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सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गूंज: धर्म, संविधान और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की नई बहस

सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गूंज: धर्म, संविधान और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की नई बहस

       भारत जैसे बहुलतावादी समाज में धर्म और संविधान के बीच संतुलन हमेशा एक जटिल विषय रहा है। हाल ही में Supreme Court of India में चल रही सबरीमाला मंदिर विवाद की सुनवाई ने एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ला दिया है। इस मामले में न केवल महिलाओं के प्रवेश का प्रश्न है, बल्कि यह मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार, संवैधानिक मूल्यों और न्यायपालिका की सीमाओं तक फैला हुआ है।

इस बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं, जिनमें उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक प्रथा की वैधता का निर्धारण अदालत नहीं, बल्कि उस समुदाय की आस्था से होना चाहिए।


सबरीमाला मंदिर विवाद: पृष्ठभूमि

Sabarimala Temple भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है, जो भगवान अयप्पा को समर्पित है। इस मंदिर में परंपरागत रूप से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था, जिसका आधार भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को बताया गया।

इस प्रतिबंध को सबसे पहले Kerala High Court ने 1991 में वैध ठहराया। लेकिन 2018 में Supreme Court of India की 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इस प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया और सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी।

इसके बाद देशभर में व्यापक विरोध हुआ और कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनके आधार पर अब 9-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई हो रही है।


सिंघवी की दलील: “धर्म का निर्धारण अदालत नहीं करेगी”

सुनवाई के दौरान अभिषेक मनु सिंघवी ने जोर देकर कहा कि:

“धर्म किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की आस्था का विषय है। इसलिए यह तय करने का अधिकार उसी समुदाय को होना चाहिए कि उसकी कौन-सी प्रथाएं सही हैं और कौन-सी नहीं।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अदालत यह तय करने लगे कि कौन-सी धार्मिक प्रथा उचित है, तो यह न्यायपालिका का अत्यधिक हस्तक्षेप होगा, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

उनका तर्क था कि किसी एक व्यक्ति के मौलिक अधिकार को पूरे धार्मिक समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।


संवैधानिक नैतिकता पर सवाल

सिंघवी ने “संवैधानिक नैतिकता” (Constitutional Morality) की अवधारणा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह शब्द संविधान के किसी अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से लिखा नहीं है।

उन्होंने B. R. Ambedkar के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए बताया कि “संवैधानिक नैतिकता” का विचार संविधान के निर्माण के दौरान एक व्याख्यात्मक अवधारणा के रूप में सामने आया था, न कि एक बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत के रूप में।

उनके अनुसार, अदालतें यदि इस अवधारणा के आधार पर निर्णय लेने लगें, तो यह न्यायिक सक्रियता (judicial activism) की सीमा को पार कर सकता है।


अनुच्छेद 25 और 26: अधिकारों का टकराव

इस मामले का केंद्र बिंदु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन है:

  • अनुच्छेद 25: प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है
  • अनुच्छेद 26: धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है

सिंघवी ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 26 को जानबूझकर “अन्य प्रावधानों के अधीन” नहीं रखा गया, जबकि अनुच्छेद 25 में यह शब्द स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि संविधान निर्माताओं ने धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों को विशेष महत्व दिया है।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ परिस्थितियों में—विशेषकर सामाजिक सुधार और मंदिर प्रवेश जैसे मामलों में—अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत बनाए गए कानून अनुच्छेद 26 पर प्रभाव डाल सकते हैं।


न्यायाधीशों के प्रश्न: संतुलन कैसे बने?

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए:

  • क्या धार्मिक संप्रदाय केवल व्यक्तियों का समूह नहीं हैं?
  • यदि अनुच्छेद 25 व्यक्तियों पर लागू होता है, तो क्या यह संप्रदायों पर भी लागू नहीं होगा?
  • क्या राज्य सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है?

न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति सुंदरेश ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया कि यदि कोई धार्मिक संस्था “सार्वजनिक स्वरूप” की है, तो क्या उसे सभी के लिए खुला नहीं होना चाहिए?


सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता

इस मामले में एक बड़ा प्रश्न यह है कि सामाजिक सुधार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

सिंघवी ने स्पष्ट किया कि:

  • सामाजिक सुधार आवश्यक है, लेकिन इसके नाम पर धर्म को समाप्त नहीं किया जा सकता
  • यदि कोई कानून धार्मिक प्रथा को पूरी तरह खत्म कर देता है, तो वह असंवैधानिक हो सकता है
  • लेकिन यदि वह केवल प्रवेश या समानता सुनिश्चित करता है, तो वह वैध हो सकता है

यह दृष्टिकोण “हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन” (संतुलित व्याख्या) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को आपस में संतुलित करके पढ़ा जाता है।


Essential Religious Practices (ERP) टेस्ट पर बहस

इस मामले में “Essential Religious Practices” (ERP) टेस्ट भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस टेस्ट के तहत अदालत यह तय करती है कि कौन-सी प्रथाएं किसी धर्म के लिए आवश्यक हैं।

सिंघवी ने इस टेस्ट पर आपत्ति जताते हुए कहा कि:

  • अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी प्रथा “जरूरी” है
  • यह निर्णय धार्मिक समुदाय पर छोड़ देना चाहिए
  • न्यायपालिका को केवल यह देखना चाहिए कि कोई प्रथा कानून के खिलाफ है या नहीं

उन्होंने Shirur Mutt Case का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि धार्मिक प्रथाओं का निर्धारण संबंधित धर्म की मान्यताओं से होना चाहिए।


महत्वपूर्ण केस लॉ और संदर्भ

सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण मामलों का उल्लेख किया गया:

  • Sri Venkataramana Devaru v. State of Mysore
  • T.M.A. Pai Foundation v. State of Karnataka
  • Durgah Committee v. Syed Hussain Ali

इन मामलों के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संबंध क्या है और किस परिस्थिति में कौन-सा प्रावधान प्रभावी होगा।


धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप की सीमा

सिंघवी ने एक महत्वपूर्ण उदाहरण देते हुए कहा कि:

“जैन दिगंबर साधुओं की नग्नता सामान्य समाज को असामान्य लग सकती है, लेकिन यह उनके धर्म का हिस्सा है। इसलिए इसे केवल ‘असभ्य’ कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।”

इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि न्यायालय को धार्मिक विविधता का सम्मान करना चाहिए और केवल व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए।


सरकार का रुख और व्यापक प्रभाव

केंद्र सरकार ने भी इस मामले में यह तर्क दिया कि भारत में कई धार्मिक स्थलों पर लिंग आधारित प्रतिबंध मौजूद हैं—जैसे कुछ मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है—इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

इससे यह प्रश्न और जटिल हो जाता है कि क्या समानता का सिद्धांत हर स्थिति में लागू होना चाहिए, या फिर धार्मिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


निष्कर्ष: एक ऐतिहासिक निर्णय की प्रतीक्षा

सबरीमाला मामला केवल महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों—समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता—के बीच संतुलन का प्रश्न है।

सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय न केवल इस मामले को सुलझाएगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि:

  • न्यायपालिका धार्मिक मामलों में कितनी सीमा तक हस्तक्षेप कर सकती है
  • सामाजिक सुधार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनेगा
  • “संवैधानिक नैतिकता” जैसे सिद्धांतों की भूमिका क्या होगी

अंततः, यह मामला भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है, जहां विभिन्न अधिकारों और मूल्यों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

यह स्पष्ट है कि जो भी निर्णय आएगा, वह भारतीय संवैधानिक कानून के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।