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राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा मवेशियों का खतरा—सुप्रीम कोर्ट में उठी देशव्यापी नीति की मांग

राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा मवेशियों का खतरा—सुप्रीम कोर्ट में उठी देशव्यापी नीति की मांग

      देशभर में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर आवारा मवेशियों की बढ़ती समस्या अब केवल एक स्थानीय प्रशासनिक चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में उभर रही है। लगातार हो रही सड़क दुर्घटनाओं, जान-माल के नुकसान और यातायात व्यवस्था पर पड़ रहे दुष्प्रभाव के बीच इस विषय ने न्यायपालिका का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। इसी क्रम में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

यह मामला केवल सड़कों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पशु कल्याण, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक नीति जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। अदालत का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि अब इस समस्या को एक समग्र और संरचित दृष्टिकोण से हल करने की आवश्यकता है।


याचिका का स्वरूप और मुख्य मांगें

यह याचिका Lawyers for Human Rights International की ओर से दायर की गई है, जिसमें देशभर के राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से आवारा मवेशियों को हटाने और उनके प्रवेश को रोकने के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दे, ताकि राजमार्गों पर मवेशियों की आवाजाही को रोका जा सके। इसके लिए विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बाड़ (fencing) लगाने, पशु आश्रयों की स्थापना और अवैध रूप से मवेशियों को छोड़ने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जैसे उपाय सुझाए गए हैं।

इसके अलावा, याचिका में एक महत्वपूर्ण मांग ‘दोष रहित मुआवजा’ (no-fault compensation) प्रणाली की भी है, जिसके तहत दुर्घटना पीड़ितों को बिना यह साबित किए मुआवजा मिल सके कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कौन था।


सुप्रीम कोर्ट का रुख और नोटिस जारी

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय की बेंच, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल हैं, ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड को नोटिस जारी किया है।

अदालत ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही, मामले की अगली सुनवाई भी चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। यह कदम इस बात का संकेत है कि अदालत इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और एक व्यापक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है।


गौ-उपकर और प्रशासनिक लापरवाही पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिया कि कई राज्य सरकारें 10 प्रतिशत तक ‘गौ-उपकर’ (cow cess) तो वसूल रही हैं, लेकिन उस राशि का उपयोग आवारा मवेशियों की समस्या के समाधान के लिए प्रभावी रूप से नहीं किया जा रहा है।

यह टिप्पणी प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा सवाल खड़ा करती है। यदि सरकारें विशेष रूप से पशु कल्याण के लिए कर वसूल रही हैं, तो उसका उचित उपयोग भी सुनिश्चित होना चाहिए। अदालत की यह चिंता इस बात को रेखांकित करती है कि समस्या केवल संसाधनों की कमी की नहीं, बल्कि उनके सही उपयोग की भी है।


NHAI का पक्ष और पूर्व मामलों का संदर्भ

सुनवाई के दौरान भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही आवारा कुत्तों से जुड़े एक मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख चुका है। उस मामले में भी राजमार्गों पर पशुओं की उपस्थिति और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार किया गया था।

हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने यह स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिका में कुछ अतिरिक्त और विशिष्ट पहलू उठाए गए हैं, जो पिछले मामले से अलग हैं। इसलिए इस पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।


सड़क सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव

राजमार्गों पर आवारा मवेशियों की मौजूदगी सड़क सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। विशेष रूप से रात के समय या खराब मौसम में ये पशु अचानक वाहन के सामने आ जाते हैं, जिससे गंभीर दुर्घटनाएं होती हैं।

भारत में हर साल हजारों सड़क दुर्घटनाएं आवारा पशुओं के कारण होती हैं। इन दुर्घटनाओं में न केवल वाहन चालकों और यात्रियों की जान जाती है, बल्कि पशुओं की भी मृत्यु होती है। यह स्थिति मानव और पशु दोनों के लिए हानिकारक है।


