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ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट एक्ट 2026 पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: “नाल्सा फैसले को खत्म करने की कोशिश?”

ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट एक्ट 2026 पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: “नाल्सा फैसले को खत्म करने की कोशिश?” — सिंघवी और जस्टिस बागची के बीच गरमाई अदालत

       देश की सर्वोच्च अदालत में ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट एक्ट 2026 को लेकर हुई सुनवाई ने केवल कानूनी गलियारों में ही नहीं, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक विमर्श में भी हलचल पैदा कर दी। सुनवाई के दौरान अदालत का माहौल कई बार इतना गर्म हो गया कि वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एएम सिंघवी और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची के बीच तीखी नोक-झोंक देखने को मिली। मामला केवल एक संशोधन कानून का नहीं था, बल्कि उस मूल संवैधानिक प्रश्न का था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2014 में ऐतिहासिक नाल्सा फैसले में मान्यता दी थी—क्या किसी व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने का अधिकार है या राज्य उसके लिए चिकित्सकीय कसौटियां तय कर सकता है?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने यह बहस कई घंटों तक चली। अदालत ने फिलहाल कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन यह संकेत भी दे दिया कि मामला बेहद गंभीर संवैधानिक महत्व का है और इसकी सुनवाई अब तीन जजों की विशेष पीठ करेगी। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है।

अदालत में क्यों उठा विवाद?

ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट एक्ट 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कहा गया है कि नया संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को सीमित करता है और आत्म-पहचान (Self-Identification) के सिद्धांत को कमजोर कर देता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि संशोधन के बाद किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता पाने के लिए मेडिकल बोर्ड और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरना होगा।

यहीं से विवाद शुरू हुआ।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने नाल्सा बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि लैंगिक पहचान व्यक्ति की आत्म-घोषणा पर आधारित होगी। ऐसे में नया कानून उस निर्णय की आत्मा को समाप्त कर रहा है।

सिंघवी ने अदालत में कहा कि संसद कानून बना सकती है, लेकिन वह किसी संवैधानिक निर्णय को अप्रत्यक्ष रूप से निष्प्रभावी नहीं कर सकती, जब तक कि उस फैसले का संवैधानिक आधार ही न बदला जाए।

उनकी यह दलील पूरी होते-होते न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने तुरंत हस्तक्षेप किया।

“आप ऐसा नहीं कह सकते” — जस्टिस बागची की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सबसे चर्चित क्षण तब आया जब सिंघवी ने कहा कि संशोधन का उद्देश्य नाल्सा फैसले को “शून्य” करना है। इस पर जस्टिस बागची ने उन्हें रोकते हुए कहा:

“आप ऐसा नहीं कह सकते।”

उन्होंने आगे कहा कि संसद को कानून बदलने का अधिकार है और यदि कानून का मूल ढांचा बदल दिया गया है, तो उसे सीधे अदालत की अवमानना या न्यायिक फैसले को निष्प्रभावी करने की कार्रवाई नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि नाल्सा फैसले के समय जो कानूनी संरचना मौजूद थी, अब संशोधन के बाद उसका “Substratum” यानी आधार बदल चुका है। पहले जहां आत्म-पहचान को प्रमुखता दी गई थी, अब मेडिकल इवैल्यूएशन और चिकित्सकीय सत्यापन की प्रक्रिया लाई गई है।

अदालत की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को केवल अधिकारों के प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि संसद की विधायी शक्ति बनाम न्यायिक निर्णय के टकराव के रूप में भी देख रहा है।

सिंघवी की दलील: “जेंडर दिमाग तय करता है, शरीर नहीं”

सिंघवी ने अपनी दलीलों में कहा कि किसी व्यक्ति का जेंडर केवल जैविक संरचना से निर्धारित नहीं होता। उन्होंने कहा कि आधुनिक मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानक यह स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति की मानसिक और मनोवैज्ञानिक पहचान ही उसकी वास्तविक लैंगिक पहचान होती है।

उन्होंने अदालत से कहा:

“अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से ब्रेस्ट सर्जरी, हार्मोन थेरेपी या जेंडर ट्रांजिशन करवाना चाहता है, तो राज्य उसे अपराध जैसा क्यों बना रहा है?”

सिंघवी ने दावा किया कि संशोधन कानून लागू होने के बाद कई अस्पतालों ने जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी करने से इनकार करना शुरू कर दिया है। डॉक्टरों को डर है कि कहीं उनके खिलाफ कार्रवाई न हो जाए।

उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया। उनका कहना था कि निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अधिकार व्यक्ति को अपने शरीर और पहचान से जुड़े निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है।

“इलाज के बीच में लोगों का क्या होगा?”

सिंघवी ने अदालत के सामने यह मुद्दा भी उठाया कि अनेक लोग पहले से जेंडर ट्रांजिशन प्रक्रिया में हैं। कुछ हार्मोन थेरेपी ले रहे हैं, कुछ सर्जरी की तैयारी में हैं और कुछ मानसिक परामर्श की प्रक्रिया में हैं।

उन्होंने अदालत से पूछा कि यदि अचानक कानून बदल जाए और सारी प्रक्रिया अवैध या प्रतिबंधित हो जाए, तो उन लोगों का क्या होगा जो पहले से चिकित्सा प्रक्रिया में हैं?

इसी आधार पर उन्होंने अदालत से अंतरिम राहत की मांग की। उन्होंने कहा कि कम से कम उन व्यक्तियों को सुरक्षा दी जानी चाहिए जो पहले से इलाज के चरण में हैं।

लेकिन अदालत इस स्तर पर किसी तत्काल रोक के पक्ष में नजर नहीं आई।

सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा सवाल: “क्या आरक्षण के लिए दुरुपयोग होगा?”

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक ऐसा प्रश्न उठाया जिसने पूरे विवाद को नया आयाम दे दिया।

उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में क्या यह संभव नहीं कि कुछ लोग आरक्षण या सरकारी लाभ लेने के उद्देश्य से ट्रांसजेंडर पहचान का “मुखौटा” पहन लें?

सीजेआई ने कहा कि अदालत को यह भी देखना होगा कि कानून का दुरुपयोग किस हद तक संभव है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि केवल आत्म-पहचान को ही अंतिम मान लिया जाए, तो सत्यापन की कोई व्यवस्था नहीं बचेगी।

यह टिप्पणी अदालत की चिंता को दर्शाती है कि व्यक्तिगत अधिकार और प्रशासनिक व्यावहारिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

हालांकि, सिंघवी ने इस पर तुरंत जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय को व्यापक आरक्षण लाभ नहीं दिए जा रहे हैं और यह तर्क केवल एक काल्पनिक आशंका पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि कुछ संभावित दुरुपयोग के आधार पर पूरे समुदाय के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

सरकार का पक्ष: “जबरन लिंग परिवर्तन रोकना जरूरी”

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने संशोधन कानून का बचाव करते हुए कहा कि इस कानून का उद्देश्य किसी समुदाय के अधिकार छीनना नहीं, बल्कि जबरन या अवैज्ञानिक लिंग परिवर्तन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करना है।

सरकार ने कहा कि हाल के वर्षों में नाबालिगों और मानसिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों के मामलों में बिना पर्याप्त परामर्श और चिकित्सकीय जांच के जेंडर ट्रांजिशन की घटनाएं सामने आई हैं। इसलिए एक नियामक ढांचा आवश्यक है।

सरकार का तर्क था कि मेडिकल इवैल्यूएशन का उद्देश्य अधिकारों को खत्म करना नहीं, बल्कि प्रक्रिया को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाना है।

नाल्सा फैसला आखिर था क्या?

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने नाल्सा बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ट्रांसजेंडर समुदाय को “तीसरे लिंग” के रूप में संवैधानिक मान्यता दी थी।

उस फैसले में अदालत ने कहा था कि:

  • व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान चुनने का अधिकार है।
  • आत्म-पहचान संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित है।
  • राज्य ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव नहीं कर सकता।
  • सरकार को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में विशेष कदम उठाने चाहिए।

नाल्सा फैसला भारत में LGBTQIA+ अधिकारों के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। यही वजह है कि नया संशोधन कानून आते ही बहस छिड़ गई कि क्या संसद उस निर्णय की मूल भावना को सीमित कर रही है।

संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ता मामला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में संविधान पीठ तक भी जा सकता है। इसमें कई बड़े प्रश्न शामिल हैं:

  • क्या आत्म-पहचान पूर्ण अधिकार है?
  • क्या राज्य मेडिकल सत्यापन अनिवार्य कर सकता है?
  • क्या संसद न्यायालय के संवैधानिक सिद्धांतों को बदल सकती है?
  • क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संतुलन संभव है?

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की विशेष पीठ गठित करने का संकेत दिया है।

अदालत ने फिलहाल क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट एक्ट 2026 पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि बिना विस्तृत सुनवाई के इतने महत्वपूर्ण कानून पर तत्काल स्थगन आदेश देना उचित नहीं होगा।

हालांकि अदालत ने यह स्वीकार किया कि मामला गंभीर संवैधानिक महत्व का है।

अदालत ने:

  • केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया,
  • जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया,
  • और मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने की प्रक्रिया शुरू की।

देशभर में बढ़ी बहस

सुनवाई के बाद सोशल मीडिया से लेकर कानूनी मंचों तक बहस तेज हो गई है। एक पक्ष का कहना है कि आत्म-पहचान व्यक्ति की मूल स्वतंत्रता है और राज्य को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि किसी भी कानूनी पहचान व्यवस्था में सत्यापन तंत्र आवश्यक होता है।

ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है कि यदि मेडिकल बोर्ड की व्यवस्था अनिवार्य हुई, तो इससे समुदाय को फिर से अपमानजनक और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा।

दूसरी ओर, कुछ सामाजिक संगठनों ने सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि नाबालिगों और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा के लिए चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है।

आगे क्या होगा?

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ पर होगी। यह मामला केवल ट्रांसजेंडर अधिकारों का नहीं, बल्कि भारतीय संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा, निजता और राज्य की नियामक शक्ति की सीमाओं का भी परीक्षण बन चुका है।

आने वाले महीनों में यह तय होगा कि भारत आत्म-पहचान के सिद्धांत को कितना व्यापक रूप से स्वीकार करता है और क्या राज्य व्यक्ति की लैंगिक पहचान पर चिकित्सकीय नियंत्रण स्थापित कर सकता है।

फिलहाल इतना तय है कि सुप्रीम Court की यह सुनवाई भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक अधिकार मामलों में गिनी जाएगी।