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सुप्रीम कोर्ट का अहम हस्तक्षेप: राजस्थान SI भर्ती परीक्षा में राहत सीमित, सिर्फ एक याचिकाकर्ता तक रखा दायरा

सुप्रीम कोर्ट का अहम हस्तक्षेप: राजस्थान SI भर्ती परीक्षा में राहत सीमित, सिर्फ एक याचिकाकर्ता तक रखा दायरा

     राजस्थान में सब-इंस्पेक्टर (SI) और प्लाटून कमांडर भर्ती परीक्षा को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने अपने ही एक दिन पुराने आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए राहत के दायरे को सीमित कर दिया। यह फैसला न केवल संबंधित याचिकाकर्ता के लिए, बल्कि लाखों अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।


क्या था सुप्रीम कोर्ट का प्रारंभिक आदेश?

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए यह अनुमति दी थी कि याचिकाकर्ता और उसके जैसे अन्य उम्मीदवार 5 अप्रैल 2026 को होने वाली राजस्थान SI/प्लाटून कमांडर भर्ती परीक्षा में बैठ सकते हैं। यह आदेश उन उम्मीदवारों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा था, जो आयु सीमा या अन्य विवादों के कारण परीक्षा से बाहर हो रहे थे।

लेकिन अगले ही दिन, यानी गुड फ्राइडे (शुक्रवार) को कोर्ट ने विशेष सुनवाई करते हुए अपने इस आदेश में बदलाव कर दिया।


आदेश में क्या बदलाव हुआ?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने संशोधित आदेश में स्पष्ट किया कि—

  • गुरुवार के आदेश के पैरा 5 और 6 को हटा दिया गया है
  • पैरा 7 में संशोधन करते हुए यह जोड़ा गया कि राहत केवल मौजूदा याचिकाकर्ता सूरज मल मीणा तक ही सीमित रहेगी
  • अन्य समान स्थिति वाले उम्मीदवार इस आदेश का लाभ नहीं उठा सकेंगे

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संशोधन इसलिए आवश्यक था क्योंकि राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच में संबंधित अपीलें अभी लंबित हैं और उन पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।


पूरा विवाद क्या है?

इस पूरे मामले की शुरुआत वर्ष 2021 की भर्ती अधिसूचना से हुई थी। याचिकाकर्ता सूरज मल मीणा ने उसी अधिसूचना के तहत SI भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया था।

  • लिखित परीक्षा आयोजित हुई
  • 2023 में परिणाम घोषित हुए
  • लेकिन बाद में पेपर लीक के आरोप सामने आए

इसी आधार पर भर्ती प्रक्रिया को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।


पेपर लीक और भर्ती रद्द करने की सिफारिश

मामले के लंबित रहने के दौरान राज्य सरकार की कैबिनेट समिति ने 2021 की भर्ती परीक्षा को रद्द करने की सिफारिश की। इसके बाद 28 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने का आदेश दिया।

अदालत ने पाया कि संगठित गिरोह परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक करने में शामिल थे, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।


खंडपीठ और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

सिंगल जज के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की। खंडपीठ ने 8 सितंबर 2025 को सिंगल जज के आदेश पर रोक लगा दी।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां—

  • सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के अंतरिम आदेश पर रोक लगाई
  • हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर अपीलों का निपटारा किया जाए
  • साथ ही “Status Quo” बनाए रखने को कहा

नई भर्ती अधिसूचना और आयु सीमा विवाद

17 जुलाई 2025 को राज्य सरकार ने नई भर्ती अधिसूचना जारी की, जिसमें—

  • नए पदों की घोषणा की गई
  • 2021 के उम्मीदवारों के लिए आयु में छूट का प्रावधान बताया गया

हालांकि, कई उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें वास्तव में आयु में छूट नहीं दी गई, जिसके कारण वे नई परीक्षा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं।


हाईकोर्ट के आदेश और नई याचिकाएं

इस विवाद के बीच कुछ याचिकाकर्ताओं ने आयु में छूट की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।

  • 30 अक्टूबर 2025: सिंगल जज ने उन्हें अस्थायी रूप से परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी
  • 13 नवंबर 2025: खंडपीठ ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी

यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 9 जनवरी 2026 को अदालत ने हाईकोर्ट को 31 मार्च 2026 तक फैसला सुनाने का निर्देश दिया।


सुप्रीम कोर्ट में हालिया बहस

मौजूदा याचिका में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि—

  • हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है
  • आदेश सुरक्षित रखा गया है
  • लेकिन अभी तक फैसला नहीं सुनाया गया

इस बीच, परीक्षा की तारीख नजदीक आने के कारण उन्होंने तत्काल राहत की मांग की।


राज्य पक्ष की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट ने कोर्ट को बताया कि—

  • पहले से ही 7.71 लाख उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हो रहे हैं
  • 41 शहरों और 1174 केंद्रों पर परीक्षा आयोजित की जा रही है
  • लगभग 71,000 पदों की आवश्यकता है

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है, जैसे—

  • 713 उम्मीदवारों को पहले ही परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जा चुकी है
  • उन्हें एडमिट कार्ड भी जारी हो चुके हैं

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने यह स्पष्ट किया कि—

“कोई भी व्यक्ति दूसरों की ओर से अदालत में नहीं आ सकता।”

अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से यह भी पूछा कि उन्होंने पहले क्यों यह तर्क दिया कि समान स्थिति वाले अन्य उम्मीदवारों को भी राहत मिलनी चाहिए।

यह टिप्पणी इस बात को दर्शाती है कि अदालत व्यक्तिगत याचिकाओं में सामूहिक राहत देने के प्रति सावधानी बरतती है।


संशोधित आदेश का महत्व

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश में किया गया संशोधन कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है—

  1. व्यक्तिगत राहत का सिद्धांत – अदालत ने स्पष्ट किया कि राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित रहेगी
  2. न्यायिक संतुलन – लंबित अपीलों को देखते हुए व्यापक आदेश देने से बचा गया
  3. प्रक्रियात्मक अनुशासन – अन्य उम्मीदवारों को उचित मंच (हाईकोर्ट) का रुख करने का विकल्प दिया गया

आगे का रास्ता

अदालत ने यह भी कहा कि—

  • यदि कोई अन्य उम्मीदवार राहत चाहता है, तो वह उचित अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है
  • यदि हाईकोर्ट की खंडपीठ RPSC को परीक्षा जारी रखने का निर्देश देती है, तो उसी के अनुसार कार्रवाई होगी

इसका मतलब है कि अंतिम समाधान अभी भी राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय पर निर्भर करेगा।


निष्कर्ष

अंततः, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायपालिका संवेदनशील मामलों में अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है। जहां एक ओर व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा की जाती है, वहीं दूसरी ओर व्यापक प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया को भी ध्यान में रखा जाता है।

राजस्थान SI भर्ती विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निश्चित रूप से आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो इस पूरे विवाद का स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है।