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“चाइनीज़ मांझा मौत का जाल बन चुका है”: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा ठोस एक्शन प्लान

“चाइनीज़ मांझा मौत का जाल बन चुका है”: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा ठोस एक्शन प्लान

       इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने चाइनीज़ मांझा के बढ़ते खतरे को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि आखिर प्रतिबंध के बावजूद बाजारों में यह घातक मांझा कैसे बिक रहा है और इसे पूरी तरह रोकने के लिए सरकार की ठोस योजना क्या है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि वह चाइनीज़ मांझा पर प्रभावी नियंत्रण के लिए नया कानून बनाने की प्रक्रिया में है। सरकार ने यह भी जानकारी दी कि इस उद्देश्य से छह सदस्यीय समिति का गठन किया जा चुका है, जो इस संबंध में कानूनी और प्रशासनिक ढांचा तैयार कर रही है।

खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह विभाग और पर्यावरण विभाग के सचिवों, या उनसे वरिष्ठ अधिकारियों को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ संकेत दिया कि अब केवल औपचारिक प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सरकार को जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।

आखिर इतना खतरनाक क्यों है चाइनीज़ मांझा?

चाइनीज़ मांझा पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में गंभीर सार्वजनिक खतरे के रूप में उभरा है। यह सामान्य सूती मांझे की तरह नहीं होता, बल्कि नायलॉन, सिंथेटिक फाइबर और कई बार धातु या कांच के महीन पाउडर से कोटेड होता है।

यही कारण है कि यह बेहद धारदार हो जाता है।

दो पहिया वाहन चलाते समय अचानक गर्दन या चेहरे पर यह मांझा आने से गंभीर चोटें लगती हैं। कई मामलों में लोगों की गर्दन तक कट चुकी है और अनेक मौतें भी हो चुकी हैं। पक्षियों के लिए भी यह मांझा बेहद घातक माना जाता है क्योंकि उड़ते समय उनके पंख इसमें उलझ जाते हैं।

अदालत ने भी माना कि यह केवल पतंगबाजी का मामला नहीं, बल्कि जनसुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।

जनहित याचिका में क्या मांग की गई?

यह मामला स्थानीय अधिवक्ता एम.एल. यादव द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा।

याचिका में कहा गया कि प्रतिबंध होने के बावजूद चाइनीज़ मांझा खुलेआम बिक रहा है। प्रशासन की ओर से समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन उनका प्रभाव स्थायी नहीं होता। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि सरकार को सख्त कानून बनाने और उसके प्रभावी पालन के निर्देश दिए जाएं।

याचिका में यह भी कहा गया कि हर साल त्योहारों और पतंगबाजी के मौसम में कई लोग दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं, लेकिन इसके बावजूद अवैध बिक्री का नेटवर्क जारी रहता है।

सरकार ने अदालत को क्या बताया?

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि वह इस समस्या को गंभीरता से ले रही है और चाइनीज़ मांझा पर रोक के लिए विशेष कानून लाने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।

सरकार की ओर से कहा गया कि:

  • छह सदस्यीय समिति गठित की गई है।
  • समिति कानूनी प्रावधानों और कार्यान्वयन की रणनीति पर काम कर रही है।
  • प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए नई व्यवस्था तैयार की जा रही है।

हालांकि अदालत ने केवल इस आश्वासन से संतुष्ट होने के बजाय विस्तृत कार्ययोजना की मांग की।

“अगली सुनवाई में सचिव उपस्थित रहें”

खंडपीठ में शामिल न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मनजीव शुक्ला ने कहा कि यह मुद्दा बेहद गंभीर है और केवल सामान्य प्रशासनिक रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा।

अदालत ने गृह विभाग और पर्यावरण विभाग के सचिवों को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई, जो 13 जुलाई को निर्धारित है, में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से स्वयं उपस्थित हों।

यह निर्देश इस बात का संकेत है कि अदालत अब इस मुद्दे पर उच्च स्तर की जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहती है।

NGT के प्रतिबंध का भी हुआ उल्लेख

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता राजकुमार सिंह ने अदालत को बताया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT पहले ही लेड-कोटेड और नायलॉन आधारित मांझे के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा चुका है।

NGT ने पूर्व में माना था कि इस प्रकार का मांझा:

  • पर्यावरण के लिए हानिकारक है,
  • पक्षियों की मौत का कारण बनता है,
  • और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।

लेकिन हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि केवल प्रतिबंध आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है, जब तक उसका प्रभावी पालन सुनिश्चित न किया जाए।

अदालत ने सरकार को क्या कहा?

