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मातृत्व का अधिकार बनाम प्रक्रियात्मक बाधाएं: कोमा में पड़े सैनिक की पत्नी को IVF की अनुमति—दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

मातृत्व का अधिकार बनाम प्रक्रियात्मक बाधाएं: कोमा में पड़े सैनिक की पत्नी को IVF की अनुमति—दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

       भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर मानव अधिकारों की व्याख्या करते हुए समाज को नई दिशा दी है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल मामले में ऐसा ही एक ऐतिहासिक निर्णय दिया, जिसने न केवल प्रजनन अधिकार (Reproductive Rights) को मजबूती दी, बल्कि कानून की व्याख्या को मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ने का भी कार्य किया।

यह मामला एक ऐसे सैनिक की पत्नी से जुड़ा था, जिसका पति ड्यूटी के दौरान गंभीर ब्रेन इंजरी के कारण कोमा में चला गया। पत्नी ने अदालत से अनुमति मांगी कि वह अपने पति के शुक्राणुओं को सुरक्षित कर IVF प्रक्रिया के माध्यम से मातृत्व प्राप्त कर सके। अदालत ने इस मांग को स्वीकार करते हुए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और नैतिक प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया।


मामले की पृष्ठभूमि: एक असाधारण परिस्थिति

यह मामला सामान्य कानूनी विवादों से बिल्कुल अलग था। यहां कोई संपत्ति या आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि एक महिला के मातृत्व के अधिकार और एक दंपत्ति के अधूरे सपनों का प्रश्न था।

सैनिक जुलाई 2025 में जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई, जिसके बाद वे कोमा में चले गए और चिकित्सकीय रूप से उनके होश में आने की संभावना लगभग समाप्त मानी गई।

इस बीच, उनकी पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि—

  • वह और उनके पति पहले से ही IVF प्रक्रिया शुरू करने की योजना बना चुके थे
  • पति ने इसके लिए सहमति भी दी थी
  • अब, पति की वर्तमान स्थिति के कारण वह नई लिखित सहमति देने में असमर्थ हैं

ऐसी स्थिति में, क्या पत्नी को मातृत्व के अधिकार से वंचित किया जा सकता है?


मुख्य कानूनी प्रश्न

इस मामले में अदालत के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न थे—

  1. क्या बिना वर्तमान लिखित सहमति के IVF प्रक्रिया की अनुमति दी जा सकती है?
  2. क्या पति की पूर्व सहमति को पर्याप्त माना जा सकता है?
  3. क्या प्रजनन का अधिकार भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है?
  4. क्या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेग्युलेशन) एक्ट, 2021 इस स्थिति में लागू होता है?

अदालत का दृष्टिकोण: मानवीय और संवैधानिक संतुलन

इस मामले की सुनवाई जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने की। उन्होंने न केवल कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण किया, बल्कि इस मामले के मानवीय पहलू को भी गहराई से समझा।


IVF के लिए सहमति: क्या जरूरी है?

आमतौर पर IVF प्रक्रिया के लिए—

  • पति और पत्नी दोनों की लिखित सहमति आवश्यक होती है
  • यह सहमति ART Act, 2021 के तहत अनिवार्य मानी जाती है

लेकिन इस मामले में पति कोमा में थे, जिससे नई सहमति लेना असंभव था।

अदालत का निष्कर्ष

अदालत ने कहा—

“यदि यह स्पष्ट है कि दंपत्ति पहले ही IVF प्रक्रिया के लिए सहमत थे, तो केवल इस आधार पर कि वर्तमान में लिखित सहमति उपलब्ध नहीं है, पत्नी को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।”


प्रजनन का अधिकार: एक मौलिक अधिकार

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि अदालत ने प्रजनन के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया।

अदालत ने कहा—

  • मातृत्व और पितृत्व का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) का हिस्सा है
  • यह अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से भी जुड़ा है

इस प्रकार, अदालत ने स्पष्ट किया कि—

👉 “Reproductive choice is an integral part of the right to life and personal liberty.”


