“किन्नरों की ‘बधाई’ प्रथा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: परंपरा बनाम कानून की सीमा रेखा”
Allahabad High Court के एक महत्वपूर्ण फैसले ने किन्नर समुदाय की पारंपरिक “बधाई” प्रथा को लेकर एक स्पष्ट कानूनी रुख सामने रखा है। अदालत ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति—चाहे वह किसी भी समुदाय से हो—को दूसरों से “बधाई”, नजराना या धन वसूलने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है, जब तक कि उसे कानून का समर्थन न हो। यह टिप्पणी न केवल एक याचिका के निपटारे तक सीमित है, बल्कि व्यापक रूप से “परंपरा बनाम विधि” के सवाल को भी सामने लाती है।
यह फैसला रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 15 अप्रैल को न्यायमूर्ति Justice Alok Mathur और न्यायमूर्ति Justice Amitabh Kumar Rai की खंडपीठ द्वारा दिया गया। अदालत ने याचिकाकर्ता की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अन्य किन्नरों द्वारा अपने कथित “क्षेत्रीय अधिकार” में हस्तक्षेप रोकने और सुरक्षा देने की गुहार लगाई थी।
विवाद की जड़: ‘बधाई’ और क्षेत्रीय अधिकार
याचिकाकर्ता रेखा देवी ने अदालत को बताया कि वह गोंडा जिले में लंबे समय से किन्नर समुदाय की पारंपरिक “बधाई” प्रथा के तहत नवजात शिशु के जन्म, विवाह या अन्य शुभ अवसरों पर जाकर धन या उपहार प्राप्त करती रही हैं। उनके अनुसार, यह केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रकार का “प्रथागत अधिकार” (customary right) बन चुका है।
समस्या तब उत्पन्न हुई जब उसी क्षेत्र में अन्य किन्नर समूहों ने भी इसी प्रकार की गतिविधियां शुरू कर दीं। इससे कथित तौर पर:
- क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद पैदा हुआ
- समुदाय के भीतर तनाव और हिंसा की स्थिति बनी
- याचिकाकर्ता को अपने काम में बाधा और खतरे का सामना करना पड़ा
इन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने अदालत से मांग की कि:
- उनके “क्षेत्रीय अधिकार” को मान्यता दी जाए
- अन्य समूहों को उस क्षेत्र में प्रवेश से रोका जाए
- उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए
अदालत का स्पष्ट रुख: ‘कानून से ऊपर कोई परंपरा नहीं’
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि:
“कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति से धन, कर, शुल्क या उपकर वसूले जा सकते हैं। ऐसी किसी वसूली को वैध ठहराने वाला कोई कानूनी आधार मौजूद नहीं है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- “बधाई” के नाम पर धन लेना यदि स्वेच्छा से दिया जाए, तो अलग बात है
- लेकिन इसे “अधिकार” के रूप में लागू करना या जबरन वसूली करना पूरी तरह अवैध है
इस प्रकार अदालत ने यह स्थापित किया कि कोई भी परंपरा, चाहे कितनी ही पुरानी क्यों न हो, यदि वह कानून के अनुरूप नहीं है, तो उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
अनुच्छेद 226 के तहत सीमाएं
याचिकाकर्ता ने Article 226 of the Constitution of India के तहत हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। लेकिन अदालत ने कहा कि:
- अनुच्छेद 226 के तहत न्यायालय केवल उन्हीं अधिकारों की रक्षा कर सकता है, जिन्हें कानून मान्यता देता है
- अदालत किसी ऐसे कार्य को वैध नहीं ठहरा सकती, जिसका कोई विधिक आधार ही न हो
इस प्रकार, याचिकाकर्ता द्वारा मांगा गया “क्षेत्रीय अधिकार” न्यायिक संरक्षण के दायरे में नहीं आया।
मौलिक अधिकारों का तर्क भी खारिज
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में Article 14 of the Constitution of India, Article 19 of the Constitution of India और Article 21 of the Constitution of India का हवाला दिया।
उनका तर्क था कि:
- “बधाई” लेना उनका पेशा है
- इस पेशे को जारी रखना उनका मौलिक अधिकार है
- उन्हें हिंसा के भय से सुरक्षा मिलनी चाहिए
लेकिन अदालत ने कहा कि:
- कोई भी पेशा तभी संरक्षित होगा जब वह कानून सम्मत (lawful) हो
- अवैध गतिविधि को मौलिक अधिकार का संरक्षण नहीं मिल सकता
अवैध वसूली: आपराधिक दृष्टिकोण
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की गतिविधियों को मान्यता दी जाती है, तो इससे अवैध वसूली (extortion) को बढ़ावा मिलेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- इस तरह की जबरन वसूली अपराध की श्रेणी में आती है
- इसे Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के तहत दंडनीय माना जा सकता है
यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस प्रथा को केवल “सामाजिक मुद्दा” नहीं, बल्कि “कानूनी अपराध” के रूप में भी देखती है।
ट्रांसजेंडर कानून का संदर्भ
अदालत ने Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने पाया कि:
- इस कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान और सम्मान से जुड़े अधिकार दिए गए हैं
- लेकिन इसमें कहीं भी “बधाई” या नजराना वसूलने का अधिकार प्रदान नहीं किया गया है
इसलिए इस अधिनियम के आधार पर भी याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
परंपरा बनाम आधुनिक कानून
यह मामला एक बड़े सामाजिक प्रश्न को उजागर करता है—क्या परंपराएं कानून से ऊपर हो सकती हैं?
भारत में किन्नर समुदाय की “बधाई” प्रथा सदियों पुरानी है और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य रही है। लेकिन समय के साथ:
- कई जगह यह स्वैच्छिक परंपरा से हटकर जबरन वसूली का रूप लेने लगी
- इससे आम नागरिकों में असहजता और विवाद पैदा हुए
- कानून और व्यवस्था की चुनौती बढ़ी
हाईकोर्ट का यह फैसला इसी बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए दिया गया प्रतीत होता है।
संतुलन की चुनौती: अधिकार बनाम दुरुपयोग
यह भी सच है कि ट्रांसजेंडर समुदाय लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक हाशिए पर रहा है। उनके लिए “बधाई” जैसी प्रथाएं जीविका का एक साधन रही हैं।
लेकिन अदालत ने यह संकेत दिया कि:
- जीविका का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन वह कानून के दायरे में होना चाहिए
- किसी भी समुदाय को ऐसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जो दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करे
आगे का रास्ता: समाधान क्या हो सकता है?
यह फैसला एक अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत है—एक ऐसी बहस की, जिसमें समाज और राज्य दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
संभावित समाधान हो सकते हैं:
- ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर
- कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं
- कानून के दायरे में रहकर सम्मानजनक आजीविका के साधन
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की सर्वोच्चता (rule of law) किसी भी परंपरा से ऊपर है।
“बधाई” जैसी प्रथाएं सांस्कृतिक रूप से भले ही स्वीकार्य रही हों, लेकिन उन्हें “कानूनी अधिकार” का दर्जा नहीं दिया जा सकता—खासकर तब, जब वे जबरन वसूली का रूप ले लें।
यह निर्णय न केवल एक याचिका का निपटारा है, बल्कि यह उस दिशा की ओर संकेत करता है, जहां भारतीय न्यायपालिका परंपरा और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश कर रही है—और यह संतुलन हमेशा कानून के पक्ष में झुकता है।