IndianLawNotes.com

हाईटेंशन लाइन से प्रभावित किसानों को पूरा मुआवजा: इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त संदेश

हाईटेंशन लाइन से प्रभावित किसानों को पूरा मुआवजा: इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त संदेश

       देश में बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ जमीन से जुड़े विवाद भी तेजी से बढ़ रहे हैं। बिजली ट्रांसमिशन लाइन, हाईवे और अन्य परियोजनाएं विकास की दृष्टि से आवश्यक हैं, लेकिन इनके कारण किसानों की जमीन और आजीविका पर पड़ने वाला प्रभाव भी उतना ही गंभीर होता है। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि किसानों को उनके वास्तविक नुकसान के अनुरूप मुआवजा मिलना ही चाहिए।

मामला और पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के चार किसानों—भुल्लन सिंह समेत—की कृषि भूमि पर 220 केवी की हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइन और टावर स्थापित किए गए। टावर खड़े होने के साथ-साथ उनके नीचे से गुजरने वाली तारों ने भी जमीन के उपयोग को प्रभावित किया। फसलों की बुवाई, पेड़ों की वृद्धि और कृषि कार्यों में कई प्रकार की बाधाएं उत्पन्न हुईं।

प्रशासन की ओर से टावर के लिए आंशिक मुआवजा दिया गया, लेकिन तारों के नीचे आने वाली जमीन के लिए कोई भुगतान नहीं किया गया। किसानों का कहना था कि इससे उनकी जमीन की कीमत कम हो गई और उपयोगिता भी घट गई।

प्रशासनिक स्तर पर अनदेखी

किसानों ने कई बार अधिकारियों को शिकायतें दीं और लिखित आवेदन भी किए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। फरवरी 2026 में तो पुलिस की मदद से ट्रांसमिशन लाइन चालू भी कर दी गई। इसके बाद 10 मार्च 2026 को किसानों का आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि राज्य सरकार ने 14 जून 2024 की नई गाइडलाइन लागू नहीं की है।

यही वह बिंदु था, जहां से मामला न्यायालय पहुंचा।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि केंद्र सरकार ने 14 जून 2024 को नई गाइडलाइन जारी की है, जिसमें मुआवजे का स्पष्ट प्रावधान है—

टावर बेस क्षेत्र के लिए जमीन के मूल्य का 200% तक मुआवजा
हाईटेंशन तारों के नीचे आने वाली जमीन के लिए 30% मुआवजा

अदालत ने कहा कि जब राज्य सरकार 2015 की पुरानी गाइडलाइन को लागू कर चुकी है, तो नई गाइडलाइन को लागू न करना अनुचित और मनमाना है।

“अधिग्रहण नहीं हुआ” तर्क खारिज

सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ है, इसलिए पूर्ण मुआवजा देने का सवाल नहीं उठता। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

भले ही जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ हो, लेकिन हाईटेंशन लाइन गुजरने के बाद उस जमीन के उपयोग पर स्थायी प्रतिबंध लग जाते हैं। किसान अपनी इच्छा से खेती या निर्माण नहीं कर सकता, जिससे उसकी जमीन की कीमत और उपयोगिता दोनों प्रभावित होती हैं।

इस प्रकार, कोर्ट ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि नुकसान का आधार केवल अधिग्रहण नहीं, बल्कि उपयोग में आई कमी भी है।

चयनात्मक रवैया स्वीकार्य नहीं

अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि सरकार अपनी सुविधा के अनुसार किसी गाइडलाइन को लागू करे और किसी को नजरअंदाज करे—यह समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

यह टिप्पणी प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण है।

आदेश रद्द, नई प्रक्रिया का निर्देश

हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2026 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें किसानों का दावा खारिज किया गया था। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि—

14 जून 2024 की गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा तय किया जाए
चार सप्ताह के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए

किसानों के लिए व्यापक राहत

यह फैसला केवल चार किसानों तक सीमित नहीं है। देशभर में हजारों ऐसे मामले हैं, जहां बिजली लाइनों या अन्य परियोजनाओं के कारण जमीन प्रभावित होती है, लेकिन मुआवजा नहीं दिया जाता या बहुत कम दिया जाता है।

इस निर्णय से यह स्पष्ट संकेत गया है कि—

जमीन के उपयोग में कमी को भी गंभीरता से लिया जाएगा
किसानों को न्याय पाने के लिए अदालत का सहारा मिल सकता है
प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लगेगा

कानूनी महत्व

इस फैसले में कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को दोहराया गया—

प्राकृतिक न्याय
बिना उचित सुनवाई के किसानों के आवेदन को खारिज करना गलत है।

समानता का सिद्धांत
राज्य द्वारा गाइडलाइन को चयनात्मक तरीके से लागू करना संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

उचित मुआवजा
किसी भी व्यक्ति की संपत्ति पर प्रभाव पड़ने पर उसे न्यायसंगत मुआवजा मिलना चाहिए, चाहे वह अधिग्रहण के रूप में हो या अप्रत्यक्ष प्रभाव के रूप में।

गाइडलाइन का अंतर

2015 की गाइडलाइन में मुआवजा सीमित था और तारों के नीचे की जमीन को लेकर स्पष्टता नहीं थी। वहीं 2024 की नई गाइडलाइन अधिक व्यापक है और किसानों के नुकसान को बेहतर तरीके से संबोधित करती है।

भविष्य की दिशा

इस फैसले के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि—

राज्य सरकारें नई गाइडलाइन को लागू करने के लिए कदम उठाएंगी
प्रभावित किसान अपने अधिकारों के लिए जागरूक होंगे
परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पहले से ही मुआवजा तय किया जाएगा

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों की रक्षा का एक मजबूत संदेश है। यह बताता है कि विकास और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

जब किसी परियोजना के कारण किसान की जमीन प्रभावित होती है, तो उसे केवल औपचारिक मुआवजा नहीं, बल्कि वास्तविक नुकसान के अनुसार उचित भुगतान मिलना चाहिए। यह फैसला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।