एसिड अटैक पीड़िताओं के पुनर्वास पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: यूपी सरकार के शीर्ष अधिकारियों को किया तलब, कहा—‘मुआवजा नहीं, गरिमा के साथ जीवन देना राज्य का दायित्व’
भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी अपराध की पीड़िता को केवल कानूनी न्याय दिला देना ही राज्य का अंतिम दायित्व नहीं है, बल्कि उसे सम्मानजनक जीवन की पुनर्स्थापना भी सुनिश्चित करनी होगी। इसी संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हुए Allahabad High Court की खंडपीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और माननीय न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद शामिल थे, ने 14 मई 2026 को एक अत्यंत कड़े शब्दों में आदेश पारित करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) तथा महिला एवं बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से तलब कर लिया।
यह मामला केवल एक याचिकाकर्ता की पीड़ा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत ने इसे राज्य की नीतिगत विफलता और संवैधानिक दायित्वों की अनदेखी के रूप में देखा। अदालत ने स्पष्ट कहा कि एसिड अटैक जैसे जघन्य अपराधों में केवल अपराधी को सजा दिला देना पर्याप्त नहीं है। यदि पीड़िता आजीवन शारीरिक, मानसिक और सामाजिक यातना झेल रही है, तो राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उसे पुनर्वास, चिकित्सा, आर्थिक सहायता, शिक्षा और रोजगार के माध्यम से जीवन की नई शुरुआत करने में सहायता करे।
अदालत की सख्त टिप्पणी ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा—
“जहां ऐसे जघन्य अपराध होते हैं जिनसे किसी नागरिक का जीवन स्थायी रूप से तबाह हो जाता है, वहां राज्य का संवैधानिक दायित्व केवल अपराधी पर मुकदमा चलाने तक ही सीमित नहीं है। राज्य का यह भी दायित्व है कि वह सार्थक पुनर्वास और पर्याप्त पुनर्स्थापनात्मक सहायता सुनिश्चित करे ताकि ऐसे अपराधों के पीड़ित भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमा के साथ जीवन जी सकें।”
यह टिप्पणी केवल कानूनी अवलोकन नहीं थी, बल्कि न्यायपालिका द्वारा राज्य को उसके संवैधानिक उत्तरदायित्व की याद दिलाने वाली कठोर चेतावनी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि एसिड अटैक पीड़िता का जीवन केवल शरीर पर पड़े घावों तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसका पूरा सामाजिक अस्तित्व, मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और जीवन की संभावनाएं प्रभावित हो जाती हैं।
फराहा की कहानी ने अदालत को झकझोरा
इस मामले की याचिकाकर्ता फराहा की पीड़ा ने अदालत के सामने राज्य की मुआवजा नीति की वास्तविकता उजागर कर दी। घटना के समय फराहा की उम्र मात्र 24 वर्ष थी। एसिड अटैक के बाद उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। गंभीर शारीरिक क्षति, चेहरे और शरीर पर स्थायी घाव, लगातार चिकित्सा उपचार की आवश्यकता और सामाजिक अस्वीकार्यता जैसी परिस्थितियों के बीच उसने न्याय की लड़ाई लड़ी।
याचिका में बताया गया कि फराहा को पीड़ित मुआवजा योजना के तहत केवल 5 लाख रुपये और प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से 1 लाख रुपये मिले। यानी लगभग नौ वर्षों में कुल 6 लाख रुपये की सहायता दी गई।
अदालत ने इस तथ्य पर गंभीर चिंता जताई कि एसिड अटैक जैसी घटना, जिसमें पीड़िता को आजीवन कई सर्जरी, दवाइयों, मानसिक उपचार और पुनर्वास की आवश्यकता होती है, उसमें इतनी सीमित सहायता कैसे पर्याप्त मानी जा सकती है।
फराहा के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि 26 जुलाई 2025 को उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को प्रतिवेदन भी दिया गया था, लेकिन आज तक उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। यह प्रशासनिक उदासीनता अदालत की नाराजगी का बड़ा कारण बनी।
सरकार का जवाब अदालत को नहीं कर सका संतुष्ट
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता श्री मनीष गोयल ने अदालत को बताया कि गृह विभाग और महिला एवं बाल कल्याण विभाग एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए व्यापक नीति तैयार करने पर विचार कर रहे हैं।
लेकिन अदालत ने इस दलील को अपर्याप्त माना।
अपर मुख्य सचिव (गृह) द्वारा दाखिल शपथपत्र का परीक्षण करते हुए अदालत ने कहा कि उसमें केवल विभागीय बैठकों और विचार-विमर्श का उल्लेख है, जबकि कोई ठोस नीति, कोई पुनर्वास तंत्र, कोई समयसीमा और कोई स्पष्ट योजना प्रस्तुत नहीं की गई।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि वर्षों से केवल “विचाराधीन” कहकर मामले को लंबित रखना पीड़िताओं के साथ अन्याय है।
अदालत की टिप्पणी थी कि यदि राज्य गंभीर है, तो उसे केवल कागजी चर्चा नहीं बल्कि व्यावहारिक और लागू करने योग्य नीति प्रस्तुत करनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का हवाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में Parivartan Kendra v. Union of India के ऐतिहासिक निर्णय पर भरोसा जताया।
सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि एसिड अटैक पीड़िताओं को दिया जाने वाला मुआवजा केवल प्रतीकात्मक नहीं होना चाहिए। अदालत ने माना था कि एसिड अटैक केवल शारीरिक चोट नहीं देता, बल्कि यह किसी व्यक्ति के पूरे अस्तित्व, आत्मसम्मान और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर देता है।
इसलिए मुआवजा तय करते समय इन बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए—
- आजीवन चिकित्सा खर्च
- पुनर्निर्माण सर्जरी (Reconstructive Surgery)
- मानसिक पीड़ा और मनोवैज्ञानिक उपचार
- सामाजिक बहिष्कार और रोजगार की हानि
- सम्मानपूर्वक जीवन जीने की क्षमता का नुकसान
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को इसी संवैधानिक और न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप नीति बनानी चाहिए।
अनुच्छेद 21 और गरिमा के साथ जीवन का अधिकार
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमा, सम्मान, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के साथ जीने का अधिकार भी है।
एसिड अटैक पीड़िताओं के संदर्भ में यह अधिकार और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि अपराध के बाद उनकी सामाजिक स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य, रोजगार, विवाह, शिक्षा और सामान्य जीवन की संभावनाएं बुरी तरह प्रभावित होती हैं।
अदालत ने कहा कि राज्य का दायित्व केवल एफआईआर दर्ज करना और अपराधी पर मुकदमा चलाना नहीं है। यदि पीड़िता पुनर्वास के अभाव में सामाजिक और आर्थिक रूप से टूट जाती है, तो यह संवैधानिक असफलता होगी।
अदालत ने सरकार से क्या-क्या मांगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों शीर्ष अधिकारियों को 25 मई 2026 को अदालत में उपस्थित होकर ठोस नीति प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
अदालत ने विशेष रूप से निम्न बिंदुओं पर जवाब मांगा—
1. व्यापक मुआवजा नीति
अदालत जानना चाहती है कि एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए ऐसा मुआवजा ढांचा क्यों नहीं है जो वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो।
2. चिकित्सा उपचार और पुनर्निर्माण सर्जरी
एसिड अटैक पीड़िताओं को कई वर्षों तक सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है। अदालत ने पूछा कि राज्य इसके लिए क्या स्थायी व्यवस्था करेगा।
3. मनोवैज्ञानिक परामर्श
ऐसे अपराधों के बाद पीड़िता मानसिक आघात से गुजरती है। अदालत ने पूछा कि काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता का क्या तंत्र होगा।
4. शिक्षा और रोजगार सहायता
कई पीड़िताएं पढ़ाई या नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। अदालत ने पूछा कि उनके आर्थिक पुनर्वास की योजना क्या है।
5. मुआवजे का युक्तियुक्तकरण
क्या वर्तमान मुआवजा वास्तविक खर्च और पीड़िता की जीवनभर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किया जा रहा है?
एसिड अटैक केवल अपराध नहीं, जीवन पर हमला
अदालत की टिप्पणियों में यह संवेदनशील दृष्टिकोण स्पष्ट दिखा कि एसिड अटैक केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि किसी व्यक्ति की पहचान, आत्मसम्मान और जीवन की संभावनाओं पर सीधा हमला है।
चेहरे पर पड़े स्थायी घाव केवल शारीरिक पीड़ा नहीं देते, बल्कि पीड़िता को सामाजिक नजरों, मानसिक अवसाद, आर्थिक असुरक्षा और आत्मविश्वास के संकट से भी जूझना पड़ता है।
ऐसे में केवल एकमुश्त मुआवजा देकर राज्य अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।
क्या यह आदेश नीति निर्माण की दिशा में बड़ा मोड़ बनेगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश केवल फराहा के मामले तक सीमित नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की सभी एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए एक व्यापक पुनर्वास नीति की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकता है।
यदि अदालत के निर्देशों के अनुसार सरकार ठोस नीति बनाती है, तो इसमें निम्न सुधार संभव हैं—
- न्यूनतम मुआवजा राशि में वृद्धि
- मुफ्त चिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी
- मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्र
- शिक्षा और छात्रवृत्ति योजनाएं
- सरकारी नौकरियों या रोजगार में विशेष सहायता
- सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम
न्यायपालिका ने फिर याद दिलाया—न्याय केवल सजा नहीं, पुनर्वास भी है
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि न्याय केवल अपराधी को सजा दिलाने का नाम नहीं है।
यदि पीड़िता अपराध के बाद भी गरीबी, इलाज की कमी, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक पीड़ा में जीवन बिताने को मजबूर है, तो न्याय अधूरा है।
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि संवैधानिक शासन केवल कानून लागू करने से नहीं चलता, बल्कि नागरिक की गरिमा और पुनर्वास सुनिश्चित करने से चलता है।
अब 25 मई 2026 को अदालत के सामने सरकार क्या ठोस नीति रखती है, इस पर केवल फराहा ही नहीं, बल्कि देशभर की एसिड अटैक पीड़िताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नजरें टिकी रहेंगी। यह मामला भारतीय न्यायपालिका के उस मानवीय चेहरे को सामने लाता है, जो कहता है—पीड़िता को सिर्फ मुआवजा नहीं, सम्मान के साथ नया जीवन मिलना चाहिए।