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रतिबंध तभी प्रभावी माना जाएगा जब:

  • अवैध निर्माण इकाइयों पर कार्रवाई हो,
  • बाजारों में निगरानी बढ़े,
  • ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगे,
  • और दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रतिबंधित मांझा बाजार तक पहुंचे ही नहीं।

यह टिप्पणी प्रशासनिक तंत्र की विफलता पर अप्रत्यक्ष प्रश्न भी मानी जा रही है क्योंकि प्रतिबंध के बावजूद हर साल बड़ी मात्रा में चाइनीज़ मांझा बाजार में उपलब्ध रहता है।

पतंग संघ ने भी दाखिल की याचिका

मामले में एक नया मोड़ तब आया जब शहर के काइट एसोसिएशन ने हस्तक्षेप याचिका दाखिल की।

एसोसिएशन ने अदालत को बताया कि पुलिस और प्रशासन चाइनीज़ मांझे के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सामान्य पतंग विक्रेताओं और वैध कारोबारियों को भी परेशान कर रहे हैं।

उनका कहना था कि कई बार बिना पर्याप्त जांच के दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई कर दी जाती है, जिससे वैध व्यापार प्रभावित होता है।

हाईकोर्ट ने एसोसिएशन को क्या कहा?

अदालत ने पतंग संघ की दलील सुनने के बाद संतुलित टिप्पणी की।

खंडपीठ ने कहा कि यदि एसोसिएशन वास्तव में वैध कारोबार कर रही है, तो उसे भी प्रतिबंधित मांझे के खिलाफ अभियान में सहयोग करना चाहिए। अदालत ने कहा कि समाज और व्यापारिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे घातक उत्पादों के उपयोग और बिक्री को रोकने में प्रशासन की मदद करें।

साथ ही कोर्ट ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि कार्रवाई के दौरान किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अदालत ने एक ओर जनसुरक्षा को प्राथमिकता दी, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक कार्रवाई में संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया।

क्यों नहीं रुक पा रही चाइनीज़ मांझे की बिक्री?

यह बड़ा सवाल लगातार उठता रहा है कि प्रतिबंध और अदालतों की सख्ती के बावजूद चाइनीज़ मांझा बाजार में कैसे पहुंच जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं:

1. सस्ता और मजबूत होना

चाइनीज़ मांझा सामान्य मांझे की तुलना में अधिक मजबूत होता है और पतंगबाजी में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देता है। इसी कारण इसकी मांग बनी रहती है।

2. अवैध सप्लाई नेटवर्क

कई जगहों पर यह गुप्त रूप से तैयार किया जाता है या दूसरे राज्यों से सप्लाई होता है।

3. ऑनलाइन बिक्री

प्रतिबंध के बावजूद कई प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया माध्यमों से इसकी बिक्री जारी रहती है।

4. कमजोर प्रवर्तन

अभियान तो चलाए जाते हैं, लेकिन निरंतर निगरानी और सख्त दंड की कमी के कारण अवैध व्यापार दोबारा शुरू हो जाता है।

मानव जीवन और पक्षियों दोनों के लिए खतरा

चाइनीज़ मांझे का खतरा केवल सड़क दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं है।

पक्षी संरक्षण से जुड़े संगठनों का कहना है कि हर साल हजारों पक्षी इस मांझे में फंसकर घायल होते हैं या मर जाते हैं। विशेष रूप से कबूतर, चील, तोते और अन्य उड़ने वाले पक्षी इसकी चपेट में आते हैं।

यही कारण है कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी इस पर प्रतिबंध को जरूरी माना गया।

क्या नया कानून स्थिति बदल सकता है?

उत्तर प्रदेश सरकार अब नया कानून लाने की तैयारी में है। यदि यह कानून सख्त दंड, लाइसेंस व्यवस्था, सप्लाई चेन नियंत्रण और ऑनलाइन निगरानी जैसे प्रावधानों के साथ आता है, तो इससे स्थिति में सुधार संभव है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए:

  • स्थानीय पुलिस,
  • नगर प्रशासन,
  • बाजार संघ,
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स,
  • और आम नागरिकों

सभी को मिलकर काम करना होगा।

हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ बेंच की टिप्पणियों से यह साफ है कि अदालत अब इस मुद्दे को केवल मौसमी समस्या नहीं मान रही।

कोर्ट का मानना है कि जब प्रतिबंधित मांझे के कारण लगातार मौतें और गंभीर हादसे हो रहे हों, तब सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है।

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि:

  • प्रतिबंध केवल कागज पर नहीं होना चाहिए,
  • जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाएगा,
  • और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में प्रशासनिक निष्क्रियता स्वीकार नहीं की जाएगी।

अगली सुनवाई पर नजर

अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी। तब तक सरकार को अपनी विस्तृत योजना और कार्रवाई रिपोर्ट अदालत के सामने रखनी होगी।

सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि:

  • प्रस्तावित कानून में क्या प्रावधान होंगे,
  • अवैध बिक्री रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनेगी,
  • और क्या इस बार वास्तव में चाइनीज़ मांझे के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हो पाएगी।

फिलहाल इतना तय है कि हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीर जनसुरक्षा संकट मानते हुए सरकार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब केवल औपचारिक प्रतिबंधों से काम नहीं चलेगा।