सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में बड़ा फैसला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 पुलिसकर्मियों की बरी बरकरार रखी, कहा- साजिश साबित नहीं कर पाया अभियोजन
देश के सबसे चर्चित कथित फर्जी मुठभेड़ मामलों में शामिल सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी मुठभेड़ मामला में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 22 पुलिसकर्मियों को बरी किए जाने के विशेष सीबीआई अदालत के निर्णय को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष कथित साजिश, अपहरण और फर्जी मुठभेड़ की कहानी को कानूनी रूप से सिद्ध करने में असफल रहा।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन उन साक्ष्यों की श्रृंखला इतनी मजबूत नहीं थी कि आरोपियों को दोषी ठहराया जा सके।
यह फैसला एक बार फिर भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में “संदेह से परे अपराध सिद्ध करने” के सिद्धांत को केंद्र में ले आया है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2005 और 2006 के दौरान हुई तीन कथित मुठभेड़ों से जुड़ा था।
अभियोजन के अनुसार, सोहराबुद्दीन शेख को नवंबर 2005 में गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार किया गया था। बाद में पुलिस ने दावा किया कि वह एक खतरनाक अपराधी था और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल था।
पुलिस के अनुसार, सोहराबुद्दीन एक मुठभेड़ में मारा गया।
इसके कुछ समय बाद उसकी पत्नी कौसर बी भी लापता हो गईं। अभियोजन का आरोप था कि उनकी हत्या कर शव को जला दिया गया।
इसके बाद इस पूरे घटनाक्रम के कथित गवाह और सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की भी दिसंबर 2006 में एक पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई।
इन्हीं घटनाओं को लेकर बाद में आरोप लगा कि यह सब “फर्जी एनकाउंटर” थे और इसके पीछे पुलिस अधिकारियों की सुनियोजित साजिश थी।
मामला क्यों बना राष्ट्रीय चर्चा का विषय?
यह मामला केवल एक एनकाउंटर तक सीमित नहीं था। इसमें कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नाम सामने आए थे और राजनीतिक विवाद भी गहराया था।
सीबीआई जांच शुरू होने के बाद देशभर में इस मामले को लेकर व्यापक बहस हुई। मानवाधिकार संगठनों ने इसे राज्य शक्ति के दुरुपयोग का उदाहरण बताया, जबकि दूसरी ओर कुछ लोगों ने इसे पुलिस कार्रवाई को बदनाम करने की कोशिश करार दिया।
मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्षों तक इसकी सुनवाई राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी रही।
अभियोजन की सबसे बड़ी कमजोरी क्या रही?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए सिद्ध नहीं कर पाया।
अदालत के अनुसार, 90 से अधिक गवाह hostile हो गए।
hostile गवाह का क्या अर्थ है?
जब कोई गवाह अदालत में अपने पहले दिए गए बयान से मुकर जाता है या अभियोजन का समर्थन नहीं करता, तो उसे hostile witness कहा जाता है।
आमतौर पर ऐसे मामलों में अभियोजन की पूरी कहानी कमजोर पड़ जाती है, क्योंकि अदालत साक्ष्यों की निरंतरता और विश्वसनीयता पर विशेष ध्यान देती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इतने बड़ी संख्या में गवाहों का hostile हो जाना अभियोजन के लिए गंभीर झटका था।
अपहरण की कहानी साबित नहीं हुई
अभियोजन का दावा था कि सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति का पुलिस ने अवैध रूप से अपहरण किया था।
लेकिन अदालत ने कहा कि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह यह साबित नहीं कर सका कि पुलिसकर्मियों ने वास्तव में तीनों को हिरासत में लिया था या उनका अपहरण किया था।
अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद थे, लेकिन वे इतने मजबूत नहीं थे कि दोष सिद्ध किया जा सके।
फर्जी मुठभेड़ का मकसद भी साबित नहीं
किसी भी आपराधिक साजिश के मामले में अदालत यह भी देखती है कि अपराध का उद्देश्य या मकसद क्या था।
इस मामले में अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पुलिस अधिकारियों को कथित फर्जी मुठभेड़ से क्या लाभ होना था।
हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि जांच अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि पुलिस अधिकारियों को किसी राजनीतिक, आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला।
अदालत के अनुसार, जब कथित साजिश का उद्देश्य ही स्पष्ट नहीं हो सका, तो आरोप और कमजोर हो जाते हैं।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर अदालत की टिप्पणी
फर्जी एनकाउंटर मामलों में मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अभियोजन का दावा था कि सोहराबुद्दीन को नजदीक से गोली मारकर हत्या की गई और बाद में उसे मुठभेड़ का रूप दिया गया।
लेकिन हाईकोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि शरीर पर नजदीक से गोली चलने के सामान्य संकेत नहीं पाए गए।
अदालत ने कहा कि यह तथ्य अभियोजन की फर्जी मुठभेड़ वाली थ्योरी को कमजोर करता है।
कौसर बी की कथित हत्या पर क्या कहा कोर्ट ने?
