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इलाहाबाद हाईकोर्ट से यूट्यूबर गौतम खट्टर को बड़ी राहत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाओं की बहस फिर तेज

इलाहाबाद हाईकोर्ट से यूट्यूबर गौतम खट्टर को बड़ी राहत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाओं की बहस फिर तेज

        इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चर्चित यूट्यूबर और स्वयं को ‘सनातन महासंघ’ का संस्थापक बताने वाले गौतम खट्टर को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा को 14 जुलाई तक बढ़ा दिया है। यह मामला सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा से जुड़ा हुआ है। अदालत के इस आदेश के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि किसी धार्मिक व्यक्तित्व या परंपरा की आलोचना आखिर किस सीमा तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में मानी जाएगी और कब वह आपराधिक दायित्व का रूप ले सकती है।

मामले की सुनवाई जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की। अदालत ने शिकायतकर्ता पक्ष को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी। फिलहाल अदालत के आदेश से गौतम खट्टर को गिरफ्तारी से अस्थायी राहत मिल गई है, लेकिन कानूनी और सामाजिक स्तर पर यह विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो और उससे जुड़े कथित बयानों को लेकर शुरू हुआ। कानपुर निवासी प्रियंका द्विवेदी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में आरोप लगाया गया कि गौतम खट्टर ने ‘श्री करौली शंकर महादेव बाबा’ उर्फ ‘करौली सरकार’ के खिलाफ अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणियां कीं।

शिकायत के अनुसार, गौतम खट्टर ने ‘श्री श्री 1008 पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर दास जी महाराज’ के महामंडलेश्वर पदाभिषेक से संबंधित वीडियो साझा किया और उसके माध्यम से कथित रूप से ऐसी टिप्पणियां कीं जिससे अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

एफआईआर में यह भी आरोप लगाया गया कि खट्टर ने हिंदू समाज में बच्चों का नाम राम, श्याम, शिव और अन्य देवी-देवताओं के नाम पर रखने की परंपरा पर आपत्ति जताई। शिकायतकर्ता के अनुसार उन्होंने यह टिप्पणी भी की कि जो लोग स्वयं को भगवान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, उन्हें “चौराहे पर जूतों से पीटना चाहिए।”

इन टिप्पणियों को धार्मिक रूप से अपमानजनक और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाला बताते हुए कानपुर पुलिस ने गौतम खट्टर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया।

कौन हैं करौली सरकार?

‘करौली सरकार’ नाम से प्रसिद्ध धार्मिक व्यक्तित्व पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से काफी चर्चित हुए हैं। उनके अनुयायी बड़ी संख्या में विभिन्न राज्यों में मौजूद हैं। उनके धार्मिक कार्यक्रमों और प्रवचनों में हजारों लोग शामिल होते हैं।

इसी कारण जब सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ कथित टिप्पणी सामने आई तो उनके समर्थकों और अनुयायियों में नाराजगी फैल गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि ऐसे बयान न केवल किसी धार्मिक गुरु का अपमान हैं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था को भी ठेस पहुंचाते हैं।

हालांकि दूसरी ओर कुछ लोग यह तर्क भी दे रहे हैं कि किसी धार्मिक या सामाजिक व्यक्तित्व की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं की जा सकती।

गौतम खट्टर की ओर से क्या दलील दी गई?

गौतम खट्टर की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत में विस्तृत दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के कथित बयान का वास्तविक आशय केवल इतना था कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को भगवान के रूप में प्रस्तुत न करे।

वकील ने अदालत को बताया कि यह एक राय (Opinion) की अभिव्यक्ति थी और किसी भी कानून के तहत इसे अपराध नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा, सामाजिक व्यवहार या व्यक्ति विशेष की आलोचना करना स्वतः अपराध नहीं बन जाता।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि एफआईआर में ऐसा कोई ठोस आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि गौतम खट्टर की मंशा जानबूझकर किसी धर्म, समुदाय या समूह की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की थी।

अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला

गौतम खट्टर की ओर से सबसे महत्वपूर्ण कानूनी तर्क भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) को लेकर दिया गया। अधिवक्ता ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है और याचिकाकर्ता के बयान इसी संवैधानिक संरक्षण के अंतर्गत आते हैं।

भारतीय न्यायपालिका कई बार अपने फैसलों में यह स्पष्ट कर चुकी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल लोकप्रिय विचारों तक सीमित नहीं है। इसमें ऐसे विचार भी शामिल हैं जो लोगों को असहज, कठोर या अप्रिय लग सकते हैं। हालांकि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा धार्मिक सद्भाव बनाए रखने के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

इसी संतुलन को लेकर अदालतों में अक्सर विवाद खड़े होते हैं कि आखिर किस प्रकार का बयान केवल राय माना जाएगा और किसे आपराधिक उकसावा या धार्मिक घृणा फैलाने वाला वक्तव्य समझा जाएगा।

वैमनस्य फैलाने के आरोप पर बचाव पक्ष की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि वैमनस्य फैलाने या समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करने से जुड़े अपराध लागू करने के लिए कम से कम दो अलग-अलग समुदायों या समूहों का होना आवश्यक होता है।

अधिवक्ता ने कहा कि वर्तमान मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि गौतम खट्टर के बयान से दो समुदायों के बीच तनाव या शांति व्यवस्था भंग होने की स्थिति उत्पन्न हुई।

बचाव पक्ष के अनुसार, केवल किसी धार्मिक गुरु की आलोचना या कठोर टिप्पणी अपने आप में सामाजिक वैमनस्य फैलाने का अपराध नहीं बनती, जब तक कि उसका उद्देश्य जानबूझकर हिंसा, नफरत या अशांति फैलाना न हो।

शिकायतकर्ता पक्ष का क्या कहना है?

