परिषदीय स्कूल पेयरिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर, नीति के क्रियान्वयन को मिली मंजूरी
शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों के बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई परिषदीय स्कूलों की पेयरिंग (युग्मन) नीति लंबे समय से विवादों में रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को अंतिम रूप देते हुए छात्रों की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के निर्णय को बरकरार रखा। इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार की संशोधित पेयरिंग नीति के तहत आगे की कार्रवाई बिना किसी बाधा के की जा सकेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों की पेयरिंग प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार ने कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को नजदीकी विद्यालयों के साथ जोड़ने की योजना शुरू की थी, ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके और छात्रों को अधिक सुविधाएं प्रदान की जा सकें।
हालांकि, इस नीति के खिलाफ छात्रों और अभिभावकों ने आपत्ति जताई और हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि इस प्रकार की पेयरिंग से बच्चों की शिक्षा और पहुंच प्रभावित हो सकती है, विशेषकर छोटे बच्चों के लिए दूरी और सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण है।
हाईकोर्ट की कार्यवाही
प्रारंभिक स्तर पर एकल पीठ ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने विशेष अपील के माध्यम से लखनऊ खंडपीठ का रुख किया।
लखनऊ खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 24 जुलाई 2025 को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। इसका अर्थ यह था कि तब तक पेयरिंग प्रक्रिया में कोई नया परिवर्तन या कार्रवाई नहीं की जाएगी, जब तक मामले का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता।
राज्य सरकार की संशोधित नीति
हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपनी नीति में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए। 30 जुलाई 2025 को अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किए गए और इसके बाद 27 अगस्त 2025 को विस्तृत परिपत्र जारी किया गया।
इस परिपत्र में स्पष्ट किया गया कि:
- केवल उन्हीं स्कूलों की पेयरिंग की जाएगी जिनमें छात्रों की संख्या 50 से कम है
- पेयर किए जाने वाले विद्यालयों के बीच दूरी एक किलोमीटर से कम होगी
इसके अतिरिक्त, 13 अक्टूबर 2025 को जारी आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि यह पूरी नीति Right to Education (RTE) Act के मानकों के अनुरूप लागू की जा रही है।
इन संशोधनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पेयरिंग प्रक्रिया बच्चों के हितों के अनुरूप हो और उनकी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
राज्य सरकार द्वारा संशोधित दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने 17 नवंबर 2025 को स्पेशल अपील का निस्तारण कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी भी प्रकार की पेयरिंग इन्हीं दिशा-निर्देशों के अनुसार की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का यह निर्णय इस बात का संकेत था कि अब नीति को लेकर विवाद काफी हद तक समाप्त हो चुका है और प्रशासनिक स्तर पर इसके क्रियान्वयन में कोई कानूनी बाधा नहीं रह गई है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) दायर की। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि पेयरिंग प्रक्रिया अभी भी बच्चों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है और इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।
उनका मुख्य तर्क यह था कि छोटे बच्चों के लिए स्कूल की दूरी, सुरक्षा और शिक्षा की निरंतरता जैसे मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें नीति बनाते समय पूरी तरह ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। इस निर्णय के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि हाईकोर्ट का आदेश अब अंतिम रूप से लागू रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस बात को दर्शाता है कि जब किसी मामले में हाईकोर्ट ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संतुलित निर्णय दिया हो और नीति में आवश्यक सुधार किए गए हों, तो सर्वोच्च न्यायालय सामान्यतः उसमें हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कोई गंभीर कानूनी त्रुटि न हो।
पेयरिंग नीति का उद्देश्य और प्रभाव
परिषदीय स्कूलों की पेयरिंग नीति का मुख्य उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और संसाधन-संपन्न बनाना है। कई छोटे स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने के कारण शिक्षकों और अन्य संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।
पेयरिंग के माध्यम से:
- संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है
- शिक्षकों की उपलब्धता में सुधार आता है
- छात्रों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलता है
हालांकि, इस प्रक्रिया में दूरी, परिवहन और सुरक्षा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना भी आवश्यक है, ताकि छात्रों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
अभिभावकों और छात्रों की चिंताएं
इस नीति के खिलाफ उठी आपत्तियों का मुख्य आधार यह था कि छोटे बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ सकता है, जिससे उनकी पढ़ाई और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन की सुविधा सीमित होती है, जिससे यह चिंता और बढ़ जाती है।
इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने नीति में संशोधन किया और दूरी तथा छात्र संख्या की स्पष्ट सीमा निर्धारित की।
न्यायिक दृष्टिकोण और संतुलन
इस पूरे मामले में न्यायपालिका ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। हाईकोर्ट ने जहां नीति की समीक्षा की और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम स्तर पर यह सुनिश्चित किया कि अब इस नीति को लागू करने में कोई कानूनी बाधा न रहे।
यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि अदालतें नीति निर्माण में सीधे हस्तक्षेप नहीं करतीं, बल्कि यह देखती हैं कि नीति संविधान और कानून के दायरे में हो और जनहित को प्रभावित न करे।
निष्कर्ष
परिषदीय स्कूल पेयरिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार की संशोधित नीति को अंतिम मंजूरी देने जैसा है। अब 50 से कम छात्र संख्या और एक किलोमीटर से कम दूरी वाले स्कूलों की पेयरिंग बिना किसी कानूनी अड़चन के की जा सकेगी।
यह निर्णय न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों के बेहतर उपयोग और नीति के प्रभावी क्रियान्वयन का मार्ग भी प्रशस्त करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायिक हस्तक्षेप तभी होता है जब किसी नीति में गंभीर कानूनी या संवैधानिक खामी हो, अन्यथा नीति निर्माण और उसका क्रियान्वयन सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।