डॉग मीट विवाद पर बंटी न्यायपालिका: गुवाहाटी हाईकोर्ट का विभाजित फैसला और आगे की राह
पूर्वोत्तर भारत में परंपरा, संस्कृति और कानून के टकराव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण तब सामने आया जब गुवाहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा खंडपीठ ने नागालैंड में डॉग मीट के व्यापार और बिक्री पर रोक से जुड़े मामलों में विभाजित (Split Verdict) फैसला सुनाया। दो जजों की अलग-अलग राय के कारण यह मामला अब बड़ी पीठ के समक्ष जाने की स्थिति में पहुंच गया है, जहां अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
यह मामला केवल एक खाद्य पदार्थ के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक अधिकार, पशु संरक्षण, प्रशासनिक अधिकारिता और संवैधानिक मूल्यों के बीच जटिल संतुलन का प्रश्न शामिल है।
विवाद की पृष्ठभूमि: 2020 का प्रतिबंध
नागालैंड सरकार ने जुलाई 2020 में एक अधिसूचना जारी कर—
- कुत्तों के व्यावसायिक आयात
- उनके व्यापार
- बाजारों में बिक्री
- और डॉग मीट के उपभोग
पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
यह निर्णय राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद लिया गया था। सरकार का तर्क था कि—
- पशु क्रूरता को रोकना आवश्यक है
- और सार्वजनिक स्वास्थ्य व नैतिकता के आधार पर यह कदम उचित है
लेकिन यह फैसला विवादों में घिर गया, क्योंकि—
- नागालैंड के कई समुदायों में डॉग मीट पारंपरिक भोजन का हिस्सा है
- इसे सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा जाता है
अदालत में चुनौती: दो प्रमुख याचिकाएं
इस प्रतिबंध को अदालत में चुनौती दी गई। बाद में दो महत्वपूर्ण याचिकाएं सामने आईं—
- 2023 की याचिका
- पीपल फॉर एनिमल्स और ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल/भारत द्वारा दायर
- 2024 की याचिका
- अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ द्वारा दायर
इन याचिकाओं में जून 2023 के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें अदालत ने राज्य सरकार के प्रतिबंध आदेश को निरस्त कर दिया था।
2023 का फैसला: प्रतिबंध रद्द
2 जून 2023 को कोहिमा खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था—
- नागालैंड सरकार के 2020 के प्रतिबंध आदेश को रद्द कर दिया गया
न्यायमूर्ति मार्ली वानकुन ने कहा था कि—
- मुख्य सचिव को ऐसा प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं था
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत यह अधिकार खाद्य सुरक्षा आयुक्त को प्राप्त है
यह फैसला तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारिता के आधार पर दिया गया था।
2026 का विभाजित फैसला: न्यायाधीशों में मतभेद
22 अप्रैल 2026 को जब इस मामले पर दोबारा सुनवाई हुई, तो गुवाहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा पीठ ने विभाजित फैसला सुनाया।
जस्टिस बुदी हाबुंग का रुख
बुदी हाबुंग ने—
- याचिकाओं को खारिज कर दिया
- 2023 के फैसले को बरकरार रखा
- डॉग मीट के व्यापार और उपभोग की अनुमति को सही माना
उनके अनुसार—
- याचिकाओं में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं था
जस्टिस रॉबिन फुकन का रुख
वहीं रॉबिन फुकन ने—
- याचिकाओं को स्वीकार किया
- 2023 के फैसले को निरस्त कर दिया
- और प्रतिबंध के पक्ष में रुख अपनाया
इस प्रकार, दोनों जजों की राय में स्पष्ट विरोधाभास सामने आया।
विभाजित फैसले का अर्थ क्या है?
जब दो जजों की पीठ किसी मामले में अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचती है, तो—
- कोई अंतिम निर्णय लागू नहीं होता
- मामला बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजा जाता है
अब इस मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
कानूनी मुद्दे: किन सवालों पर फैसला होना बाकी?
इस विवाद में कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शामिल हैं—
1. क्या राज्य सरकार को प्रतिबंध लगाने का अधिकार है?
- या यह अधिकार केवल खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के पास है?
2. क्या डॉग मीट पर प्रतिबंध “सार्वजनिक नैतिकता” के तहत उचित है?
3. क्या यह प्रतिबंध सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन है?
4. क्या पशु अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
इन सभी सवालों का अंतिम उत्तर बड़ी पीठ देगी।
सांस्कृतिक बनाम पशु अधिकार
यह मामला एक गहरे सामाजिक टकराव को भी दर्शाता है—
सांस्कृतिक पक्ष
- कई समुदायों के लिए डॉग मीट पारंपरिक भोजन है
- इसे उनकी पहचान और जीवनशैली का हिस्सा माना जाता है
पशु अधिकार पक्ष
- कुत्तों को पालतू और संवेदनशील जीव माना जाता है
- उनके मांस के व्यापार को अमानवीय बताया जाता है
अदालत को इन दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।
संवैधानिक दृष्टिकोण
भारत का संविधान इस तरह के मामलों में कई अधिकार प्रदान करता है—
अनुच्छेद 21
- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 25
- धर्म और आचरण की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 29
- सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा
साथ ही—
- राज्य को पशुओं की रक्षा का भी दायित्व दिया गया है
इसलिए यह मामला बहु-आयामी संवैधानिक संतुलन का उदाहरण है।
संभावित परिणाम: आगे क्या हो सकता है?
1. बड़ी पीठ का गठन
मामला अब बड़ी पीठ के पास जाएगा, जो अंतिम निर्णय देगी।
2. स्पष्ट नीति
राज्य में डॉग मीट व्यापार को लेकर एक स्पष्ट कानूनी स्थिति बनेगी।
3. राष्ट्रीय प्रभाव
यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि—
- यह मामला केवल नागालैंड तक सीमित नहीं रहेगा
- यह पूरे देश में खाद्य अधिकार और पशु संरक्षण पर बहस को प्रभावित करेगा
निष्कर्ष
गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह विभाजित फैसला यह दर्शाता है कि—
- कानून हमेशा स्पष्ट और एकरेखीय नहीं होता
- कई बार न्यायाधीश भी अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं
बुदी हाबुंग और रॉबिन फुकन के मतभेद ने इस मुद्दे को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
अब सबकी नजर बड़ी पीठ के निर्णय पर है, जो तय करेगा कि—
नागालैंड में डॉग मीट का भविष्य क्या होगा—परंपरा के साथ या प्रतिबंध के साथ।