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Allied Healthcare Act लागू न होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त—पांच साल की देरी पर जवाबदेही तय करने की तैयारी

Allied Healthcare Act लागू न होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त—पांच साल की देरी पर जवाबदेही तय करने की तैयारी

      देश में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले पैरामेडिकल और एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के नियमन से जुड़ा महत्वपूर्ण कानून—नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स एक्ट, 2021—एक बार फिर न्यायिक जांच के केंद्र में है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून के लागू न होने पर गंभीर नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारियों को तलब किया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि केवल नियम (regulations) न बनने का बहाना देकर किसी कानून को लागू होने से नहीं रोका जा सकता।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब इस कानून को पारित हुए लगभग पांच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसके तहत आवश्यक नियमावली अब तक तैयार नहीं हो पाई है। इससे देशभर में एलाइड हेल्थकेयर सेक्टर में एक तरह का ‘रेगुलेटरी वैक्यूम’ (नियामक शून्य) पैदा हो गया है।


सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“यह 2021 का कानून है और हम 2026 में हैं। इसे लागू होना ही चाहिए… सिर्फ इसलिए कि नियम नहीं बने हैं, कानून को लागू होने से नहीं रोका जा सकता।”

अदालत ने इस देरी को गंभीर प्रशासनिक विफलता माना और संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि वह जानना चाहता है कि आखिर इतनी लंबी देरी के पीछे कारण क्या हैं।


रेगुलेटरी वैक्यूम: सिस्टम क्यों हुआ ठप?

अदालत ने इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू ‘रेगुलेटरी वैक्यूम’ को बताया। जब केंद्र का यह कानून लागू हुआ, तो कई राज्यों के अपने-अपने कानून अप्रभावी हो गए। लेकिन चूंकि केंद्र सरकार ने अभी तक इसके तहत आवश्यक नियम नहीं बनाए, इसलिए एक अजीब स्थिति पैदा हो गई।

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा:

“एक तरफ आपने राज्य कानूनों को रोक दिया, दूसरी तरफ केंद्र का कानून भी लागू नहीं हो रहा—यह कैसे स्वीकार्य है?”

इस स्थिति के कारण पैरामेडिकल और एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के पंजीकरण, प्रशिक्षण और कार्यप्रणाली को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अनिश्चितता बनी हुई है।


कानून का उद्देश्य और महत्व

नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स एक्ट, 2021 का मुख्य उद्देश्य देश में एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स—जैसे लैब टेक्नीशियन, रेडियोग्राफर, फिजियोथेरेपिस्ट, ऑप्टोमेट्रिस्ट आदि—के लिए एक मानकीकृत नियामक ढांचा तैयार करना था।

इस कानून के तहत एक राष्ट्रीय आयोग (National Commission) और विभिन्न राज्य परिषदों की स्थापना का प्रावधान है, जो इन पेशेवरों के प्रशिक्षण, पंजीकरण और आचार संहिता को नियंत्रित करेंगे। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होना था, बल्कि मरीजों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी थी।

लेकिन नियमों के अभाव में यह पूरा ढांचा अभी तक कागजों तक सीमित है।


अदालत का सख्त रुख: जवाबदेही तय होगी

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केवल चिंता व्यक्त करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि ठोस कार्रवाई की दिशा में कदम उठाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि:

  • संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा
  • उन्हें यह बताना होगा कि कानून के लागू होने में देरी क्यों हो रही है
  • मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल 2026 को होगी

यह कदम इस बात का संकेत है कि अदालत अब इस मुद्दे पर केवल औपचारिक जवाब से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि जिम्मेदारी तय करना चाहती है।


पहले भी दे चुका है निर्देश

यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं। वर्ष 2024 में भी अदालत ने केंद्र सरकार को इस कानून को लागू करने का निर्देश दिया था।

इसके बाद फरवरी 2026 में जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने केंद्र और राज्यों को अवमानना नोटिस जारी किया था, क्योंकि अदालत के पूर्व आदेशों का पालन नहीं किया गया था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार की ओर से लगातार देरी हो रही है, जिसे अब अदालत गंभीरता से ले रही है।


स्वास्थ्य क्षेत्र पर प्रभाव

इस कानून के लागू न होने का सीधा असर देश के स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ रहा है। एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स स्वास्थ्य सेवाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो डॉक्टरों के साथ मिलकर मरीजों की देखभाल करते हैं।

यदि इनके प्रशिक्षण और कार्यप्रणाली के लिए स्पष्ट नियम नहीं होंगे, तो इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, बिना उचित नियमन के अनधिकृत या अपर्याप्त प्रशिक्षित लोग भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं, जो मरीजों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है।


पेशेवरों के अधिकार और भविष्य पर असर

एलाइड हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स लंबे समय से इस कानून के लागू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इससे उन्हें एक स्पष्ट पहचान, मान्यता और करियर सुरक्षा मिलने की उम्मीद थी।

लेकिन लगातार हो रही देरी के कारण उनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। कई पेशेवरों को यह समझ नहीं आ रहा कि उनके पंजीकरण और लाइसेंसिंग की प्रक्रिया क्या होगी, और वे किस नियम के तहत काम करेंगे।


प्रशासनिक ढिलाई या प्रणालीगत समस्या?

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या यह केवल प्रशासनिक ढिलाई का मामला है, या फिर इसमें कोई गहरी प्रणालीगत समस्या है?

कई बार कानून बन जाने के बाद भी उसके क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियम और संस्थागत ढांचा तैयार करने में देरी हो जाती है। लेकिन पांच साल की देरी यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं गंभीर कमी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


न्यायपालिका की सक्रियता

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता यह दर्शाती है कि वह केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है।

यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि इससे सरकारों पर दबाव बनता है कि वे अपने दायित्वों का समय पर निर्वहन करें।


आगे की राह: क्या होगा समाधान?

अब सभी की नजर 9 अप्रैल 2026 की सुनवाई पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी अदालत के सामने क्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हैं और क्या कोई ठोस समयसीमा तय की जाती है।

संभावना है कि अदालत इस मामले में सख्त निर्देश जारी कर सकती है, जिसमें नियम बनाने की समयसीमा निर्धारित की जाए या फिर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी जाए।


निष्कर्ष: कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उसे लागू करना भी जरूरी

नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स एक्ट, 2021 का मामला हमें यह सिखाता है कि केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है। उसका प्रभावी क्रियान्वयन ही उसकी वास्तविक सफलता तय करता है।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो न केवल इस कानून को लागू करने में तेजी ला सकता है, बल्कि भविष्य में भी सरकारों को अधिक जवाबदेह बना सकता है।

अंततः, यह मामला केवल एक कानून का नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, पेशेवरों के अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। यदि इसे सही ढंग से लागू किया जाता है, तो यह भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।