सरफेसी कानून की अनदेखी पर हाई कोर्ट सख्त: प्रशासनिक लापरवाही पर पंजाब-हरियाणा सरकार को जुर्माना, दो माह में कब्जा दिलाने का आदेश
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में ऋण वसूली की प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से बनाए गए SARFAESI Act, 2002 (सरफेसी अधिनियम) को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका को सख्त रुख अपनाना पड़ा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस कानून के क्रियान्वयन में हो रही देरी और प्रशासनिक निष्क्रियता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए हरियाणा और पंजाब सरकार पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। यह निर्णय न केवल संबंधित मामले में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों की अनिवार्यता को भी रेखांकित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि: बैंक की याचिका और प्रशासनिक उदासीनता
यह मामला IIFL Home Finance Limited द्वारा दायर याचिका से जुड़ा हुआ है। याचिका में बैंक ने आरोप लगाया कि उसने एक उधारकर्ता के खिलाफ सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू की थी, क्योंकि उधारकर्ता ने ऋण का भुगतान नहीं किया था। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, बैंक ने सुरक्षित संपत्ति का कब्जा लेने के लिए जिला मजिस्ट्रेट से सहायता मांगी।
जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 23 जून 2025 को आदेश पारित किया गया था, जिसमें बैंक को संपत्ति का कब्जा दिलाने का निर्देश दिया गया था। लेकिन इस आदेश के पारित होने के बावजूद करीब 9 महीने तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस प्रकार की निष्क्रियता ने बैंक को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए विवश कर दिया।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी: कानून का उद्देश्य हो रहा विफल
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति Suvrir Sehgal और न्यायमूर्ति Deepak Manchanda की खंडपीठ ने प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस प्रकार की देरी सरफेसी एक्ट के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है।
अदालत ने यह भी कहा कि जब कानून बैंकों को समयबद्ध राहत देने के लिए बनाया गया है, तो प्रशासन का यह कर्तव्य है कि वह बिना किसी देरी के आदेशों का पालन सुनिश्चित करे। यदि जिला प्रशासन ही आदेशों के पालन में ढिलाई बरतेगा, तो पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका पर स्पष्टता
हाई कोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णयों और दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सरफेसी एक्ट के तहत जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका केवल प्रशासनिक होती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि बैंक को संपत्ति का कब्जा समय पर दिलाया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला मजिस्ट्रेट को आदेश पारित करने के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन की निगरानी भी करनी चाहिए। केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है; उसका प्रभावी पालन कराना भी उतना ही आवश्यक है।
देरी को अवमानना के रूप में देखा जाएगा
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश नहीं दिया गया है और इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
यह टिप्पणी प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे न्यायालय के आदेशों को हल्के में न लें। आदेशों के पालन में देरी करना या फाइलों को अनावश्यक रूप से लंबित रखना अब स्वीकार्य नहीं होगा।
दो माह में कब्जा दिलाने का निर्देश
हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे दो माह के भीतर सुरक्षित संपत्ति का भौतिक कब्जा बैंक को दिलाएं। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि यदि इस अवधि के भीतर आदेश का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
जुर्माना और सामाजिक जिम्मेदारी
अदालत ने हरियाणा और पंजाब सरकार पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि एक माह के भीतर चंडीगढ़ स्थित सेक्टर-26 के “इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड” में जमा कराई जाए। यह निर्णय न केवल दंडात्मक है, बल्कि इसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का भी तत्व शामिल है।
बार-बार याचिकाएं: प्रणालीगत विफलता का संकेत
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार के मामलों में लगातार याचिकाएं दाखिल होना इस बात का संकेत है कि राज्य सरकारें न्यायालय के निर्देशों का पालन करने में विफल रही हैं। यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने दोनों राज्यों को निर्देश दिया कि वे अपने अधिकारियों को जवाबदेह बनाएं और यह सुनिश्चित करें कि सरफेसी एक्ट के प्रावधानों का सख्ती से पालन हो।
सरफेसी एक्ट का महत्व और वर्तमान चुनौतियां
SARFAESI Act, 2002 का उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों को बिना अदालत की लंबी प्रक्रिया में पड़े, अपने बकाया ऋण की वसूली करने का अधिकार देना है। इस कानून के तहत बैंक संपत्ति को जब्त कर उसे बेच सकते हैं और अपने ऋण की भरपाई कर सकते हैं।
लेकिन इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि कानून के प्रावधानों के बावजूद यदि प्रशासनिक सहयोग नहीं मिलता, तो बैंकिंग व्यवस्था प्रभावित होती है। इससे न केवल बैंकों की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ता है, बल्कि यह पूरे आर्थिक तंत्र को भी प्रभावित करता है।
न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका
इस मामले में हाई कोर्ट का सख्त रुख यह दर्शाता है कि न्यायपालिका कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर गंभीर है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक उदासीनता को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
यह निर्णय अन्य मामलों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, जहां प्रशासनिक लापरवाही के कारण न्याय में देरी हो रही है।
निष्कर्ष: जवाबदेही और समयबद्ध न्याय की आवश्यकता
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का यह निर्णय प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायिक आदेशों की अनिवार्यता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल संबंधित मामले में न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि यह एक व्यापक संदेश भी देता है कि कानून का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य दायित्व है।
सरफेसी एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानून तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब प्रशासन, न्यायपालिका और वित्तीय संस्थान मिलकर काम करें। इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी एक पक्ष की भूमिका कमजोर होती है, तो पूरा तंत्र प्रभावित होता है।
अंततः, यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि न्यायालय केवल कानून की व्याख्या ही नहीं करता, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करता है। और जब बात सार्वजनिक हित और आर्थिक स्थिरता की हो, तो न्यायपालिका किसी भी प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगी।