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“बच्चा नाजायज है… गर्भपात करा लो”, शादी के 150 दिन बाद ट्विशा शर्मा की मौत ने उठाए कई सवाल

“बच्चा नाजायज है… गर्भपात करा लो”, शादी के 150 दिन बाद ट्विशा शर्मा की मौत ने उठाए कई सवाल

       नोएडा की रहने वाली 33 वर्षीय ट्विशा शर्मा की मौत ने एक बार फिर समाज, परिवार और कानून व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। शादी के महज पांच महीने बाद एक युवा महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाना केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उन मानसिक और सामाजिक दबावों की भयावह तस्वीर भी पेश करता है, जिनसे आज भी कई महिलाएं गुजरती हैं।

ट्विशा शर्मा का विवाह भोपाल के वकील समर्थ सिंह से हुआ था। परिवार के अनुसार यह रिश्ता सम्मान और विश्वास के साथ शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही महीनों में हालात इतने बिगड़ गए कि एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिला की जिंदगी खत्म हो गई। अब परिवार आरोप लगा रहा है कि ट्विशा को लगातार मानसिक प्रताड़ना दी गई, उसके चरित्र पर सवाल उठाए गए, गर्भपात के लिए दबाव बनाया गया और दहेज जैसी मांगों को लेकर भी परेशान किया गया।

इस मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि आरोप ऐसे परिवार पर लगे हैं, जो कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। ट्विशा की सास एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं और पति पेशे से वकील हैं। ऐसे में परिवार को आशंका है कि जांच प्रभावित हो सकती है।

शादी के कुछ महीनों बाद बदलने लगा माहौल

परिवार के अनुसार ट्विशा शर्मा की शादी करीब 150 दिन पहले बड़े उत्साह और धूमधाम से हुई थी। शुरुआत में सबकुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन धीरे-धीरे ट्विशा ने अपने घरवालों से परेशानियों का जिक्र करना शुरू किया।

परिजनों का दावा है कि शादी के बाद से ही उस पर मानसिक दबाव बनाया जाने लगा था। कभी उसके व्यवहार को लेकर सवाल उठाए जाते, तो कभी उसके चरित्र पर संदेह किया जाता। परिवार का कहना है कि यह केवल सामान्य वैवाहिक विवाद नहीं था, बल्कि लगातार अपमान और मानसिक उत्पीड़न का मामला था।

ट्विशा अपने परिवार के काफी करीब थी और अक्सर अपनी मां तथा भाई से बातचीत करती थी। उसके भाई मेजर हर्षित शर्मा भारतीय सेना में अधिकारी हैं। उन्होंने बताया कि बहन कई बार रोते हुए अपनी स्थिति के बारे में बताती थी, लेकिन परिवार को उम्मीद थी कि समय के साथ हालात सुधर जाएंगे।

आखिरी फोन कॉल ने बढ़ाए संदेह

घटना वाली रात का घटनाक्रम सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। परिवार के अनुसार, 12 मई की रात लगभग 10:05 बजे ट्विशा ने अपनी मां को फोन किया। उस दौरान वह काफी परेशान लग रही थी।

बताया गया कि उसने ससुराल में हो रहे उत्पीड़न की बात कही। बातचीत के दौरान अचानक उसके पति समर्थ सिंह कमरे में आ गए, जिसके बाद फोन अचानक कट गया। यह घटना परिवार को असामान्य लगी।

ट्विशा के भाई मेजर हर्षित शर्मा ने बताया कि इसके बाद परिवार ने लगातार ट्विशा, उसके पति और उसकी सास गिरिबाला सिंह को फोन किए, लेकिन काफी देर तक किसी ने जवाब नहीं दिया। परिवार की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

करीब दस मिनट बाद फोन रिसीव हुआ। परिवार ने तुरंत ट्विशा से बात कराने और उसकी स्थिति देखने को कहा। लेकिन कुछ ही मिनट बाद उन्हें बताया गया कि ट्विशा “सांस नहीं ले रही है”।