मामले का सबसे रहस्यमय हिस्सा कौसर बी का कथित गायब होना और हत्या का आरोप था।
अभियोजन ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन की मौत के बाद कौसर बी को भी मार दिया गया और सबूत मिटाने के लिए शव को जला दिया गया।
लेकिन अदालत ने कहा कि इस संबंध में कोई ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य पेश नहीं किए गए।
न तो हत्या का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला और न ही अभियोजन उस कथित घटनाक्रम को पूरी तरह स्थापित कर सका।
“दो संभावित दृष्टिकोण” वाला सिद्धांत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किया गया है, तो अपीलीय अदालत केवल इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती कि मामले को दूसरे दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है।
जब तक ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह अवैध, मनमाना या साक्ष्यों के विपरीत न हो, तब तक बरी करने के निर्णय को पलटना उचित नहीं माना जाता।
यही कारण है कि हाईकोर्ट ने विशेष सीबीआई अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य और कानून
इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोष सिद्ध करना आसान नहीं होता।
भारतीय कानून के अनुसार यदि मामला circumstantial evidence पर आधारित हो, तो साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला इतनी मजबूत होनी चाहिए कि आरोपी के दोषी होने के अलावा कोई अन्य संभावना न बचे।
यदि बीच में कोई भी कड़ी कमजोर हो, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन ऐसी पूर्ण श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका।
लंबे समय तक चला मुकदमा
यह मामला लगभग दो दशकों तक भारतीय न्याय व्यवस्था में चलता रहा।
जांच एजेंसियों, अदालतों, राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों के बीच लगातार बहस होती रही।
कई पुलिस अधिकारी आरोपी बनाए गए, कुछ को गिरफ्तार भी किया गया और बाद में कई लोगों को राहत मिली।
इतने लंबे समय तक चले मुकदमे ने भारतीय न्याय प्रणाली में देरी और जटिलता के प्रश्न को भी उजागर किया।
मानवाधिकार बनाम पुलिस कार्रवाई की बहस
इस मामले ने भारत में फर्जी एनकाउंटर को लेकर बड़ी बहस को जन्म दिया।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना रहा कि पुलिस को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता और हर आरोपी को निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार है।
दूसरी ओर, कुछ लोग यह तर्क देते रहे कि संगठित अपराध और आतंकवाद से लड़ने के दौरान पुलिस को कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने पड़ते हैं।
इसी कारण ऐसे मामलों में न्यायालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को दोहराता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अदालत ने भावनाओं या सार्वजनिक बहस के बजाय केवल साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया।
कानून में अभियोजन पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपों को “संदेह से परे” सिद्ध करे। यदि ऐसा नहीं होता, तो आरोपी को बरी करना न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।
क्या मामला अब सुप्रीम कोर्ट जाएगा?
संभव है कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में चुनौती दी जाए।
यदि ऐसा होता है, तो सर्वोच्च अदालत को यह देखना होगा कि क्या हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के मूल्यांकन में कोई कानूनी त्रुटि की है।
हालांकि फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले ने 22 पुलिसकर्मियों को बड़ी राहत दी है।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में साक्ष्यों की अहमियत और “संदेह का लाभ” सिद्धांत को पुनः रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप या संदेह पर्याप्त नहीं हैं; दोष सिद्ध करने के लिए मजबूत, विश्वसनीय और पूर्ण साक्ष्य आवश्यक हैं।
सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति से जुड़ा यह मामला भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाएगा।
इस फैसले के बाद भी फर्जी मुठभेड़ों, मानवाधिकारों और पुलिस जवाबदेही पर बहस जारी रहने की संभावना है। वहीं अदालत का निर्णय यह संदेश देता है कि किसी भी आपराधिक मामले में न्यायालय केवल कानून और साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला देगा।