बाड़बंदी (Fencing) और संरचनात्मक समाधान

याचिका में राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर अनिवार्य बाड़ लगाने की मांग एक महत्वपूर्ण सुझाव है। कई विकसित देशों में यह व्यवस्था पहले से लागू है, जहां हाईवे के किनारे मजबूत बाड़ लगाकर पशुओं के प्रवेश को रोका जाता है।

भारत में भी कुछ स्थानों पर यह व्यवस्था की गई है, लेकिन यह अभी तक व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो पाई है। यदि इसे राष्ट्रीय नीति के रूप में अपनाया जाता है, तो यह समस्या काफी हद तक नियंत्रित की जा सकती है।


गोशालाओं और पशु आश्रयों की आवश्यकता

आवारा मवेशियों की समस्या का स्थायी समाधान केवल उन्हें सड़कों से हटाना नहीं, बल्कि उनके लिए उचित आश्रय की व्यवस्था करना भी है। याचिका में वैज्ञानिक तरीके से संचालित गोशालाओं और पशु आश्रयों की स्थापना की मांग की गई है।

इसके लिए पर्याप्त वित्त पोषण और प्रशासनिक निगरानी आवश्यक है। यदि गोशालाएं केवल कागजों पर ही रह जाएं, तो समस्या का समाधान संभव नहीं होगा।


कानूनी और दंडात्मक उपाय

याचिका में यह भी मांग की गई है कि जो लोग अपने मवेशियों को अवैध रूप से सड़कों पर छोड़ देते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। वर्तमान में कई राज्यों में इस संबंध में कानून तो हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता।

यदि इस प्रकार के कृत्यों पर कड़ी सजा दी जाए, तो यह एक निवारक (deterrent) के रूप में काम कर सकता है और लोग अपने मवेशियों की जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य होंगे।


‘दोष रहित मुआवजा’ प्रणाली का महत्व

सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए ‘दोष रहित मुआवजा’ प्रणाली एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। वर्तमान में मुआवजा प्राप्त करने के लिए यह साबित करना पड़ता है कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कौन था, जो अक्सर एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है।

यदि यह प्रणाली लागू होती है, तो पीड़ितों को त्वरित राहत मिल सकेगी और उन्हें न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा।


आवारा कुत्तों के मामले से जुड़ाव

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आवारा कुत्तों के स्थानांतरण और नसबंदी से जुड़े मामले में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। 7 नवंबर 2025 के आदेश में अदालत ने कहा था कि आवारा कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित आश्रयों में स्थानांतरित किया जाए।

यह आदेश इस बात का संकेत है कि अदालत पशु कल्याण और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। वर्तमान याचिका भी उसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा मानी जा सकती है।


प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता

इस समस्या का समाधान केवल एक एजेंसी या विभाग के स्तर पर संभव नहीं है। इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और पशु कल्याण संगठनों के बीच समन्वय आवश्यक है।

यदि सभी संबंधित पक्ष मिलकर एक समग्र रणनीति तैयार करें और उसे प्रभावी ढंग से लागू करें, तो इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।


आगे की दिशा और संभावनाएं

अब सभी की नजर भारत का सर्वोच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी है। अदालत द्वारा मांगे गए जवाबों के आधार पर यह तय होगा कि क्या इस दिशा में कोई ठोस और व्यापक निर्देश जारी किए जाएंगे।

यदि अदालत एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने का आदेश देती है, तो यह देशभर में सड़क सुरक्षा और पशु कल्याण के क्षेत्र में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।


निष्कर्ष: एक समग्र समाधान की आवश्यकता

राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा मवेशियों की समस्या एक बहुआयामी चुनौती है, जिसका समाधान केवल तात्कालिक उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक योजना, पर्याप्त संसाधन और सख्त क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो न केवल सरकारों को जिम्मेदारी का अहसास कराएगा, बल्कि एक सुरक्षित और व्यवस्थित सड़क व्यवस्था की दिशा में भी मार्ग प्रशस्त करेगा।

अंततः, यह केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा और पशुओं के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी विषय है। यदि इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके, तो यह एक आदर्श समाधान होगा, जो समाज के सभी वर्गों के हित में होगा।