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि सोशल मीडिया के इस दौर में सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान बहुत व्यापक प्रभाव डालते हैं। यदि किसी धार्मिक व्यक्तित्व के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाए तो उससे अनुयायियों की भावनाएं आहत होती हैं और समाज में तनाव पैदा हो सकता है।

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि गौतम खट्टर ने जानबूझकर उत्तेजक शब्दों का प्रयोग किया और धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाया। उनके अनुसार यह केवल व्यक्तिगत राय नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भड़काऊ टिप्पणी थी।

संभव है कि अगली सुनवाई में शिकायतकर्ता पक्ष अदालत के समक्ष वीडियो रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत करे।

सोशल मीडिया और धार्मिक विवाद

पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया धार्मिक विवादों का बड़ा मंच बनकर उभरा है। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर तीखी बहसें आम हो गई हैं।

कई बार कंटेंट क्रिएटर अधिक व्यूज, लोकप्रियता और चर्चा पाने के लिए उत्तेजक भाषा या विवादास्पद बयान का सहारा लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां धर्म और आस्था का गहरा सामाजिक महत्व है, वहां सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान जल्दी विवाद का रूप ले लेते हैं।

अदालतों के सामने बढ़ती चुनौती

ऐसे मामलों में अदालतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन के बीच उचित सीमा तय करने की होती है। एक ओर संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, वहीं दूसरी ओर कानून धार्मिक भावनाओं को भड़काने, नफरत फैलाने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने वाले बयानों पर रोक भी लगाता है।

इसी कारण न्यायपालिका हर मामले में बयान की भाषा, संदर्भ, उद्देश्य और उसके संभावित प्रभाव का विश्लेषण करती है।

भारतीय न्यायालय कई बार यह कह चुके हैं कि केवल किसी विचार से असहमति होना या उससे आहत महसूस करना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि क्या वास्तव में बयान का उद्देश्य दुर्भावनापूर्ण था और क्या उससे समाज में अशांति फैलने की वास्तविक संभावना थी।

आईटी एक्ट की धारा 67 क्या है?

गौतम खट्टर के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 भी लगाई गई है। यह धारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने से संबंधित है।

हालांकि इस धारा का उपयोग आमतौर पर अश्लील या आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री के मामलों में किया जाता है, लेकिन कई बार सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो या संदेशों को लेकर भी इसका प्रयोग किया जाता है।

अब अदालत को यह देखना होगा कि गौतम खट्टर के कथित वीडियो और टिप्पणियां वास्तव में इस धारा के दायरे में आती हैं या नहीं।

अंतरिम सुरक्षा का क्या मतलब है?

हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा का अर्थ यह है that फिलहाल पुलिस गौतम खट्टर को गिरफ्तार नहीं कर सकेगी। यह अंतिम राहत नहीं होती बल्कि अदालत द्वारा मामले की अगली सुनवाई तक दिया गया अस्थायी संरक्षण होता है।

यदि अदालत भविष्य में यह पाती है कि एफआईआर प्रथम दृष्टया कानून सम्मत है और जांच जरूरी है, तो अंतरिम सुरक्षा समाप्त भी की जा सकती है। वहीं यदि अदालत को लगे कि मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है या एफआईआर में अपराध का पर्याप्त आधार नहीं है, तो एफआईआर रद्द करने पर भी विचार हो सकता है।

समाज में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण की तस्वीर

यह मामला केवल एक यूट्यूबर और धार्मिक गुरु के बीच विवाद नहीं है, बल्कि यह आज के समाज में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण की भी तस्वीर पेश करता है। सोशल मीडिया ने लोगों को खुलकर बोलने का मंच दिया है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी है।

एक वर्ग मानता है कि धार्मिक व्यक्तित्वों और परंपराओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि दूसरा वर्ग इसे आस्था पर हमला मानता है। यही टकराव अब अदालतों तक पहुंच रहा है।

अगली सुनवाई पर टिकी नजरें

अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी। उस दिन अदालत शिकायतकर्ता पक्ष का जवाब, डिजिटल साक्ष्य और दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुन सकती है।

संभव है कि अदालत इस दौरान यह भी विचार करे कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया आपराधिक अपराध बनाते हैं या मामला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।

फिलहाल हाईकोर्ट द्वारा गिरफ्तारी से राहत बढ़ाए जाने से गौतम खट्टर को अस्थायी कानूनी राहत जरूर मिली है, लेकिन यह विवाद आने वाले समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक संवेदनशीलता और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी जैसे बड़े संवैधानिक प्रश्नों पर महत्वपूर्ण बहस का आधार बन सकता है।