फरार आरोपियों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा संदेश: “न्याय से भागना आसान नहीं”, NBW से लेकर कुर्की तक की प्रक्रिया को बताया वैध
भारतीय न्याय व्यवस्था में अक्सर यह प्रश्न उठता रहा है कि यदि कोई आरोपी जमानत मिलने के बाद भी लगातार अदालत में उपस्थित न हो, ट्रायल को टालता रहे और न्यायिक प्रक्रिया से बचने का प्रयास करे, तो अदालतों के पास उसके खिलाफ क्या प्रभावी उपाय उपलब्ध हैं। इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक विस्तृत और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया से भागने वाले आरोपियों के प्रति अदालतें नरमी नहीं बरत सकतीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फरार आरोपी के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant) तथा उससे संबंधित समस्त कार्रवाई को वैध ठहराते हुए कहा कि यदि कोई आरोपी जमानत पर होने के बावजूद लगातार अनुपस्थित रहता है और ट्रायल को बाधित करता है, तो अदालत को उसके विरुद्ध कठोर कदम उठाने का पूर्ण अधिकार है। हालांकि न्यायालय ने याची को सीमित राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश पर अस्थायी रोक लगाई, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट चेतावनी भी दी कि यदि भविष्य में आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह महत्वपूर्ण फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी द्वारा पारित किया गया। न्यायालय ने केवल याचिका का निस्तारण ही नहीं किया, बल्कि फरार आरोपियों से जुड़े मामलों में विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए, जिनका पालन गृह विभाग, पुलिस प्रशासन, अभियोजन विभाग तथा अधीनस्थ न्यायालयों को अनिवार्य रूप से करना होगा।
क्या था पूरा मामला
मामला आगरा निवासी रवि उर्फ रविंद्र सिंह से जुड़ा था, जिसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ट्रायल कोर्ट द्वारा 18 अक्टूबर 2024 को जारी गैर-जमानती वारंट को चुनौती दी थी।
प्रकरण के अनुसार वर्ष 2020 में याची सहित तीन व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) तथा धारा 504 (जानबूझकर अपमान एवं गाली-गलौज) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिस जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया और वर्ष 2021 में ट्रायल कोर्ट ने मामले का संज्ञान ले लिया।
इसी दौरान आरोपी ने हाईकोर्ट से जमानत प्राप्त कर ली। लेकिन जमानत मिलने के बाद आरोपी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सहयोगात्मक नहीं रहा। रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी कई बार अदालत में पेश नहीं हुआ और लगातार अनुपस्थित रहने लगा।
विशेष रूप से 18 अक्टूबर 2024 के बाद आरोपी लगातार अदालत से अनुपस्थित रहा। इस स्थिति को देखते हुए ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया।
आरोपी की दलील और हाईकोर्ट की प्रतिक्रिया
याची की ओर से यह तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने सीधे गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया, जबकि पहले जमानती वारंट जारी किया जाना चाहिए था। याची का कहना था कि यह प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं थी और अदालत ने अत्यधिक कठोर कदम उठा लिया।
लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
न्यायालय ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि आरोपी ने जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया से बचने का प्रयास किया था। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी 29 से अधिक तारीखों पर अनुपस्थित रहा और उसके विरुद्ध एनबीडब्ल्यू जारी होने के बावजूद उसने अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया।
इसके अतिरिक्त आरोपी के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के तहत उद्घोषणा (Proclamation) तथा धारा 83 के अंतर्गत संपत्ति कुर्की की कार्रवाई भी प्रारंभ की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई आरोपी लगातार अनुपस्थित रहकर ट्रायल को प्रभावित करता है, तब अदालत को यह अधिकार प्राप्त है कि वह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने हेतु कठोर उपाय अपनाए।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान प्रत्येक आरोपी का दायित्व है। जमानत का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी अदालत की कार्यवाही को हल्के में ले या अपनी सुविधा के अनुसार उपस्थित हो।
न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी जानबूझकर ट्रायल में देरी करता है, तो यह केवल न्यायालय का अपमान नहीं बल्कि पीड़ित और समाज के प्रति भी अन्याय है।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालयों का दायित्व केवल आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावी, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी हो।
फरार आरोपियों के मामलों में चरणबद्ध प्रक्रिया
अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फरार आरोपियों के मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को विस्तार से स्पष्ट किया।
न्यायालय ने कहा कि कानून पहले से ही ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान प्रदान करता है और अदालतों को चरणबद्ध तरीके से उनका पालन करना चाहिए।
1. समन और वारंट
यदि आरोपी प्रारंभिक चरण में अदालत में उपस्थित नहीं होता, तो उसके खिलाफ समन अथवा जमानती वारंट जारी किया जा सकता है।
2. गैर-जमानती वारंट (NBW)
यदि आरोपी बार-बार अनुपस्थित रहता है अथवा अदालत को यह प्रतीत होता है कि वह जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया से बच रहा है, तब गैर-जमानती वारंट जारी किया जा सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर मामले में पहले जमानती वारंट जारी करना अनिवार्य नहीं है। परिस्थितियों के आधार पर अदालत सीधे एनबीडब्ल्यू भी जारी कर सकती है।
3. धारा 82 सीआरपीसी के तहत उद्घोषणा
यदि आरोपी एनबीडब्ल्यू के बावजूद उपस्थित नहीं होता, तो उसे “फरार” घोषित करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
धारा 82 के तहत अदालत आरोपी को एक निश्चित अवधि के भीतर उपस्थित होने का आदेश देती है। यदि वह उपस्थित नहीं होता, तो उसे उद्घोषित अपराधी घोषित किया जा सकता है।
4. धारा 83 के तहत संपत्ति कुर्की
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी लगातार फरार रहता है, तो उसकी संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई भी वैध है।
यह प्रक्रिया केवल दंडात्मक नहीं बल्कि आरोपी को न्यायिक प्रक्रिया में वापस लाने का एक कानूनी माध्यम है।
जमानतदारों की जिम्मेदारी पर भी सख्त रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में जमानतदारों की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की।
न्यायालय ने कहा कि यदि कोई आरोपी जमानत पर रिहा होने के बाद अदालत में उपस्थित नहीं होता, तो केवल आरोपी ही नहीं बल्कि उसके जमानतदार भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में—
- आरोपी की जमानत जब्त की जाए,
- जमानतदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए,
- आवश्यक होने पर उनसे वसूली की जाए,
- और बार-बार गैरहाजिरी पर गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाए।
न्यायालय ने यह भी कहा कि फरार आरोपी के खिलाफ अलग से मुकदमा चलाया जा सकता है।
“तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर टिप्पणी
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय प्रणाली में लंबे समय से चली आ रही “तारीख पर तारीख” की समस्या पर भी चिंता व्यक्त की।
न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट्स को बिना उचित कारण के बार-बार स्थगन देने से बचना चाहिए। विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ गवाह उपस्थित हों, अदालतों को रोजाना सुनवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि न्याय में अनावश्यक देरी अंततः न्याय से वंचित करने के समान है।
अनुपस्थिति में ट्रायल (Trial in Absentia) पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस फैसले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि न्यायालय ने “इन एब्सेंटिया ट्रायल” अर्थात आरोपी की अनुपस्थिति में ट्रायल की संभावना पर भी टिप्पणी की।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी लगातार फरार रहता है और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग नहीं करता, तो परिस्थितियों के अनुसार उसके वकील अथवा अमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) के माध्यम से भी ट्रायल आगे बढ़ाया जा सकता है।
आवश्यक परिस्थितियों में आरोपी की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रखी जा सकती है।
यह टिप्पणी विशेष रूप से उन मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जहाँ आरोपी वर्षों तक फरार रहकर ट्रायल को लंबित बनाए रखते हैं।
पुलिस और प्रशासन को सख्त निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केवल न्यायालयों को ही नहीं बल्कि पुलिस और प्रशासन को भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए।
न्यायालय ने कहा कि—
- पुलिस को एनबीडब्ल्यू का शीघ्र क्रियान्वयन करना होगा,
- उद्घोषणा और कुर्की की कार्रवाई में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए,
- फरार आरोपी के मामलों में जांच लंबित नहीं रखी जा सकती,
- आरोपी के फरार होने के बावजूद समय पर चार्जशीट दाखिल करनी होगी।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रत्येक जिले में मॉनिटरिंग सेल गठित की जाए जो गैर-जमानती वारंटों के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा करे।
इसके अतिरिक्त अदालत ने कहा कि पीड़ित पक्ष को मामले की प्रगति की नियमित जानकारी दी जानी चाहिए।
आदेश की प्रति वरिष्ठ अधिकारियों को भेजने का निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह, पुलिस महानिदेशक (DGP) तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया।
इससे स्पष्ट है कि न्यायालय इस निर्णय को केवल एक व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे राज्यव्यापी प्रशासनिक और न्यायिक सुधार के रूप में लागू होते देखना चाहता है।
न्याय व्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह निर्णय कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पहला, इसने स्पष्ट कर दिया है कि जमानत का दुरुपयोग करने वाले आरोपियों के प्रति अदालतें सख्त रुख अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
दूसरा, इस फैसले ने ट्रायल कोर्ट्स को यह संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने के लिए उपलब्ध कानूनी प्रावधानों का सक्रिय उपयोग किया जाना चाहिए।
तीसरा, इस निर्णय ने पीड़ित पक्ष के अधिकारों को भी महत्व दिया है। अक्सर आरोपी की अनुपस्थिति के कारण मुकदमे वर्षों तक लंबित रहते हैं और पीड़ित न्याय के लिए भटकते रहते हैं। हाईकोर्ट ने इस स्थिति को न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जवाबदेही और न्यायिक अनुशासन को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण फैसला है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कोई भी आरोपी कानून से ऊपर नहीं है और न्यायिक प्रक्रिया से भागना अंततः उसके खिलाफ ही जाएगा।
गैर-जमानती वारंट, उद्घोषणा, संपत्ति कुर्की और अनुपस्थिति में ट्रायल जैसे प्रावधान केवल औपचारिक कानूनी प्रक्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करने के प्रभावी उपकरण हैं।
यह फैसला आने वाले समय में उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा जहाँ आरोपी जमानत मिलने के बाद अदालत से दूरी बनाकर ट्रायल को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने इस निर्णय से यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय अब ऐसे मामलों में निष्क्रिय दर्शक बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे।