अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “यह अधिकार नहीं, संकट में परिवार को राहत देने की व्यवस्था”
अनुकंपा नियुक्ति को लेकर लंबे समय से देशभर की अदालतों में विवाद सामने आते रहे हैं। अक्सर किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु के बाद परिवार के एक से अधिक सदस्य नौकरी पर दावा करते हैं, जिससे कानूनी विवाद उत्पन्न हो जाता है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति किसी की संपत्ति या पैतृक अधिकार नहीं है, बल्कि यह केवल उस परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था है जो कर्मचारी की मृत्यु के बाद संकट में आ गया हो।
जस्टिस जयकुमार पिल्लई की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पिता की नौकरी पर दावा करने वाली बेटी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को आर्थिक सुरक्षा देना है, न कि उत्तराधिकार विवादों का समाधान करना।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में सक्सेशन सर्टिफिकेट की मांग करना कानून सम्मत नहीं है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियुक्ति के लिए वही नीति लागू होगी जो कर्मचारी की मृत्यु के समय प्रभावी थी।
क्या है पूरा मामला
मामला रतलाम जिला अस्पताल में पदस्थ ड्राइवर रमेशवान गोस्वामी से जुड़ा था। 22 जून 2020 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होने के बाद उनके पुत्र रितेश वान ने दिसंबर 2021 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।
लेकिन कुछ समय बाद रमेशवान की बेटी अनीता वान ने भी उसी पद पर दावा प्रस्तुत कर दिया। दोनों भाई-बहन के दावे सामने आने के बाद विभाग असमंजस में पड़ गया।
विभाग ने 23 जनवरी 2024 और 6 फरवरी 2024 को पत्र जारी कर दोनों पक्षों से सक्सेशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने को कहा, ताकि यह तय किया जा सके कि वास्तविक वारिस कौन है।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुंचे।
रितेश की ओर से क्या दलील दी गई
रितेश की ओर से अदालत में कहा गया कि उनके पिता ने सेवा के दौरान उन्हें नामिनी बनाया था। परिवार पूरी तरह पिता की आय पर निर्भर था और पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी बहन अनीता शादीशुदा है और अलग निवास करती है। इसलिए परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर है।
रितेश ने अदालत को बताया कि अनीता ने पहले हलफनामा देकर उन्हें नियुक्ति देने पर सहमति भी दी थी। इसलिए बाद में दावा प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
बेटी अनीता की दलील
दूसरी ओर अनीता वान ने खुद को पिता की वैध वारिस बताते हुए सेवा लाभों में बराबरी का अधिकार जताया। उन्होंने कहा कि केवल नामिनी बनाए जाने से कोई व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता।
उन्होंने सुप्रीम Court के उस सिद्धांत का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि नामिनी केवल संपत्ति का संरक्षक होता है, अंतिम मालिक नहीं। वास्तविक अधिकार कानूनी वारिसों का होता है।
अनीता ने यह भी आरोप लगाया कि जो नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया गया है, वह संदिग्ध और फर्जी है। इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विभाग के सामने भाई और बहन दोनों ने दावा किया था। ऐसे में यह तय करना कठिन था कि नियुक्ति किसे दी जाए।
इसी कारण विभाग ने सक्सेशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने को कहा, ताकि वास्तविक उत्तराधिकारी का निर्धारण हो सके और भविष्य में कोई विवाद न रहे।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य उत्तराधिकार तय करना नहीं होता। यह कोई संपत्ति का बंटवारा नहीं है।
अदालत ने कहा कि सक्सेशन सर्टिफिकेट सामान्यतः संपत्ति और वित्तीय अधिकारों के विवादों में आवश्यक होता है, लेकिन अनुकंपा नियुक्ति पूरी तरह अलग प्रकृति की व्यवस्था है। इसका मकसद केवल उस परिवार को तात्कालिक राहत देना है जिसकी आजीविका कर्मचारी की मृत्यु से प्रभावित हुई हो।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि विभाग द्वारा सक्सेशन सर्टिफिकेट मांगना मनमाना और कानून के विपरीत है।
अदालत ने कहा कि यदि हर अनुकंपा नियुक्ति के मामले में सक्सेशन सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया जाए तो पूरी योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि तब वर्षों तक विवाद चलता रहेगा और परिवार तत्काल राहत से वंचित हो जाएगा।
“अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं”
हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यही रही कि अनुकंपा नियुक्ति कोई वैधानिक या संपत्ति संबंधी अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि सरकारी नौकरी सामान्यतः योग्यता और प्रतिस्पर्धा के आधार पर दी जाती है। अनुकंपा नियुक्ति इस सामान्य नियम का अपवाद है। इसलिए इसे केवल मानवीय आधार पर लागू किया जाता है ताकि कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट से उबर सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी विशेष सदस्य को स्थायी अधिकार देना नहीं है। इसलिए इसे पैतृक संपत्ति या उत्तराधिकार की तरह नहीं देखा जा सकता।
