रास्ता है।
क्या होता है परिवाद मामला
सामान्य तौर पर जब कोई व्यक्ति पुलिस थाने में जाकर शिकायत दर्ज कराता है और पुलिस एफआईआर लिखती है, तो उसे राज्य बनाम आरोपी के रूप में आपराधिक मुकदमा माना जाता है। लेकिन कुछ विशेष कानूनों में यह व्यवस्था अलग होती है।
इन मामलों में पीड़ित व्यक्ति, अधिकृत अधिकारी या संबंधित विभाग सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद दायर करता है। अदालत शिकायत की जांच करती है, बयान दर्ज करती है और प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने पर आरोपी को तलब करती है।
ऐसी प्रक्रिया का उद्देश्य यह माना जाता है कि कुछ तकनीकी या विशेष प्रकृति के मामलों में सीधे पुलिस कार्रवाई के बजाय न्यायिक परीक्षण अधिक उपयुक्त होता है।
31 अधिनियमों में सीधे एफआईआर पर रोक
शासन द्वारा जारी सूची में ऐसे 31 अधिनियम शामिल बताए जा रहे हैं जिनमें सीधे परिवाद दायर करने का प्रावधान है। इन कानूनों के तहत अब पुलिस थाने में सीधे प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी।
हालांकि शासन की पूरी सूची सार्वजनिक रूप से विस्तार से सामने नहीं आई है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें कई ऐसे कानून शामिल हैं जिनमें शिकायत करने का अधिकार केवल अधिकृत अधिकारी को होता है।
उदाहरण के तौर पर कुछ आर्थिक, प्रशासनिक, तकनीकी तथा विशेष नियामक कानूनों में केवल विभागीय अधिकारी ही शिकायत कर सकता है। ऐसे मामलों में आम व्यक्ति द्वारा थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया वैधानिक नहीं मानी जाती।
39 अधिनियमों में पुलिस को मिला अधिकार
दूसरी ओर 39 ऐसे अधिनियमों की सूची भी तैयार की गई है जिनमें पुलिस को सीधे मुकदमा दर्ज करने का अधिकार प्राप्त है। इन मामलों में पहले की तरह एफआईआर दर्ज होती रहेगी और पुलिस विवेचना कर सकेगी।
इस सूची का उद्देश्य थानों में भ्रम की स्थिति समाप्त करना है। अक्सर पुलिसकर्मी यह तय नहीं कर पाते थे कि किसी विशेष अधिनियम में एफआईआर लिखी जाए या शिकायतकर्ता को अदालत भेजा जाए। अब शासन के स्पष्ट निर्देशों के बाद प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने की संभावना है।
दहेज और पशु क्रूरता कानून को क्यों मिली छूट
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दहेज निषेध अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम को विशेष छूट दी गई है। इन दोनों कानूनों में परिवाद की व्यवस्था होने के बावजूद पुलिस सीधे मुकदमा दर्ज कर सकेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा सामाजिक संवेदनशीलता और अपराध की प्रकृति को देखते हुए किया गया है। दहेज उत्पीड़न के मामलों में तत्काल पुलिस हस्तक्षेप आवश्यक माना जाता है क्योंकि इसमें महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न जुड़ा होता है।
इसी प्रकार पशु क्रूरता के मामलों में भी कई बार त्वरित कार्रवाई जरूरी होती है। यदि हर मामले में केवल अदालत में परिवाद दाखिल करने की प्रक्रिया अपनाई जाए तो कार्रवाई में देरी हो सकती है।
एसएसपी अनुराग आर्य का बयान
बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य ने स्पष्ट कहा है कि हाई कोर्ट और शासन के आदेशों का पूरी तरह पालन कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सभी थानों को निर्देश दिए गए हैं कि जिन अधिनियमों में परिवाद दायर करने का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज न की जाए।
एसएसपी के अनुसार इस व्यवस्था का उद्देश्य कानूनी प्रक्रिया को सही दिशा में लागू करना है ताकि बाद में मुकदमों में तकनीकी त्रुटियां सामने न आएं।
थानों में बदलेगी कार्यप्रणाली
इस नई व्यवस्था के बाद प्रदेश के थानों की कार्यप्रणाली में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब पुलिस को पहले यह देखना होगा कि संबंधित मामला किस अधिनियम के अंतर्गत आता है और उसमें एफआईआर का अधिकार है या नहीं।
यदि मामला परिवाद योग्य श्रेणी में आता है तो शिकायतकर्ता को अदालत जाने की सलाह दी जाएगी। इससे एक ओर पुलिस पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ कम होगा, वहीं दूसरी ओर कई मामलों में न्यायालय की भूमिका प्रारंभिक स्तर पर बढ़ जाएगी।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर
इस व्यवस्था का सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर भी पड़ेगा। अब कई मामलों में लोगों को सीधे थाने जाने के बजाय अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है।
हालांकि कानूनी जानकारों का कहना है कि इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक मजबूत होगी क्योंकि जिन मामलों में कानून ने परिवाद का प्रावधान किया है, वहां प्रारंभिक जांच न्यायालय की निगरानी में होगी।
लेकिन दूसरी ओर यह चिंता भी सामने आ रही है कि ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे लोगों को यह समझने में कठिनाई हो सकती है कि किस मामले में थाने जाना है और किसमें अदालत।
वकीलों और न्यायिक विशेषज्ञों की राय
कई अधिवक्ताओं का मानना है कि यह कदम कानूनी रूप से उचित है। उनका कहना है कि पुलिस को केवल उन्हीं मामलों में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए जहां कानून स्पष्ट रूप से ऐसा अधिकार देता हो।
विशेषज्ञों के अनुसार वर्षों से कई मामलों में प्रक्रिया संबंधी त्रुटियां हो रही थीं। अदालतों में मुकदमे केवल इस आधार पर निरस्त हो जाते थे कि संबंधित कानून में एफआईआर का प्रावधान ही नहीं था। नई व्यवस्था से ऐसे विवाद कम होंगे।
हालांकि कुछ अधिवक्ताओं ने यह चिंता भी जताई है कि यदि लोगों को बार-बार अदालत भेजा जाएगा तो न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी और खर्चीली हो सकती है।
हाई कोर्ट के आदेश का महत्व
इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद लागू हुई यह व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को दर्शाती है। अदालतें लगातार यह स्पष्ट कर रही हैं कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया का पालन अक्षरशः होना चाहिए।
भारतीय न्याय व्यवस्था में प्रक्रिया का विशेष महत्व है। यदि कानून किसी विशेष तरीके से कार्रवाई का निर्देश देता है तो उसका पालन करना अनिवार्य होता है। यही कारण है कि शासन ने अब अलग-अलग अधिनियमों की स्पष्ट सूची जारी की है।
पुलिस पर भी कम होगा दबाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस निर्णय से पुलिस पर भी अनावश्यक दबाव कम होगा। कई बार ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस को विवेचना करनी पड़ती थी जबकि बाद में अदालत में मामला तकनीकी आधार पर कमजोर पड़ जाता था।
अब केवल उन्हीं मामलों में पुलिस विवेचना करेगी जिनमें उसे वैधानिक अधिकार प्राप्त है। इससे जांच की गुणवत्ता सुधारने में भी मदद मिल सकती है।
भविष्य में और स्पष्ट होगी व्यवस्था
संभावना जताई जा रही है कि आने वाले समय में शासन सभी अधिनियमों की विस्तृत सूची सार्वजनिक कर सकता है ताकि आम लोगों, अधिवक्ताओं और पुलिसकर्मियों को स्पष्ट जानकारी मिल सके।
इसके अलावा पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी अब इन कानूनी प्रावधानों को विशेष रूप से शामिल किया जा सकता है ताकि थानों में किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।
न्यायिक प्रक्रिया और कानून के शासन की दिशा में कदम
यह पूरा घटनाक्रम कानून के शासन (Rule of Law) की अवधारणा को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस, प्रशासन और न्यायालय सभी को कानून के दायरे में रहकर कार्य करना होता है।
यदि किसी अधिनियम में परिवाद की व्यवस्था है तो पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। इसी प्रकार जहां पुलिस को अधिकार प्राप्त है वहां उसे कार्रवाई करने से रोका भी नहीं जा सकता। शासन की नई व्यवस्था इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में 31 अधिनियमों में सीधे एफआईआर दर्ज न करने और परिवाद दायर करने की नई व्यवस्था प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से बड़ा बदलाव मानी जा रही है। इससे जहां कानून की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होगी, वहीं पुलिस और न्यायालय की भूमिकाएं भी अलग-अलग रूप से परिभाषित होंगी।
अनुराग आर्य के बयान से साफ है कि शासन इस व्यवस्था को गंभीरता से लागू करना चाहता है। आने वाले समय में इसका असर प्रदेश की आपराधिक न्याय प्रणाली पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।