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ग्रीष्मावकाश पर संकट से नाराज परिषदीय शिक्षक: जनगणना और भर्ती परीक्षाओं के बीच बढ़ी प्रतिकर अवकाश की मांग

ग्रीष्मावकाश पर संकट से नाराज परिषदीय शिक्षक: जनगणना और भर्ती परीक्षाओं के बीच बढ़ी प्रतिकर अवकाश की मांग

       उत्तर प्रदेश में परिषदीय शिक्षकों का ग्रीष्मावकाश इस बार विवाद और असमंजस का विषय बनता जा रहा है। एक ओर भीषण गर्मी और लंबे शैक्षणिक सत्र के बाद शिक्षक परिवार के साथ छुट्टियां बिताने, शादी-ब्याह में शामिल होने या धार्मिक एवं पर्यटन कार्यक्रमों की तैयारी में लगे थे, वहीं दूसरी ओर जनगणना और भर्ती परीक्षाओं जैसी सरकारी ड्यूटी ने उनकी योजनाओं पर पानी फेर दिया है। अब शिक्षकों ने ग्रीष्मावकाश प्रभावित होने के बदले “प्रतिकर अवकाश” यानी अतिरिक्त छुट्टी देने की मांग तेज कर दी है।

प्रदेश के अलग-अलग जिलों में बड़ी संख्या में शिक्षक पहले से ही छुट्टियों के लिए आवेदन कर चुके थे। लेकिन अचानक बढ़ी प्रशासनिक जिम्मेदारियों और विभागीय निर्देशों के कारण अब उनके सामने नई परेशानी खड़ी हो गई है। इससे शिक्षकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और शिक्षक संगठन भी खुलकर सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग पर दबाव बनाने लगे हैं।

क्यों बढ़ा विवाद?

दरअसल, इस वर्ष ग्रीष्मावकाश के दौरान कई महत्वपूर्ण सरकारी कार्य एक साथ आ गए हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर होने वाली जनगणना संबंधी तैयारियां, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं का आयोजन और अन्य प्रशासनिक गतिविधियों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जा रही है।

शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा विभाग ने पहले से जो शैक्षिक कैलेंडर जारी किया था, उसके अनुसार उन्होंने अपने निजी और पारिवारिक कार्यक्रम तय किए थे। कई शिक्षकों ने शादी समारोह, धार्मिक यात्राएं, पारिवारिक आयोजन और पर्यटन की बुकिंग तक करा रखी है। लेकिन अब अचानक ड्यूटी लगने से वे असमंजस की स्थिति में आ गए हैं।

कई शिक्षकों का आरोप है कि विभागीय आदेशों के कारण उनकी व्यक्तिगत योजनाएं प्रभावित हो रही हैं और मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है।

हजारों शिक्षकों ने किया था अवकाश आवेदन

बेसिक शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश के विभिन्न जिलों में 12 हजार से अधिक शिक्षकों ने पहले ही अवकाश के लिए आवेदन किया हुआ है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है जिन्होंने महीनों पहले अपने कार्यक्रम तय कर लिए थे।

कुछ शिक्षक परिवार के साथ बाहर जाने की योजना बना चुके थे, तो कुछ के घरों में विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रम निर्धारित थे। अब जब ड्यूटी के आदेश सामने आ रहे हैं, तो वे न तो निजी कार्यक्रम रद्द कर पा रहे हैं और न ही विभागीय जिम्मेदारियों से बच सकते हैं।

इस स्थिति ने शिक्षकों के बीच भारी नाराजगी पैदा कर दी है।

शिक्षक संगठनों ने उठाई आवाज

प्रदेश के कई शिक्षक संगठनों ने अब खुलकर प्रतिकर अवकाश की मांग शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यदि सरकार और प्रशासनिक विभाग शिक्षकों से ग्रीष्मावकाश में भी कार्य लेना चाहते हैं, तो बदले में उन्हें अतिरिक्त अवकाश दिया जाना चाहिए।

शिक्षक नेताओं का कहना है कि लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों के कारण शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता जा रहा है। कभी चुनाव ड्यूटी, कभी सर्वे, कभी जनगणना और कभी परीक्षा ड्यूटी—इन सबके बीच शिक्षण कार्य भी प्रभावित होता है।

संगठनों का कहना है कि शिक्षक भी इंसान हैं और उन्हें भी परिवार तथा व्यक्तिगत जीवन के लिए समय चाहिए। यदि सरकार उनकी छुट्टियां प्रभावित करती है, तो उसके बदले समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

शैक्षिक कैलेंडर पर उठे सवाल

शिक्षकों की नाराजगी का एक बड़ा कारण शैक्षिक कैलेंडर को लेकर भी है। उनका कहना है कि विभाग हर वर्ष पहले से शिक्षण और अवकाश का कैलेंडर जारी करता है। उसी आधार पर शिक्षक अपनी योजनाएं बनाते हैं।

लेकिन इस बार पहले एसआईआर और अब जनगणना तथा भर्ती परीक्षाओं के कारण पूरा कैलेंडर प्रभावित हो रहा है। शिक्षकों का कहना है कि यदि विभाग को पहले से पता था कि इतनी बड़ी प्रशासनिक गतिविधियां होने वाली हैं, तो उसे उसी हिसाब से अवकाश और कार्य योजना तैयार करनी चाहिए थी।