यह सूचना सुनते ही परिवार स्तब्ध रह गया।

अस्पताल पहुंचने में देरी पर सवाल

परिवार का आरोप है कि ट्विशा को समय पर अस्पताल नहीं ले जाया गया। उनका कहना है कि अस्पताल घर से केवल दस मिनट की दूरी पर था, फिर भी इलाज में देरी हुई।

जब परिवार अस्पताल पहुंचा, तब तक डॉक्टरों ने ट्विशा को मृत घोषित कर दिया था। इसके बाद परिवार के मन में कई संदेह पैदा हुए।

परिजनों का कहना है कि अगर समय पर चिकित्सकीय सहायता मिल जाती, तो शायद ट्विशा की जान बच सकती थी। यही कारण है कि अब वे पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और गहराई से जांच की मांग कर रहे हैं।

“बच्चा नाजायज है” — परिवार का सबसे गंभीर आरोप

इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू गर्भावस्था और गर्भपात को लेकर लगाए गए आरोप हैं। मेजर हर्षित शर्मा का दावा है कि ट्विशा गर्भवती थी और वह बच्चे को जन्म देना चाहती थी।

लेकिन परिवार का आरोप है कि ससुराल पक्ष इस गर्भावस्था को लेकर खुश नहीं था। ट्विशा के चरित्र पर सवाल उठाए गए और यहां तक कहा गया कि बच्चा “नाजायज” है।

ऐसे आरोप किसी भी महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकते हैं। परिवार का कहना है कि ट्विशा को लगातार अपमानित किया गया और मानसिक रूप से तोड़ा गया।

मेजर शर्मा के अनुसार, उस पर गर्भपात कराने के लिए दबाव बनाया गया। आखिरकार भारी मानसिक दबाव और पारिवारिक तनाव के बीच चिकित्सकीय गर्भपात कराया गया।

परिवार का दावा है कि गर्भपात के बाद भी प्रताड़ना बंद नहीं हुई। उल्टा स्थिति और अधिक खराब होती चली गई।

दहेज और संपत्ति को लेकर भी आरोप

ट्विशा के परिवार ने केवल मानसिक उत्पीड़न ही नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव के आरोप भी लगाए हैं।

परिवार का कहना है कि शादी के समय पिता द्वारा दिए गए लगभग 20 लाख रुपये के शेयर और निवेश को पति तथा ससुराल वालों के नाम ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जा रहा था।

भारत में दहेज प्रताड़ना के मामलों में अक्सर आर्थिक नियंत्रण और संपत्ति पर कब्जे की कोशिशें भी देखने को मिलती हैं। कई बार महिलाएं भावनात्मक और सामाजिक दबाव के कारण खुलकर विरोध नहीं कर पातीं।

परिवार का आरोप है कि ट्विशा भी लगातार ऐसे दबावों के बीच घुट रही थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बढ़ाई गंभीरता

मामले में आई शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, ट्विशा की मृत्यु “मृत्यु से पहले फांसी” के कारण हुई। यानी जब फांसी लगी, उस समय वह जीवित थी। लेकिन इसके साथ ही रिपोर्ट में शरीर पर कई अन्य चोटों, खरोंचों और घावों का भी उल्लेख किया गया है।

यह तथ्य जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि क्या मृत्यु से पहले उसके साथ मारपीट हुई थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग एक सप्ताह पहले गर्भपात कराया गया था। इसके अलावा शरीर के कई अंगों और रक्त के नमूनों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।

नाखूनों के नमूने डीएनए जांच के लिए सुरक्षित रखे गए हैं। कपड़ों और अन्य सामग्रियों को भी सील कर पुलिस के हवाले किया गया है।

यह सभी कदम इस बात का संकेत हैं कि जांच एजेंसियां मामले को केवल साधारण आत्महत्या मानकर नहीं चल रही हैं।

परिवार को क्यों है जांच प्रभावित होने का डर?

