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“मातृभाषा केवल बोली नहीं, पहचान है”: राजस्थानी भाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने को कहा

“मातृभाषा केवल बोली नहीं, पहचान है”: राजस्थानी भाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने को कहा

     भारत भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक विविधताओं का देश है। यहां हर क्षेत्र की अपनी अलग पहचान, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा रही है। लेकिन बदलते समय में कई क्षेत्रीय भाषाएं शिक्षा और प्रशासनिक ढांचे से धीरे-धीरे बाहर होती चली गईं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला केवल राजस्थानी भाषा तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह पूरे देश में मातृभाषा आधारित शिक्षा और भाषाई अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थानी भाषा के संरक्षण और संवर्धन से जुड़े एक अहम मामले में राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह शिक्षा व्यवस्था में राजस्थानी भाषा को शामिल करने के लिए ठोस नीति तैयार करे। अदालत ने कहा कि राजस्थानी भाषा का ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत समृद्ध है और इसे शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर स्थान देने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

यह फैसला पदम मेहता एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में आया, जिसकी सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने की।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना कि राजस्थानी भाषा केवल एक क्षेत्रीय बोली नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत की वाहक है। अदालत ने कहा कि इस भाषा को पहले से कई विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में मान्यता प्राप्त है, इसलिए इसे शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा स्तर तक राजस्थानी भाषा को शामिल करने के लिए नीति तैयार करे। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार 30 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करे।

यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने मातृभाषा आधारित शिक्षा के संदर्भ में किसी राज्य सरकार को स्पष्ट नीतिगत दिशा देने की पहल की है।

मामला कैसे शुरू हुआ?

यह मामला पदम मेहता और एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा था। याचिका में मांग की गई थी कि राजस्थानी भाषा को राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (REET) और राज्य की शिक्षा व्यवस्था में शामिल किया जाए।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि करोड़ों लोग राजस्थानी भाषा बोलते हैं और इसकी अपनी विशिष्ट साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पहचान है। इसके बावजूद इसे न तो स्कूल शिक्षा में पर्याप्त स्थान दिया गया और न ही शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में।

याचिका में यह भी कहा गया कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थान मिला हुआ है, जबकि राजस्थानी भाषा की लगातार उपेक्षा की जा रही है।

संविधान और शिक्षा कानून का दिया गया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में संविधान और शिक्षा संबंधी कानूनों का सहारा लिया। उन्होंने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 350-A का उल्लेख किया, जिसमें राज्यों को यह प्रयास करने का निर्देश दिया गया है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराई जाए।

इसके अलावा बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29(2)(f) का भी हवाला दिया गया। इस प्रावधान में कहा गया है कि शिक्षा बच्चों की मातृभाषा के अनुकूल होनी चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नई शिक्षा नीति स्वयं मातृभाषा आधारित शिक्षा और बहुभाषीय शिक्षण को बढ़ावा देती है। ऐसे में राजस्थानी भाषा को शिक्षा व्यवस्था से बाहर रखना नीति और संविधान दोनों की भावना के विपरीत है।

राजस्थानी भाषा का सांस्कृतिक महत्व

राजस्थानी भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं है। यह राजस्थान की लोक परंपराओं, लोकगीतों, वीर गाथाओं, लोककथाओं और साहित्यिक विरासत की प्रमुख आधारशिला है।

राजस्थानी में डिंगल और पिंगल जैसी साहित्यिक परंपराएं सदियों पुरानी हैं। इस भाषा में लिखी गई वीर रस की रचनाएं, लोकगीत और कथाएं आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती हैं।

इतिहासकारों और भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थानी भाषा की कई उपभाषाएं हैं—जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावटी, हाड़ौती, मालवी आदि—जो व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इतने व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव के बावजूद इस भाषा को शिक्षा में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया।

आठवीं अनुसूची का मुद्दा भी उठा

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी अदालत के सामने रखा गया कि राजस्थान विधानसभा ने 25 अगस्त 2003 को एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सिफारिश की थी।

भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को विशेष संवैधानिक मान्यता प्राप्त होती है। वर्तमान में इसमें 22 भाषाएं शामिल हैं।

राजस्थानी भाषा को अब तक आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है, जबकि लंबे समय से इसके लिए मांग उठती रही है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ सकता है।

राज्य सरकार ने क्या कहा?

राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने अदालत में कहा कि यह विषय राज्य सरकार के नीतिगत निर्णय से जुड़ा हुआ है और सरकार उचित समय पर इस पर निर्णय लेगी।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कभी यह नहीं कहा कि शिक्षा व्यवस्था में राजस्थानी भाषा को शामिल करना गलत है।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि वर्तमान में राजस्थानी भाषा प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के स्वीकृत पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे REET परीक्षा में शामिल नहीं किया गया।

हालांकि सरकार ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत मातृभाषा आधारित शिक्षा को लागू करने के लिए विभिन्न टास्क फोर्स गठित की गई हैं और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग पर विचार चल रहा है।

मातृभाषा में शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?

शिक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि बच्चों को शुरुआती शिक्षा उनकी मातृभाषा में देने से सीखने की क्षमता बेहतर होती है।

जब बच्चा अपनी परिचित भाषा में पढ़ता है, तो वह विषयों को अधिक आसानी से समझ पाता है। इससे उसकी बौद्धिक क्षमता, आत्मविश्वास और रचनात्मकता भी बढ़ती है।

यूनेस्को सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मातृभाषा आधारित शिक्षा का समर्थन करती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी इसी सोच को आगे बढ़ाया गया है।

सुप्रीम Court का यह फैसला इसी व्यापक शैक्षिक दृष्टिकोण को संवैधानिक समर्थन देता दिखाई देता है।

क्या REET में बदलाव संभव है?

राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (REET) राज्य में शिक्षकों की भर्ती के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा है। यदि राजस्थानी भाषा को इसमें शामिल किया जाता है, तो भविष्य में राजस्थानी भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता खुल सकता है।

यह केवल भाषा संरक्षण का प्रश्न नहीं होगा, बल्कि रोजगार और शिक्षा के नए अवसर भी पैदा कर सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि स्कूलों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जाती है, तो उसके लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होगी, जिससे भाषा को संस्थागत मजबूती मिलेगी।

फैसले का व्यापक प्रभाव

यह फैसला केवल राजस्थान तक सीमित नहीं माना जा रहा। देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं मिलने की शिकायतें रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अन्य भाषाई समुदाय भी मातृभाषा आधारित शिक्षा और क्षेत्रीय भाषाओं की मान्यता को लेकर अधिक सक्रिय हो सकते हैं।

यह फैसला इस बहस को भी मजबूत करता है कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का साधन भी है।

भाषा और पहचान का संबंध

भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, परंपरा और पहचान से जुड़ी होती है।

जब कोई भाषा शिक्षा और प्रशासन से बाहर हो जाती है, तो धीरे-धीरे उसकी सामाजिक उपयोगिता कम होने लगती है। नई पीढ़ी उस भाषा से दूर होने लगती है और उसके साहित्य तथा सांस्कृतिक परंपराओं पर भी असर पड़ता है।

इसी कारण भाषाई अधिकारों को अब केवल सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक अधिकार के रूप में भी देखा जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का महत्व

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सीधे तौर पर राजस्थानी भाषा को शिक्षा में लागू करने का आदेश नहीं दिया, लेकिन राज्य सरकार को नीति बनाने का निर्देश देकर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि मातृभाषा आधारित शिक्षा को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अदालत ने सरकार को समयसीमा के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा है, जिससे यह मामला केवल सैद्धांतिक बहस बनकर न रह जाए।

निष्कर्ष

राजस्थानी भाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय शिक्षा व्यवस्था और भाषाई अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। अदालत ने यह स्वीकार किया कि क्षेत्रीय भाषाएं केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक विकास का भी महत्वपूर्ण आधार हैं।

यह फैसला उन करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद का संदेश है, जो अपनी मातृभाषा को शिक्षा और प्रशासन में सम्मानजनक स्थान दिलाने की मांग कर रहे हैं।

अब निगाहें राजस्थान सरकार पर होंगी कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कैसी नीति तैयार करती है और क्या वास्तव में राजस्थानी भाषा को स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में वह स्थान मिल पाता है, जिसकी मांग दशकों से की जा रही है।