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“सिर्फ म्यूजिक लेबल से समझौता काफी नहीं”: कॉलर ट्यून विवाद में कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, वोडाफोन की अपील खारिज

“सिर्फ म्यूजिक लेबल से समझौता काफी नहीं”: कॉलर ट्यून विवाद में कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, वोडाफोन की अपील खारिज

         डिजिटल दौर में संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा व्यावसायिक उद्योग बन चुका है। मोबाइल फोन की घंटियों से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, सोशल मीडिया और लाइव स्ट्रीमिंग तक—हर जगह संगीत का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। ऐसे में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि किसी गीत, धुन या संगीत रचना से होने वाली कमाई पर असली अधिकार किसका है? क्या केवल म्यूजिक कंपनी ही उसका मालिक है, या गीत लिखने वाले लेखक और संगीत तैयार करने वाले संगीतकार भी उस कमाई में हिस्सेदार हैं?

इन्हीं सवालों के बीच कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई दूरसंचार कंपनी कॉलर ट्यून या रिंगटोन जैसी सेवाओं के माध्यम से गानों का व्यावसायिक उपयोग करती है, तो उसे केवल म्यूजिक लेबल से समझौता करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी लिमिटेड (IPRS) से भी अलग लाइसेंस लेना होगा और रॉयल्टी का भुगतान करना होगा।

यह फैसला वोडाफोन आइडिया लिमिटेड और इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी (आईपीआरएस) के बीच लंबे समय से चल रहे कॉपीराइट विवाद में आया है। अदालत ने वोडाफोन की अपीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मूल साहित्यिक और संगीत रचनाओं के अधिकार स्वतंत्र रूप से सुरक्षित हैं और उनका व्यावसायिक उपयोग बिना उचित लाइसेंस के नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा विवाद?

यह विवाद वोडाफोन आइडिया द्वारा दी जाने वाली “वैल्यू एडेड सर्विसेज” यानी मूल्यवर्धित सेवाओं से जुड़ा था। इनमें मुख्य रूप से कॉलर ट्यून और रिंगटोन सेवाएं शामिल थीं।

जब कोई मोबाइल उपभोक्ता किसी लोकप्रिय फिल्मी गीत या संगीत को कॉलर ट्यून के रूप में इस्तेमाल करता है, तो वह केवल निजी उपयोग नहीं माना जाता। दूरसंचार कंपनी उस सेवा से राजस्व कमाती है। यही व्यावसायिक उपयोग कॉपीराइट कानून के दायरे में आता है।

आईपीआरएस का कहना था कि वोडाफोन इन सेवाओं के माध्यम से उन साहित्यिक और संगीत रचनाओं का उपयोग कर रहा है, जिनके अधिकार गीतकारों, संगीतकारों और प्रकाशकों के पास हैं। इसलिए कंपनी को आईपीआरएस से लाइसेंस लेना और रॉयल्टी देना अनिवार्य है।

दूसरी ओर, वोडाफोन का तर्क था कि उसने पहले ही सारेगामा इंडिया लिमिटेड जैसे म्यूजिक लेबल्स के साथ समझौते कर लिए हैं। इसलिए अलग से आईपीआरएस को भुगतान करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस देबांगसु बसाक और जस्टिस मोहम्मद शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने 8 मई को दिए अपने फैसले में वोडाफोन की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मूल साहित्यिक और संगीत रचनाओं के अधिकार स्वतंत्र हैं और उनका व्यावसायिक उपयोग करने के लिए आईपीआरएस से अलग लाइसेंस लेना आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी ध्वनि रिकॉर्डिंग में मौजूद साहित्यिक और संगीत रचनाओं का व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, तो उन रचनाओं के वास्तविक सृजनकर्ताओं को रॉयल्टी का अधिकार प्राप्त होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वोडाफोन और सारेगामा के बीच हुए समझौते आईपीआरएस के वैधानिक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकते।

आईपीआरएस क्या है?

इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी लिमिटेड (IPRS) भारत की एक कॉपीराइट सोसाइटी है, जो गीतकारों, संगीतकारों और प्रकाशकों के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करती है।

आईपीआरएस के अनुसार वह देशभर में 22,000 से अधिक संगीत और साहित्यिक कृतियों के रचनाकारों का प्रतिनिधित्व करती है। जब किसी गीत या संगीत रचना का सार्वजनिक या व्यावसायिक उपयोग होता है, तो आईपीआरएस उन कलाकारों की ओर से रॉयल्टी एकत्र करती है।

उदाहरण के तौर पर—

  • रेडियो पर गीत बजना,
  • टीवी प्रसारण,
  • होटल या रेस्टोरेंट में संगीत चलाना,
  • लाइव कार्यक्रमों में गानों का उपयोग,
  • मोबाइल कॉलर ट्यून सेवाएं,
    इन सभी में कॉपीराइट और रॉयल्टी का प्रश्न उठता है।

2012 का कॉपीराइट संशोधन क्यों अहम है?

इस मामले में अदालत ने विशेष रूप से कॉपीराइट अधिनियम, 1957 में वर्ष 2012 में किए गए संशोधनों का उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि इन संशोधनों ने गीतकारों और संगीतकारों के अधिकारों में “क्रांतिकारी बदलाव” लाया। पहले अक्सर ऐसा होता था कि फिल्म या संगीत कंपनी के पास रिकॉर्डिंग के अधिकार चले जाते थे और मूल रचनाकारों को सीमित लाभ मिलता था।

लेकिन 2012 के संशोधन के बाद कानून ने यह सुनिश्चित किया कि गीतकार और संगीतकार अपनी रचनाओं के व्यावसायिक उपयोग पर रॉयल्टी पाने के अधिकार से पूरी तरह वंचित न हों।

संशोधन का उद्देश्य यह था कि जो व्यक्ति किसी गीत के शब्द लिखता है या उसकी धुन तैयार करता है, उसे उसके उपयोग से होने वाली आय में उचित हिस्सा मिले।

अदालत ने किन कानूनी सिद्धांतों पर भरोसा किया?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि ध्वनि रिकॉर्डिंग और मूल संगीत/साहित्यिक रचना दो अलग-अलग अधिकार हैं।

उदाहरण के लिए, किसी फिल्मी गीत में—

  • गीत के शब्द एक साहित्यिक कृति हैं,
  • उसकी धुन एक संगीत रचना है,
  • और पूरा रिकॉर्डेड गीत एक ध्वनि रिकॉर्डिंग है।

इन तीनों के अधिकार अलग-अलग हो सकते हैं। यदि किसी कंपनी ने केवल ध्वनि रिकॉर्डिंग के अधिकार हासिल किए हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे मूल साहित्यिक और संगीत रचनाओं के अधिकार भी स्वतः मिल गए।

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि वोडाफोन को आईपीआरएस से अलग लाइसेंस लेना जरूरी था।

दूरसंचार कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?

इस फैसले का असर केवल वोडाफोन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत में लगभग सभी बड़ी दूरसंचार कंपनियां कॉलर ट्यून और रिंगटोन जैसी सेवाएं प्रदान करती हैं।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि यदि वे संगीत का व्यावसायिक उपयोग करती हैं, तो उन्हें केवल म्यूजिक लेबल्स के साथ समझौता करके नहीं चल सकता। उन्हें गीतकारों और संगीतकारों के अधिकारों का भी सम्मान करना होगा।

इस फैसले के बाद दूरसंचार कंपनियों के लाइसेंसिंग मॉडल और रॉयल्टी भुगतान व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकता है।

संगीत उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?

भारतीय संगीत उद्योग लंबे समय से कॉपीराइट और रॉयल्टी विवादों से जूझता रहा है। कई गीतकार और संगीतकार यह शिकायत करते रहे हैं कि उनके बनाए गीतों से कंपनियां करोड़ों कमाती हैं, लेकिन उन्हें उचित भुगतान नहीं मिलता।

यह फैसला रचनाकारों के पक्ष में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। अदालत ने साफ कहा कि व्यावसायिक लाभ कमाने वाली कंपनियां मूल सृजनकर्ताओं के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकतीं।

इससे भविष्य में कलाकारों और रचनाकारों की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हो सकती है।

क्या यह फैसला डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी असर डालेगा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का प्रभाव केवल मोबाइल कॉलर ट्यून सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगा।

आज के समय में संगीत का उपयोग कई डिजिटल माध्यमों पर होता है—

  • ओटीटी प्लेटफॉर्म,
  • सोशल मीडिया ऐप्स,
  • वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म,
  • म्यूजिक स्ट्रीमिंग सेवाएं,
  • शॉर्ट वीडियो एप्लिकेशन।

यदि इन प्लेटफॉर्म्स पर संगीत का व्यावसायिक उपयोग होता है, तो वहां भी रॉयल्टी और लाइसेंसिंग के मुद्दे उठ सकते हैं।

यह फैसला भविष्य के डिजिटल कॉपीराइट विवादों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

वोडाफोन की दलील क्यों कमजोर पड़ी?

वोडाफोन का मुख्य तर्क यह था कि उसने सारेगामा इंडिया लिमिटेड जैसे म्यूजिक लेबल्स के साथ समझौते कर लिए थे। कंपनी का कहना था कि इससे उसे गानों का उपयोग करने का अधिकार मिल गया।

लेकिन अदालत ने माना कि म्यूजिक लेबल्स के अधिकार और गीतकारों/संगीतकारों के अधिकार अलग-अलग हैं। यदि मूल रचनाकारों के अधिकार आईपीआरएस के पास संरक्षित हैं, तो उनके लिए अलग लाइसेंस आवश्यक होगा।

यही वजह रही कि अदालत ने वोडाफोन की अपील को स्वीकार नहीं किया।

कलाकारों के अधिकारों को नई मजबूती

भारतीय मनोरंजन उद्योग में अक्सर अभिनेता और बड़ी कंपनियां चर्चा में रहती हैं, जबकि गीतकार और संगीतकार पर्दे के पीछे रह जाते हैं। लेकिन किसी भी गीत की आत्मा उसके शब्द और संगीत ही होते हैं।

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात को स्वीकार करता है कि रचनात्मक श्रम का सम्मान केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी आवश्यकता भी है।

यदि किसी गीत से व्यावसायिक लाभ कमाया जा रहा है, तो उस लाभ में उसके मूल सृजनकर्ताओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।

भविष्य में बढ़ सकते हैं कॉपीराइट मुकदमे?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद कई कंपनियां अपनी लाइसेंसिंग व्यवस्था की समीक्षा करेंगी। साथ ही यह भी संभव है कि अन्य कॉपीराइट सोसाइटी और कलाकार संगठन भी अपने अधिकारों को लेकर अधिक सक्रिय हो जाएं।

डिजिटल युग में कंटेंट का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और इसके साथ कॉपीराइट विवाद भी बढ़ेंगे। ऐसे में यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय कॉपीराइट कानून की दिशा तय करने वाले प्रमुख निर्णयों में शामिल हो सकता है।

निष्कर्ष

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला केवल वोडाफोन और आईपीआरएस के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह भारतीय संगीत उद्योग और कॉपीराइट कानून के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि संगीत का व्यावसायिक उपयोग करने वाली कंपनियां मूल रचनाकारों के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकतीं। केवल म्यूजिक लेबल से समझौता करना पर्याप्त नहीं होगा; गीतकारों और संगीतकारों के अधिकार भी समान रूप से संरक्षित रहेंगे।

यह निर्णय डिजिटल युग में रचनात्मक अधिकारों की बढ़ती अहमियत को दर्शाता है और यह संदेश देता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बौद्धिक संपदा भी है—जिसका सम्मान और उचित प्रतिफल दोनों आवश्यक हैं।