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मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण विवाद: हाईकोर्ट में टली सुनवाई, 13 मई से तीन दिवसीय अहम बहस तय

मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण विवाद: हाईकोर्ट में टली सुनवाई, 13 मई से तीन दिवसीय अहम बहस तय

        मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मंगलवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई टल गई, जिससे इस बहुप्रतीक्षित फैसले की राह और लंबी हो गई है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर 13 मई से लगातार तीन दिनों तक विस्तृत सुनवाई की जाएगी। इस मामले का प्रभाव केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर भी गहरा असर डाल सकता है।

सुनवाई टलने की वजह और अदालत का रुख

मामले की सुनवाई संजीव सचदेवा और विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष होनी थी। राज्य सरकार की ओर से पेश आवेदन में बताया गया कि OBC आरक्षण से जुड़े मामलों में नियुक्त विशेष अभियोजक अदालत के समक्ष पक्ष प्रस्तुत नहीं करेंगे। इस स्थिति ने अदालत को सुनवाई स्थगित करने पर मजबूर कर दिया।

साथ ही, राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में सीधे दायर पांच याचिकाएं अभी तक हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं हुई हैं। इस पर युगलपीठ ने कहा कि जब तक सभी संबंधित याचिकाएं एक ही मंच पर उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक समग्र और प्रभावी सुनवाई संभव नहीं है। इसलिए, अदालत ने 13, 14 और 15 मई को लगातार सुनवाई के निर्देश दिए।

आरक्षण का मूल विवाद: 27% OBC कोटा

मध्य प्रदेश सरकार ने OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया है, जिसे कई याचिकाओं में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि यह आरक्षण सीमा संविधान द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से अधिक हो सकती है, जो कि पहले से ही SC/ST आरक्षण के साथ मिलकर लागू होती है।

इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय Indra Sawhney v. Union of India (मंडल आयोग मामला) का है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए, सिवाय विशेष परिस्थितियों के। इसके अलावा, हाल ही में Maratha Reservation Case में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी सीमा को दोहराया था और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को निरस्त कर दिया था।

87:13 फॉर्मूला और ‘होल्ड पदों’ का विवाद

मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण लागू करने के लिए सरकार ने 87:13 का फॉर्मूला अपनाया है। इसके तहत 87 प्रतिशत पदों पर आरक्षण लागू किया जाता है, जबकि 13 प्रतिशत पदों को ‘होल्ड’ पर रखा जाता है। इन होल्ड पदों को लेकर भी काफी विवाद है।

कई याचिकाओं में यह कहा गया है कि होल्ड पदों की व्यवस्था संविधान के समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इन पदों को लंबे समय तक खाली रखना न केवल प्रशासनिक कार्यों को प्रभावित करता है, बल्कि यह योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का भी हनन करता है।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बीच मामला

यह मामला पहले मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करा लिया गया था। लेकिन 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को वापस हाईकोर्ट में भेज दिया, यह कहते हुए कि राज्य स्तर के इस विवाद का समाधान पहले हाईकोर्ट में ही होना चाहिए।

इस निर्णय के बाद हाईकोर्ट में फिर से सुनवाई शुरू हुई और बड़ी संख्या में याचिकाएं दाखिल की गईं। जानकारी के अनुसार, OBC आरक्षण के खिलाफ लगभग 70 याचिकाएं और समर्थन में करीब 30 याचिकाएं दायर की गई हैं।

याचिकाओं का वर्गीकरण और सुनवाई की तैयारी

मामले की जटिलता को देखते हुए अदालत ने सभी याचिकाओं को पक्ष और विपक्ष के आधार पर अलग-अलग करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि सुनवाई के दौरान तर्कों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।

सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन पैरवी कर रहे हैं, जबकि विपक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी अपनी दलीलें रख रहे हैं।

संवैधानिक और सामाजिक पहलू

OBC आरक्षण का मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देते हैं। लेकिन यह भी जरूरी है कि इन प्रावधानों का उपयोग संतुलित और न्यायसंगत तरीके से किया जाए।

आरक्षण का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाना है, लेकिन यदि यह व्यवस्था असंतुलित हो जाए, तो यह अन्य वर्गों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि अदालत इस मामले में अत्यंत सावधानी बरत रही है।

राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की दिशा

मध्य प्रदेश में OBC वर्ग एक बड़ा वोट बैंक है, और इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। आने वाले समय में इस मामले का निर्णय राज्य की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

यदि अदालत 27 प्रतिशत आरक्षण को वैध ठहराती है, तो यह सरकार के लिए बड़ी जीत होगी। वहीं, यदि इसे असंवैधानिक घोषित किया जाता है, तो सरकार को नई नीति बनानी पड़ सकती है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण का मामला एक जटिल कानूनी और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। हाईकोर्ट द्वारा सुनवाई टलने के बावजूद यह स्पष्ट है कि आने वाली 13 मई से शुरू होने वाली तीन दिवसीय सुनवाई अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।

इस मामले में अदालत को न केवल संविधान की सीमाओं का ध्यान रखना होगा, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांतों के बीच संतुलन भी बनाना होगा। पूरे देश की नजरें इस फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि इसका प्रभाव केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।