ट्विशा के परिवार का कहना है कि उन्हें जांच प्रभावित होने की आशंका है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि सास गिरिबाला सिंह न्यायपालिका से जुड़ी रही हैं और पति पेशे से वकील हैं।

परिवार को डर है कि प्रभाव और संपर्कों के कारण सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है या जांच की दिशा बदलने की कोशिश की जा सकती है।

इसी वजह से परिवार ने मांग की है कि वैवाहिक घर को सील किया जाए और मामले की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में कराई जाए।

भारत में कई चर्चित मामलों में परिवारों द्वारा ऐसी आशंकाएं पहले भी जताई जाती रही हैं, खासकर तब जब आरोपी प्रभावशाली पृष्ठभूमि से जुड़े हों।

पुलिस ने क्या कार्रवाई की?

पुलिस ने इस मामले में पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

मामले में दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसी धाराएं लगाई गई हैं। पुलिस अब कॉल रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम निष्कर्ष और डिजिटल सबूतों की जांच कर रही है।

संभावना है कि आने वाले दिनों में परिवार के बयान, पड़ोसियों से पूछताछ और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जांच आगे बढ़ेगी।

यदि जांच में मानसिक उत्पीड़न, घरेलू हिंसा या प्रत्यक्ष हिंसा के ठोस सबूत मिलते हैं, तो आरोप और गंभीर हो सकते हैं।

समाज के लिए बड़ा सवाल

ट्विशा शर्मा की मौत केवल एक आपराधिक मामला नहीं है। यह समाज के सामने कई बड़े सवाल छोड़ती है।

क्या आज भी पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाएं शादी के बाद मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं? क्या चरित्र पर सवाल उठाना और गर्भावस्था को लेकर अपमानित करना घरेलू हिंसा का सबसे क्रूर रूप नहीं है? क्या सामाजिक प्रतिष्ठा के डर से महिलाएं अपनी पीड़ा खुलकर नहीं बता पातीं?

भारत में घरेलू हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती। मानसिक उत्पीड़न, भावनात्मक दबाव, चरित्र हनन और आर्थिक नियंत्रण भी हिंसा के गंभीर रूप माने जाते हैं। लेकिन अक्सर इन पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना शारीरिक चोटों पर दिया जाता है।

ट्विशा के मामले ने यह दिखाया है कि मानसिक प्रताड़ना किसी व्यक्ति को अंदर से कितना तोड़ सकती है।

महिलाओं की मानसिक सुरक्षा पर बहस जरूरी

इस घटना ने महिलाओं की मानसिक सुरक्षा को लेकर भी बहस तेज कर दी है। शादी को आज भी कई परिवारों में “समझौते” का रिश्ता माना जाता है, जहां महिला से हर परिस्थिति सहने की उम्मीद की जाती है।

कई बार महिलाएं अपमान, ताने और हिंसा के बावजूद केवल इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि समाज क्या कहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि परिवारों को बेटियों की शिकायतों को “सामान्य वैवाहिक विवाद” कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यही शुरुआती संकेत बड़े हादसों में बदल जाते हैं।

निष्पक्ष जांच की मांग

अब ट्विशा शर्मा के परिवार की सबसे बड़ी मांग यही है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और सच सामने आए।

परिवार चाहता है कि यह स्पष्ट हो कि आखिर शादी के केवल पांच महीने के भीतर एक महिला इस स्थिति तक कैसे पहुंच गई। क्या वह वास्तव में आत्महत्या थी, या इसके पीछे लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की लंबी कहानी छिपी है?

फॉरेंसिक रिपोर्ट, डीएनए जांच और डिजिटल साक्ष्य आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा तय करेंगे।

लेकिन फिलहाल एक बात साफ है—ट्विशा शर्मा की मौत ने समाज को फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि घरेलू हिंसा केवल बंद कमरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सच्चाई है जो कई जिंदगियों को चुपचाप खत्म कर रही है।