ART Act, 2021 की व्याख्या

अदालत ने असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेग्युलेशन) एक्ट, 2021 की धारा 22 का उल्लेख करते हुए कहा कि—

  • इस कानून का उद्देश्य प्रजनन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करना है
  • लेकिन इसे इस तरह नहीं लागू किया जाना चाहिए कि यह किसी के मौलिक अधिकारों में बाधा बने

लचीली व्याख्या का सिद्धांत

अदालत ने कहा—

“यदि सख्त प्रक्रियात्मक नियमों के कारण कानून का उद्देश्य ही समाप्त हो जाए, तो ऐसे नियमों की व्याख्या लचीले ढंग से की जानी चाहिए।”


भागवत पुराण का संदर्भ: न्यायिक संवेदनशीलता का उदाहरण

इस फैसले में एक अनूठा पहलू यह भी रहा कि अदालत ने भागवत पुराण का उल्लेख किया।

जस्टिस कौरव ने कहा—

“संतान प्राप्ति केवल मानव के प्रयासों पर निर्भर नहीं होती, यह भाग्य का विषय भी है। ऐसे में अदालत को किसी के भाग्य में बाधा नहीं डालनी चाहिए।”

यह टिप्पणी दर्शाती है कि अदालत ने इस मामले को केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा।


केरल हाईकोर्ट के निर्णय का संदर्भ

अदालत ने केरल हाई कोर्ट के एक पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें—

  • ब्रेन-डेड व्यक्ति के “sex cells” निकालने की अनुमति दी गई थी
  • यह माना गया था कि यदि पूर्व सहमति या परिस्थितियां स्पष्ट हों, तो ऐसी अनुमति दी जा सकती है

इस संदर्भ ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को और मजबूती प्रदान की।


पत्नी की सहमति = पति की सहमति?

अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही—

  • यदि परिस्थितियां ऐसी हों कि पति अपनी सहमति देने में असमर्थ हो
  • और यह स्पष्ट हो कि वह पहले सहमत था

तो पत्नी की सहमति को भी पर्याप्त माना जा सकता है।

यह एक प्रगतिशील दृष्टिकोण है, जो पारिवारिक संबंधों की वास्तविकता को स्वीकार करता है।


नैतिक और सामाजिक आयाम

यह मामला केवल कानून तक सीमित नहीं था। इसमें कई नैतिक और सामाजिक प्रश्न भी शामिल थे—

1. क्या बिना वर्तमान सहमति के ऐसा करना उचित है?

अदालत ने माना कि यदि पूर्व सहमति स्पष्ट है, तो यह नैतिक रूप से भी उचित है।

2. बच्चे के अधिकार क्या होंगे?

हालांकि इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा नहीं हुई, लेकिन यह माना गया कि बच्चे का जन्म वैध और संरक्षित होगा।

3. समाज पर प्रभाव

यह निर्णय समाज में IVF और प्रजनन अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ाएगा।


निर्णय का व्यापक प्रभाव

1. प्रजनन अधिकारों को मजबूती

यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रजनन का अधिकार केवल एक व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।

2. कानून की मानवीय व्याख्या

अदालत ने यह दिखाया कि कानून को कठोरता से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए।

3. भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शन

यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।


कानूनी और संवैधानिक विश्लेषण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21—

  • “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” प्रदान करता है
  • न्यायालयों ने समय-समय पर इसकी व्यापक व्याख्या की है

इस मामले में—

  • प्रजनन का अधिकार
  • मातृत्व का अधिकार
  • पारिवारिक जीवन का अधिकार

इन सभी को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शामिल किया गया।


निष्कर्ष: न्याय, संवेदना और अधिकारों का संतुलन

दिल्ली हाई कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि—

  • कानून का उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं है
  • बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाना भी है

अंततः, यह निर्णय एक गहरा संदेश देता है—

👉 “मातृत्व का अधिकार केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक जीवन का हिस्सा है—और इसे परिस्थितियों के कारण छीना नहीं जा सकता।”

यह फैसला न केवल एक महिला को मातृत्व की ओर अग्रसर करता है, बल्कि समाज को यह भी सिखाता है कि कानून और संवेदना साथ-साथ चल सकते हैं।