नाबालिग की डीएनए जांच पर हाई कोर्ट की सख्ती: “वैधता, गरिमा और गोपनीयता सर्वोपरि”
नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच की मांग को लेकर आए एक संवेदनशील पारिवारिक विवाद में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसे मामलों में अदालतें सामान्य रूप से डीएनए परीक्षण की अनुमति नहीं दे सकतीं। अदालत ने पारिवारिक न्यायालय, नैनीताल के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति द्वारा की गई डीएनए जांच की मांग को खारिज कर दिया गया था।
यह निर्णय केवल एक व्यक्तिगत विवाद का निपटारा नहीं है, बल्कि यह भारतीय कानून में निहित उस व्यापक सिद्धांत को दोहराता है, जो वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता, गरिमा और गोपनीयता की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। अदालत ने साफ कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य की खोज के नाम पर किसी नाबालिग के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
मामला क्या था: पारिवारिक विवाद से अदालत तक
यह मामला नैनीताल निवासी एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। 16 दिसंबर, 2025 को पारित आदेश में फैमिली कोर्ट ने पति द्वारा नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच की मांग को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद पति ने इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
अपीलकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत वैवाहिक याचिका दायर की थी, जिसमें उसने अपनी पत्नी पर व्यभिचार (adultery) और वैवाहिक दुराचार के आरोप लगाए। इन आरोपों को सिद्ध करने के लिए उसने नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच कराने की मांग की थी।
पति का तर्क: “पितृत्व नहीं, केवल साक्ष्य चाहिए”
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत में यह दलील दी कि डीएनए परीक्षण की मांग का उद्देश्य बच्चे के पितृत्व को चुनौती देना नहीं था। उनका कहना था कि पति न तो बच्चे की वैधता को खत्म करना चाहता है और न ही उसकी कानूनी स्थिति को प्रभावित करना चाहता है।
वकील ने यह भी कहा कि व्यभिचार जैसे मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना बेहद कठिन होता है, इसलिए वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA टेस्ट) एक महत्वपूर्ण साधन हो सकता है। इस आधार पर उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि केवल साक्ष्य जुटाने के उद्देश्य से डीएनए जांच की अनुमति दी जाए।
अदालत का दृष्टिकोण: कानून की स्पष्ट सीमा
इस मामले की सुनवाई मनोज कुमार तिवारी और पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने की। अदालत ने सभी तर्कों पर विचार करने के बाद यह पाया कि अपीलकर्ता डीएनए परीक्षण की मांग के लिए आवश्यक कानूनी आधार स्थापित करने में विफल रहा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून में इस प्रकार के मामलों के लिए पहले से ही एक मजबूत प्रावधान मौजूद है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
धारा 112: वैधता का निर्णायक अनुमान
अदालत ने अपने निर्णय में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 का विशेष उल्लेख किया। इस धारा के अनुसार, यदि कोई बच्चा वैध विवाह के दौरान जन्म लेता है, तो उसे पति का ही संतान माना जाएगा। यह एक “conclusive presumption” यानी निर्णायक अनुमान है, जिसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता।
इस अनुमान को केवल एक ही स्थिति में चुनौती दी जा सकती है—जब यह साबित किया जाए कि संबंधित समय में पति-पत्नी के बीच “non-access” (संपर्क का अभाव) था। यानी यह दिखाना होगा कि उस अवधि में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध संभव ही नहीं था।
अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ने न तो स्पष्ट रूप से “non-access” का दावा किया और न ही इसे साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किया। इस आधार पर अदालत ने कहा कि धारा 112 के तहत जो वैधानिक अनुमान है, वह पूरी तरह लागू रहेगा।
डीएनए परीक्षण और गोपनीयता का अधिकार
अदालत ने यह भी कहा कि डीएनए जांच केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की निजता (privacy) और गरिमा (dignity) से गहराई से जुड़ा हुआ मामला है। विशेष रूप से जब बात एक नाबालिग बच्चे की हो, तो यह और भी संवेदनशील हो जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें निजता का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त कानूनी आधार के डीएनए परीक्षण की अनुमति देना इस अधिकार का उल्लंघन होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान, सामाजिक स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य पर ऐसे परीक्षण का गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, केवल संदेह या आरोप के आधार पर इस प्रकार के निर्देश नहीं दिए जा सकते।
न्यायालय का संतुलन: साक्ष्य बनाम अधिकार
यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी संतुलन को सामने लाता है—एक ओर सच्चाई की खोज और साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता, और दूसरी ओर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा।
अदालत ने माना कि वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब उसके लिए मजबूत कानूनी आधार मौजूद हो। यदि हर मामले में केवल आरोप के आधार पर डीएनए परीक्षण की अनुमति दे दी जाए, तो इससे कानून द्वारा दी गई सुरक्षा कमजोर हो जाएगी।
वैवाहिक विवादों में डीएनए टेस्ट: न्यायालयों का दृष्टिकोण
भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि डीएनए परीक्षण को “रूटीन” (सामान्य प्रक्रिया) नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स ने कई मामलों में कहा है कि डीएनए टेस्ट केवल “exceptional circumstances” (असाधारण परिस्थितियों) में ही कराया जाना चाहिए।
इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसे परीक्षण का प्रभाव केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक भी होता है। खासकर बच्चों के मामले में, यह उनके भविष्य और पहचान को प्रभावित कर सकता है।
अदालत का अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपील को खारिज कर दिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि इस मामले में डीएनए परीक्षण की अनुमति देना न केवल धारा 112 के तहत स्थापित वैधानिक अनुमान को कमजोर करेगा, बल्कि यह नाबालिग बच्चे की गोपनीयता और गरिमा का भी उल्लंघन होगा।
व्यापक प्रभाव: भविष्य के मामलों के लिए दिशा
यह निर्णय भविष्य में आने वाले समान मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में काम करेगा। यह स्पष्ट संदेश देता है कि अदालतें केवल आरोपों के आधार पर डीएनए परीक्षण की अनुमति नहीं देंगी और बच्चों के अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगी।
इसके साथ ही, यह फैसला यह भी दर्शाता है कि भारतीय न्याय प्रणाली तकनीकी प्रगति (जैसे डीएनए परीक्षण) को स्वीकार करते हुए भी मानवीय और संवैधानिक मूल्यों को नजरअंदाज नहीं करती।
निष्कर्ष
नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच से जुड़े इस मामले में हाई कोर्ट का निर्णय कानून, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय केवल साक्ष्य के आधार पर नहीं, बल्कि अधिकारों और गरिमा की रक्षा के साथ किया जाना चाहिए।
यह फैसला उन सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जहां व्यक्तिगत विवादों के बीच बच्चों के अधिकार दांव पर लग जाते हैं। अदालत ने यह दिखाया है कि कानून का अंतिम उद्देश्य केवल विवाद का समाधान नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और मानवीय समाधान सुनिश्चित करना है।