2014 की नीति लागू होगी
मामले में एक महत्वपूर्ण विवाद यह भी था कि कौन सी नीति लागू होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी रमेशवान गोस्वामी की मृत्यु वर्ष 2020 में हुई थी। उस समय मध्यप्रदेश सरकार की 2014 वाली अनुकंपा नियुक्ति नीति प्रभावी थी। इसलिए उसी नीति के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2023 में जो संशोधित नीति लाई गई, उसे पुराने मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई मामलों में सरकार नई नीतियों को पुराने विवादों पर लागू करने की कोशिश करती है, जिससे पात्रता और प्राथमिकता बदल जाती है।
नीति में प्राथमिकता क्रम क्या है
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 2014 की नीति का उल्लेख करते हुए बताया कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्राथमिकता क्रम पहले से निर्धारित है।
इस क्रम में सबसे पहले पति या पत्नी का अधिकार माना गया है। इसके बाद पुत्र या अविवाहित पुत्री को प्राथमिकता दी जाती है। फिर विधवा या तलाकशुदा पुत्री का क्रम आता है।
अदालत ने कहा कि इस नीति का उद्देश्य परिवार के उस सदस्य को नौकरी देना है जो वास्तव में परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में हो और परिवार के साथ रहकर आश्रितों का पालन-पोषण कर सके।
भाई को क्यों मिली प्राथमिकता
हाईकोर्ट ने पाया कि रितेश परिवार के साथ रह रहे थे और पिता की आय पर परिवार निर्भर था। वहीं अनीता शादीशुदा थीं और अलग निवास कर रही थीं।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि प्रारंभिक स्तर पर अनीता ने सहमति दी थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि परिवार की तात्कालिक आर्थिक सहायता के उद्देश्य से रितेश को अनुकंपा नियुक्ति देना उचित होगा।
अदालत ने लगाई महत्वपूर्ण शर्त
हालांकि हाईकोर्ट ने रितेश के पक्ष में राहत दी, लेकिन साथ ही एक महत्वपूर्ण शर्त भी लगाई।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियुक्ति से पहले रितेश को हलफनामा देना होगा कि वे अपनी मां और परिवार के अन्य आश्रितों का भरण-पोषण करेंगे।
अदालत ने साफ कहा कि यदि भविष्य में यह पाया गया कि वे अपने आश्रितों की जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं, तो उनकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है।
यह शर्त इस बात को दर्शाती है कि अदालत केवल नौकरी देने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अनुकंपा नियुक्ति का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो।
फैसले का व्यापक प्रभाव
यह फैसला भविष्य में आने वाले कई विवादों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
देशभर में ऐसे अनेक मामले सामने आते हैं जहां कर्मचारी की मृत्यु के बाद भाई-बहन, पत्नी, पुत्र या अन्य परिजन नौकरी पर दावा करते हैं। विभाग अक्सर विवाद से बचने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट मांग लेते हैं, जिससे प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि अनुकंपा नियुक्ति को उत्तराधिकार विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता। विभागों को नीति और वास्तविक पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों के अनुसार हाईकोर्ट का यह निर्णय व्यावहारिक और मानवीय दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति को संपत्ति विवाद की तरह माना जाएगा तो परिवार वर्षों तक राहत से वंचित रहेगा। इससे योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
अदालत ने इस फैसले में यह संतुलन बनाने की कोशिश की है कि एक ओर परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता मिले और दूसरी ओर अन्य आश्रितों के हित भी सुरक्षित रहें।
सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण फैसला
यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने यह नहीं कहा कि शादीशुदा बेटी का कोई अधिकार नहीं है। बल्कि अदालत ने यह देखा कि परिवार की वास्तविक आर्थिक जिम्मेदारी कौन उठा रहा है और कौन आश्रितों के साथ रह रहा है।
यानी अदालत ने केवल रिश्ते के आधार पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों और नीति के आधार पर निर्णय दिया।
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति की मूल भावना को स्पष्ट करता है। अदालत ने दो टूक कहा कि यह किसी की पैतृक संपत्ति या स्थायी अधिकार नहीं, बल्कि संकटग्रस्त परिवार को तत्काल राहत देने की मानवीय व्यवस्था है।
साथ ही हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों को भी संदेश दिया कि वे अनुकंपा नियुक्ति को अनावश्यक कानूनी औपचारिकताओं में न उलझाएं। सक्सेशन सर्टिफिकेट जैसी शर्तें लगाकर परिवारों को वर्षों तक इंतजार करवाना नीति के उद्देश्य के विपरीत है।
यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है और अनुकंपा नियुक्ति को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण को और स्पष्ट करेगा।