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मुरादाबाद के प्राचीन काली माता मंदिर में महंत पद को लेकर बढ़ा विवाद, अदालत पहुंची गद्दी की लड़ाई

मुरादाबाद के प्राचीन काली माता मंदिर में महंत पद को लेकर बढ़ा विवाद, अदालत पहुंची गद्दी की लड़ाई

         मुरादाबाद के लालबाग स्थित प्राचीन सिद्धपीठ श्री काली माता मंदिर में महंत पद को लेकर शुरू हुआ विवाद अब न्यायालय की चौखट तक पहुंच चुका है। मंदिर के पूर्व महंत रामगिरि महाराज ने खुद को महंत पद से हटाए जाने को अवैध बताते हुए सिविल कोर्ट में वाद दायर किया है। उनका कहना है कि उन्हें गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार विधिवत गद्दी पर बैठाया गया था, इसलिए बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए उन्हें हटाया जाना अनुचित है।

यह मामला अब केवल धार्मिक संस्था के आंतरिक विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अखाड़ों की परंपरा, धार्मिक संपत्तियों के नियंत्रण और महंत पद के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील कानूनी प्रश्न बनता जा रहा है। अदालत में सुनवाई शुरू होने के बाद इस विवाद ने धार्मिक और कानूनी दोनों हलकों में चर्चा तेज कर दी है।

अदालत में नहीं पहुंचा विपक्षी पक्ष

गुरुवार को इस मामले में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा समेत विपक्षी पक्ष को अदालत में उपस्थित होना था। लेकिन अदालत में न तो कोई प्रतिनिधि पहुंचा और न ही उनकी ओर से कोई जवाब दाखिल किया गया। दूसरी तरफ पूर्व महंत रामगिरि महाराज अपनी पूरी लीगल टीम के साथ अदालत में मौजूद रहे।

विपक्षी पक्ष की अनुपस्थिति को अदालत ने गंभीरता से लिया और दोबारा नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई छह जुलाई के लिए तय कर दी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि अगली तारीख पर भी जवाब दाखिल नहीं किया जाता तो मामले की कार्यवाही एकतरफा दिशा में आगे बढ़ सकती है।

इसके अतिरिक्त इस विवाद से जुड़े एक अन्य मामले में पहले से 17 मई की तारीख निर्धारित है, जिसमें भी जूना अखाड़े को अपना पक्ष अदालत के सामने रखना है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक कानूनी जटिलता की ओर बढ़ सकता है।

रामगिरि महाराज का दावा क्या है

पूर्व महंत रामगिरि महाराज का कहना है कि उन्हें परंपरागत गुरु-शिष्य व्यवस्था के तहत महंत पद सौंपा गया था। उनका दावा है कि मंदिर की गद्दी पर बैठने की प्रक्रिया धार्मिक परंपरा और अखाड़े की मान्यताओं के अनुरूप हुई थी। इसलिए उन्हें हटाने का फैसला मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

रामगिरि महाराज ने कहा कि यदि विपक्षी पक्ष के पास कोई वैध आधार होता तो वह अदालत में आकर अपना पक्ष रखता। उनके अनुसार बार-बार जवाब दाखिल करने से बचना यह दर्शाता है कि अखाड़े के पदाधिकारियों के पास कानूनी रूप से मजबूत तर्क नहीं हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि वह न्यायालय पर पूरा भरोसा रखते हैं और प्रभावी पैरवी के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल व्यक्तिगत पद की नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा और न्याय की भी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने क्या कहा

रामगिरि महाराज की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश जौहरी ने कहा कि विपक्षी पक्ष की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ और न ही कोई लिखित जवाब दाखिल किया गया। जून माह में अदालतों में अवकाश रहने के कारण अगली तारीख छह जुलाई निर्धारित की गई है।

उन्होंने दावा किया कि उनके मुवक्किल का पक्ष तथ्यात्मक और कानूनी रूप से मजबूत है। अदालत में दाखिल दस्तावेज और परिस्थितियां यह स्पष्ट करती हैं कि रामगिरि महाराज को हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवादों में भी कानून और प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। किसी को केवल प्रशासनिक या आंतरिक निर्णय के आधार पर पद से हटाया नहीं जा सकता, जब तक कि उसके लिए वैध और पारदर्शी प्रक्रिया न अपनाई जाए।

पहले भी हो चुका है ऐसा विवाद

इस विवाद ने मंदिर और अखाड़ों से जुड़े पुराने मामलों की भी याद दिला दी है। इससे पहले मंदिर के पूर्व महंत सज्जन गिरी को भी पद से हटाया गया था। हालांकि उन्होंने अदालत का रुख नहीं किया था।

लेकिन इस बार मामला अलग दिशा में जाता दिखाई दे रहा है, क्योंकि रामगिरि महाराज ने खुद को सही साबित करने के लिए न्यायालय की शरण ली है। इससे यह विवाद अब धार्मिक दायरे से निकलकर न्यायिक परीक्षण के अधीन आ गया है।

