कटरा पॉक्सो केस में हाईकोर्ट सख्त: जांच में गंभीर लापरवाही पर एसआईटी गठन के आदेश, पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
जम्मू-कश्मीर के कटरा से जुड़े एक संवेदनशील पॉक्सो मामले में हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए बड़ा हस्तक्षेप किया है। नाबालिग से यौन शोषण और उसके बाद जन्मी बच्ची से जुड़े इस मामले में अदालत ने पाया कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां हैं। डीएनए रिपोर्ट में आरोपी का जैविक संबंध बच्ची से नहीं मिलने के बावजूद पुलिस असली आरोपी तक नहीं पहुंच सकी। इस स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने जम्मू के आईजी को विशेष जांच दल (SIT) गठित करने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी, पीड़िता को न्याय दिलाने की प्रक्रिया और आपराधिक जांच की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। अदालत ने साफ कहा कि यह स्पष्ट है कि नाबालिग के साथ यौन शोषण हुआ और वह गर्भवती हुई, लेकिन पुलिस अब तक वास्तविक आरोपी की पहचान नहीं कर सकी, जो जांच में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
क्या है पूरा मामला?
कटरा थाना क्षेत्र में दर्ज यह मामला एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण से जुड़ा है। मामला इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि पीड़िता गर्भवती हुई और बाद में उसने एक बच्ची को जन्म दिया। इस घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी पवन कुमार उर्फ राजा को गिरफ्तार किया और उसके खिलाफ जांच आगे बढ़ाई।
जांच के दौरान बच्ची के जैविक पिता का पता लगाने के लिए डीएनए परीक्षण कराया गया। लेकिन रिपोर्ट आने के बाद मामला पूरी तरह नया मोड़ ले गया। डीएनए जांच में सामने आया कि आरोपी पवन कुमार बच्ची का जैविक पिता नहीं है। यानी जिस व्यक्ति को पुलिस ने आरोपी बनाया था, उसका जैविक संबंध बच्ची से नहीं मिला।
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एफआईआर रद्द करने की मांग की। उसका कहना था कि जब डीएनए रिपोर्ट ही उसे बच्ची का पिता नहीं बता रही, तो उसके खिलाफ दर्ज मामला टिक नहीं सकता।
सरकार ने क्या दलील दी?
मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।
सरकारी पक्ष ने यह दलील दी कि रिकॉर्ड पर पीड़िता का बयान भी मौजूद है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यानी सरकार का कहना था कि डीएनए रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण साक्ष्य जरूर है, लेकिन यह अकेला आधार नहीं हो सकता जिसके आधार पर पूरा मामला खत्म कर दिया जाए।
यही कारण था कि अदालत के सामने दो महत्वपूर्ण सवाल थे—पहला, क्या आरोपी के खिलाफ एफआईआर जारी रहनी चाहिए? और दूसरा, अगर डीएनए रिपोर्ट आरोपी से मेल नहीं खाती तो असली आरोपी कौन है?
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति Rajnesh Oswal ने जांच एजेंसी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि नाबालिग लड़की का यौन शोषण हुआ और वह गर्भवती भी हुई। बच्ची का जन्म इस बात का प्रत्यक्ष संकेत है कि अपराध हुआ है। लेकिन जब डीएनए रिपोर्ट आरोपी से मेल नहीं खा रही, तब यह पुलिस की जिम्मेदारी थी कि वह वास्तविक आरोपी तक पहुंचती।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस ऐसा करने में विफल रही, जो जांच में गंभीर लापरवाही का मामला है।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस ने जल्दबाजी में चालान पेश किया, ताकि आरोपी को डिफॉल्ट जमानत का लाभ न मिल सके। अदालत की यह टिप्पणी जांच एजेंसी की कार्यशैली पर एक गंभीर सवाल मानी जा रही है।
डिफॉल्ट जमानत पर अदालत की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
आपराधिक मामलों में कानून यह व्यवस्था देता है कि यदि पुलिस निर्धारित समय के भीतर जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को डिफॉल्ट जमानत का अधिकार मिल सकता है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस ने वास्तविक जांच पूरी किए बिना जल्दबाजी में चालान पेश किया, ताकि आरोपी इस कानूनी अधिकार का लाभ न उठा सके।
यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि अदालत अप्रत्यक्ष रूप से जांच की निष्पक्षता और गुणवत्ता पर सवाल उठा रही है।
एफआईआर रद्द क्यों नहीं हुई?
हालांकि आरोपी ने एफआईआर रद्द करने की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि डीएनए रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में जरूर एक महत्वपूर्ण तथ्य है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अपराध हुआ ही नहीं।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला नाबालिग के यौन शोषण से जुड़ा है और बच्ची के जन्म से अपराध का तथ्य प्रथम दृष्टया सामने आता है।
ऐसे में केवल इस आधार पर कि आरोपी बच्ची का जैविक पिता नहीं है, पूरी एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।
अदालत का जोर इस बात पर रहा कि असली आरोपी की पहचान जरूरी है और जांच अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती।
एसआईटी गठन के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने जम्मू के आईजी को निर्देश दिया कि वह सात दिनों के भीतर एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करें।
अदालत ने कहा कि यह एसआईटी एसपी रैंक के अधिकारी की अगुवाई में बनाई जाए ताकि मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच हो सके।
एसआईटी का उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि असली आरोपी कौन है और पुलिस जांच में कहां-कहां लापरवाही हुई।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने सामान्य पुलिस जांच पर भरोसा जताने के बजाय स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच की जरूरत महसूस की।
सत्र न्यायाधीश को भी दिए निर्देश
हाईकोर्ट ने रियासी के सत्र न्यायाधीश को भी निर्देश दिया कि चालान को कटरा थाना भेजकर आगे की जांच सुनिश्चित कराई जाए।
इसका मतलब यह है कि अदालत ने केवल एसआईटी गठन का आदेश नहीं दिया, बल्कि निचली अदालत स्तर पर भी प्रक्रिया को पुनः सक्रिय करने का निर्देश दिया है ताकि जांच नए सिरे से और प्रभावी ढंग से हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्याय के हित में अदालत जरूरत पड़ने पर आगे की जांच (Further Investigation) के आदेश दे सकती है।
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में यह सिद्धांत स्थापित है कि यदि अदालत को लगे कि जांच अधूरी, त्रुटिपूर्ण या पक्षपातपूर्ण है, तो वह आगे की जांच या विशेष जांच के निर्देश दे सकती है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने इस मामले में एसआईटी जांच का रास्ता अपनाया।
पॉक्सो मामलों में जांच की संवेदनशीलता क्यों जरूरी है?
POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। ऐसे मामलों में जांच केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह पीड़िता के न्याय और आरोपी के निष्पक्ष ट्रायल दोनों से जुड़ी होती है।
यदि पुलिस गलत आरोपी को पकड़ ले या वास्तविक अपराधी तक न पहुंचे, तो इससे दोहरा नुकसान होता है—एक तरफ निर्दोष व्यक्ति प्रभावित हो सकता है और दूसरी तरफ असली अपराधी बच सकता है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां इसी चिंता को सामने लाती हैं।
29 जून तक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने एसआईटी और जांच एजेंसियों को निर्देश दिया है कि मामले की प्रगति रिपोर्ट 29 जून तक अदालत में पेश की जाए।
इसका मतलब है कि अदालत इस मामले की निगरानी जारी रखेगी और यह देखेगी कि जांच वास्तव में आगे बढ़ रही है या नहीं।
निष्कर्ष
कटरा पॉक्सो केस में हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक आरोपी को राहत देने या एफआईआर को लेकर फैसला नहीं है, बल्कि यह जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जब नाबालिग के यौन शोषण और गर्भधारण जैसे गंभीर तथ्य सामने हैं, तो केवल औपचारिक जांच से काम नहीं चलेगा।
डीएनए रिपोर्ट आरोपी से मेल नहीं खाने के बाद भी असली आरोपी तक न पहुंच पाना पुलिस जांच पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इसीलिए हाईकोर्ट ने एसआईटी जांच का आदेश देकर यह संदेश दिया है कि न्याय केवल मामला दर्ज करने से नहीं, बल्कि वास्तविक अपराधी तक पहुंचने से पूरा होता है।
अब 29 जून तक आने वाली रिपोर्ट पर नजर रहेगी, क्योंकि वही तय करेगी कि इस संवेदनशील मामले में आगे न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ेगी।