कई शिक्षकों ने यह भी कहा कि स्कूलों में पहले ही स्टाफ की कमी है। ऊपर से लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों की तैनाती से पढ़ाई का स्तर भी प्रभावित होता है।

गर्मी और मानसिक दबाव की चिंता

इस बार उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भीषण गर्मी पड़ रही है। ऐसे में शिक्षक उम्मीद कर रहे थे कि ग्रीष्मावकाश के दौरान उन्हें कुछ राहत मिलेगी। लेकिन अब लगातार ड्यूटी की संभावना ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों का कहना है कि उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई जगहों पर परीक्षा ड्यूटी और जनगणना कार्य के लिए पर्याप्त सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं होतीं। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।

महिला शिक्षकों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी के बीच अचानक अतिरिक्त सरकारी कार्यों का दबाव संभालना कठिन हो जाता है।

क्या है प्रतिकर अवकाश?

प्रतिकर अवकाश यानी “Compensatory Leave” वह अतिरिक्त छुट्टी होती है जो कर्मचारियों को सामान्य अवकाश के दौरान सरकारी कार्य करने के बदले दी जाती है। कई विभागों में यह व्यवस्था पहले से लागू है।

शिक्षकों की मांग है कि यदि ग्रीष्मावकाश में उनसे जनगणना, परीक्षा या अन्य सरकारी कार्य लिया जा रहा है, तो उन्हें बाद में समान अवधि का अतिरिक्त अवकाश दिया जाए।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि इससे कर्मचारियों के मनोबल पर सकारात्मक असर पड़ेगा और विभागीय कार्यों में भी सहयोग बेहतर मिलेगा।

सरकार और विभाग की चुनौती

दूसरी ओर प्रशासन और शिक्षा विभाग के सामने भी बड़ी चुनौती है। जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्यों और भर्ती परीक्षाओं के सफल आयोजन के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। चूंकि शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों में अनुभवी माना जाता है, इसलिए उनकी ड्यूटी अक्सर लगाई जाती है।

भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए भी बड़ी संख्या में शिक्षकों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में विभाग पूरी तरह शिक्षकों को इन जिम्मेदारियों से अलग भी नहीं कर सकता।

हालांकि अब बढ़ते विरोध और दबाव के बीच सरकार को संतुलन बनाना होगा ताकि प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित न हों और शिक्षकों की नाराजगी भी कम हो सके।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

यह पहली बार नहीं है जब शिक्षकों ने गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर नाराजगी जताई हो। इससे पहले चुनाव ड्यूटी, सर्वेक्षण, राशन कार्ड सत्यापन, पल्स पोलियो अभियान और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी शिक्षकों की ड्यूटी लगाने पर विवाद होता रहा है।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि लगातार गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के कारण पढ़ाई का नुकसान होता है और बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है।

विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शिक्षकों का मुख्य कार्य शिक्षण है। यदि उन्हें अत्यधिक प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाएगा, तो स्कूलों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।

शिक्षकों के परिवारों में भी चिंता

ग्रीष्मावकाश केवल शिक्षकों के लिए आराम का समय नहीं होता, बल्कि यह उनके परिवारों के साथ समय बिताने का भी अवसर होता है। कई शिक्षक पूरे साल स्कूल की व्यस्तता के कारण परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाते।

ऐसे में गर्मी की छुट्टियों के दौरान वे बच्चों के साथ यात्रा, रिश्तेदारों से मुलाकात या धार्मिक कार्यक्रमों की योजना बनाते हैं। लेकिन इस बार अनिश्चितता के कारण परिवारों में भी असमंजस की स्थिति है।

कई शिक्षकों ने होटल, ट्रेन और पर्यटन से जुड़ी बुकिंग पहले ही कर रखी है। अचानक ड्यूटी लगने से आर्थिक नुकसान की आशंका भी बढ़ गई है।

क्या सरकार मान सकती है मांग?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार शिक्षकों की प्रतिकर अवकाश की मांग स्वीकार करेगी? फिलहाल विभाग की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बढ़ते दबाव को देखते हुए भविष्य में कोई समाधान निकाला जा सकता है।

संभव है कि सरकार सीमित अवधि का अतिरिक्त अवकाश देने या ड्यूटी का रोटेशन तय करने जैसे विकल्पों पर विचार करे। कुछ शिक्षक संगठनों ने यह भी सुझाव दिया है कि जिन शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाए, उन्हें अतिरिक्त आर्थिक भत्ता भी दिया जाए।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश में परिषदीय शिक्षकों का ग्रीष्मावकाश इस बार केवल छुट्टियों का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह कार्यभार, अधिकार और संतुलित कार्य व्यवस्था का बड़ा सवाल बन चुका है। जनगणना और भर्ती परीक्षाओं जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के बीच शिक्षक खुद को दबाव में महसूस कर रहे हैं।

शिक्षकों की मांग है कि यदि उनकी निर्धारित छुट्टियां प्रभावित होती हैं, तो बदले में उन्हें प्रतिकर अवकाश दिया जाए। वहीं सरकार के सामने प्रशासनिक कार्यों को समय पर पूरा करने की चुनौती है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिक्षा विभाग और सरकार इस विवाद का क्या समाधान निकालते हैं और क्या शिक्षकों की नाराजगी को शांत करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।