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अबू सलेम को राहत नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज की

अबू सलेम को राहत नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज की

       मुंबई धमाकों से जुड़े कुख्यात गैंगस्टर Abu Salem को लेकर दायर तत्काल रिहाई की याचिका पर Bombay High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक दोषी 25 वर्ष की वास्तविक (actual) सजा पूरी नहीं करता, तब तक रिहाई का सवाल ही नहीं उठता। इस फैसले ने न केवल इस मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट की है, बल्कि “रिमिशन” (Remission) और “वास्तविक सजा” के बीच अंतर को भी रेखांकित किया है।


मामले की पृष्ठभूमि: प्रत्यर्पण और सजा की शर्तें

अबू सलेम को वर्ष 2005 में Portugal से भारत प्रत्यर्पित (extradite) किया गया था। इस प्रत्यर्पण के दौरान भारत सरकार ने यह आश्वासन दिया था कि:

  • उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा
  • उसे 25 वर्ष से अधिक की सजा नहीं दी जाएगी

बाद में विभिन्न आपराधिक मामलों में उसे दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई।


याचिका में क्या मांग की गई थी?

अबू सलेम की ओर से अधिवक्ता फरहाना शाह ने अदालत में दलील दी कि:

  • Supreme Court of India ने 2022 में स्पष्ट किया था कि प्रत्यर्पण की शर्तों के अनुसार 25 वर्ष से अधिक कारावास नहीं हो सकता
  • सलेम ने 2005 से अब तक की जेल अवधि, अंडरट्रायल समय और रिमिशन (छूट) जोड़कर 25 वर्ष की सजा पूरी कर ली है
  • इसलिए उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए

यह तर्क मुख्यतः इस आधार पर था कि सजा की गणना में केवल वास्तविक कारावास ही नहीं, बल्कि रिमिशन और अंडरट्रायल अवधि भी जोड़ी जानी चाहिए।


सरकार का पक्ष: अभी पूरी नहीं हुई सजा

केंद्र और राज्य सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार की ओर से यह कहा गया कि:

  • मार्च 2025 तक अबू सलेम ने केवल लगभग 19.5 वर्ष की वास्तविक सजा ही पूरी की है
  • रिमिशन को “वास्तविक सजा” में नहीं जोड़ा जा सकता
  • वह कई मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहा है, इसलिए प्रत्येक सजा की गणना अलग-अलग होगी

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • अधिकतम सजा की अवधि नवंबर 2030 तक पूरी होगी
  • राज्य सरकार के अनुसार संभावित रिहाई की तिथि 2046 तक जा सकती है

हाईकोर्ट का निर्णय: याचिका समय से पहले

जस्टिस A. S. Gadkari और जस्टिस Kamal Khata की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट रूप से कहा:

  • अबू सलेम ने अभी 25 वर्ष की वास्तविक सजा पूरी नहीं की है
  • इसलिए उनकी याचिका समय से पहले (premature) दायर की गई है
  • रिहाई का दावा फिलहाल स्वीकार नहीं किया जा सकता

इस आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।


मुख्य कानूनी मुद्दा: “वास्तविक सजा” बनाम “रिमिशन”

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने “actual imprisonment” (वास्तविक कारावास) और “remission” (सजा में छूट) के बीच स्पष्ट अंतर किया।

1. वास्तविक सजा (Actual Sentence)

  • वह समय जो दोषी ने वास्तव में जेल में बिताया है
  • इसमें कोई छूट या कमी शामिल नहीं होती

2. रिमिशन (Remission)

  • अच्छा व्यवहार या अन्य कारणों से सजा में दी गई छूट
  • यह केवल सजा की अवधि को कम कर सकती है, लेकिन “वास्तविक सजा” का हिस्सा नहीं मानी जाती

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण की शर्तों के तहत 25 वर्ष की जो सीमा है, वह वास्तविक सजा पर आधारित है, न कि रिमिशन पर।


प्रत्यर्पण कानून का प्रभाव

यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) और प्रत्यर्पण संधियों (Extradition Treaties) से भी जुड़ा हुआ है।

Portugal ने भारत को अबू सलेम को इस शर्त पर सौंपा था कि:

  • उसे अमानवीय या अत्यधिक सजा नहीं दी जाएगी
  • उसकी सजा एक निश्चित सीमा के भीतर रहेगी

इसलिए भारतीय अदालतों को इन शर्तों का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सजा की गणना में रिमिशन को शामिल किया जाए।


क्या अबू सलेम को भविष्य में राहत मिल सकती है?

हाईकोर्ट का यह फैसला अंतिम नहीं है, बल्कि यह केवल वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करता है। भविष्य में:

  • जब अबू सलेम 25 वर्ष की वास्तविक सजा पूरी कर लेगा
  • तब वह पुनः रिहाई के लिए आवेदन कर सकता है

उस समय अदालत को प्रत्यर्पण की शर्तों और सजा की वास्तविक अवधि के आधार पर निर्णय लेना होगा।


सामाजिक और कानूनी प्रभाव

इस फैसले के कई व्यापक प्रभाव हैं:

1. कानून की स्पष्टता

यह निर्णय सजा की गणना के सिद्धांतों को स्पष्ट करता है।

2. गंभीर अपराधों में सख्ती

यह संदेश देता है कि गंभीर अपराधों में सजा को हल्के में नहीं लिया जाएगा।

3. अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान

भारत अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करता है, लेकिन कानून के दायरे में रहकर।

4. भविष्य के मामलों पर प्रभाव

यह फैसला अन्य प्रत्यर्पण मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।


निष्कर्ष: समय से पहले राहत नहीं

Bombay High Court का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:

“सजा की गणना में केवल वास्तविक कारावास ही मायने रखता है, न कि रिमिशन या अनुमानित अवधि।”

अबू सलेम की याचिका खारिज करके अदालत ने यह संदेश दिया है कि कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया और समय सीमा का पालन अनिवार्य है।

यह फैसला न्यायपालिका की उस सख्त और संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें एक ओर अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान किया जाता है, वहीं दूसरी ओर कानून के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया जाता।

अंततः, यह मामला हमें यह समझाता है कि न्याय केवल अधिकारों का प्रश्न नहीं है, बल्कि जिम्मेदारियों और नियमों का भी पालन है—और जब तक निर्धारित सजा पूरी नहीं होती, तब तक राहत की उम्मीद करना समय से पहले होगा।