दिलचस्प बात यह भी है कि सज्जन गिरी से जुड़े एक अन्य मामले में रामगिरि की ओर से दायर वाद पहले से अदालत में लंबित है। यानी मंदिर और महंत पद से जुड़े विवाद लंबे समय से जारी हैं और अब यह संघर्ष कई स्तरों पर चल रहा है।

वर्तमान महंत हितेश्वर गिरी का पक्ष

दूसरी ओर सिद्धपीठ नौ देवी मंदिर के वर्तमान महंत हितेश्वर गिरी महाराज ने कहा कि उन्हें न्यायालय से कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि न तो अदालत की ओर से पेश होने की जानकारी मिली और न ही जूना अखाड़े के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई निर्देश दिया गया।

हितेश्वर गिरी का कहना है कि यदि उन्हें विधिवत सूचना प्राप्त होती तो वह अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखते। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि अखाड़े और स्थानीय स्तर के पदाधिकारियों के बीच भी समन्वय की कमी हो सकती है।

हालांकि रामगिरि पक्ष इस दलील को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। उनका कहना है कि अदालत के नोटिस के बावजूद जवाब दाखिल नहीं करना गंभीर विषय है और इससे विपक्षी पक्ष की मंशा पर सवाल उठते हैं।

महंत पद और अखाड़ों की परंपरा

सनातन परंपरा में महंत पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि धार्मिक नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। मंदिरों और अखाड़ों में महंत की नियुक्ति अक्सर गुरु-शिष्य परंपरा, दीक्षा और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर होती है।

लेकिन कई बार संपत्ति, दान, धार्मिक प्रभाव और प्रशासनिक अधिकारों के कारण महंत पद को लेकर विवाद खड़े हो जाते हैं। विशेष रूप से बड़े मंदिरों और प्रसिद्ध अखाड़ों में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष पहले भी सामने आते रहे हैं।

ऐसे मामलों में अदालतों को यह तय करना पड़ता है कि क्या मामला केवल धार्मिक परंपरा का है या उसमें वैधानिक अधिकार और संपत्ति से जुड़े प्रश्न भी शामिल हैं। यदि विवाद संपत्ति, प्रबंधन या अधिकारों से जुड़ा हो तो सिविल कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

धार्मिक संस्थाओं पर बढ़ते कानूनी विवाद

पिछले कुछ वर्षों में देशभर में मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन को लेकर अदालतों में कई मामले पहुंचे हैं। कहीं महंत पद को लेकर विवाद है तो कहीं ट्रस्ट प्रबंधन को लेकर संघर्ष चल रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों और प्रभाव का दायरा बढ़ा है, वैसे-वैसे उनके भीतर प्रशासनिक विवाद भी बढ़े हैं। कई मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप कर यह तय करना पड़ा कि वास्तविक अधिकार किसके पास है।

मुरादाबाद का यह मामला भी उसी श्रेणी में देखा जा रहा है, जहां धार्मिक परंपरा और कानूनी अधिकार आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।

अदालत की अगली सुनवाई अहम

अब सभी की नजर छह जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है। यदि उस दिन विपक्षी पक्ष अदालत में उपस्थित होकर जवाब दाखिल करता है तो विवाद की वास्तविक कानूनी बहस शुरू हो सकती है। वहीं यदि फिर अनुपस्थिति रहती है तो अदालत सख्त रुख भी अपना सकती है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि इस मामले में अदालत को कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है। जैसे — महंत नियुक्ति की वास्तविक प्रक्रिया क्या थी, हटाने का अधिकार किसके पास है, क्या अखाड़े ने निर्धारित नियमों का पालन किया और क्या रामगिरि महाराज को पर्याप्त अवसर दिया गया था।

स्थानीय स्तर पर बढ़ी चर्चा

मुरादाबाद में यह विवाद धार्मिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं के बीच भी अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ लोग अखाड़े के निर्णय को सही मान रहे हैं, जबकि कई लोग रामगिरि महाराज के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर की गरिमा और धार्मिक वातावरण बनाए रखने के लिए विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अदालत का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

न्यायिक फैसले का दूरगामी असर

यह मामला केवल एक मंदिर या एक महंत तक सीमित नहीं माना जा रहा। अदालत का फैसला भविष्य में धार्मिक संस्थाओं में उत्तराधिकार और प्रबंधन से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

यदि अदालत यह मानती है कि महंत को हटाने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं हुआ, तो इससे धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक निर्णयों पर न्यायिक निगरानी और मजबूत हो सकती है। दूसरी ओर यदि अखाड़े के अधिकारों को मान्यता मिलती है तो धार्मिक संगठनों की स्वायत्तता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण बन जाएगा।

फिलहाल दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि मुरादाबाद का यह विवाद आने वाले समय में धार्मिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया के संबंधों पर बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।