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ट्रांसजेंडर अधिकारों पर नया विवाद: 2026 संशोधन विधेयक और ‘स्व-पहचान’ की संवैधानिक बहस

ट्रांसजेंडर अधिकारों पर नया विवाद: 2026 संशोधन विधेयक और ‘स्व-पहचान’ की संवैधानिक बहस

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है। संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने जहां एक ओर कुछ कठोर दंडात्मक प्रावधानों को शामिल किया है, वहीं दूसरी ओर “स्वयं-निर्धारित जेंडर पहचान” (Self-Identification) के अधिकार को सीमित करने के कारण गंभीर विवाद खड़ा कर दिया है।

राज्यसभा द्वारा इस विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया, जबकि लोकसभा पहले ही इसे मंजूरी दे चुकी थी। इस दौरान Tiruchi Siva द्वारा इसे प्रवर समिति के पास भेजने का प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सरकार इस विधेयक को शीघ्र लागू करना चाहती थी।


पृष्ठभूमि: 2019 का कानून और ‘स्व-पहचान’ का सिद्धांत

2019 के मूल अधिनियम—ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019—को भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

इस कानून में “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा व्यापक थी, जिसमें वे सभी लोग शामिल थे जिनकी लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती। इसमें ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स व्यक्ति, जेंडरक्वीर तथा किन्नर, हिजड़ा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें शामिल थीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि 2020 के नियमों के तहत किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान घोषित करने के लिए स्व-घोषणा (Self-Declaration) ही पर्याप्त थी—कोई मेडिकल जांच अनिवार्य नहीं थी। यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA v. Union of India फैसले की भावना के अनुरूप था, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “तीसरे लिंग” के रूप में मान्यता देते हुए स्व-पहचान को मौलिक अधिकार माना गया था।


2026 संशोधन: परिभाषा में बड़ा बदलाव

2026 के संशोधन ने “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को काफी सीमित कर दिया है। अब इसमें मुख्यतः निम्नलिखित वर्गों को शामिल किया गया है:

  • किन्नर, हिजड़ा, अरवानी, जोगता जैसी पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें
  • इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति
  • वे व्यक्ति जिन्हें बल, धोखे या अनुचित प्रभाव से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया हो

सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि संशोधन स्पष्ट रूप से कहता है कि “स्वयं-अनुभूत जेंडर पहचान” (Self-Perceived Gender Identity) वाले व्यक्तियों को इस परिभाषा से बाहर रखा जाएगा।

यही वह बिंदु है जिसने इस विधेयक को सबसे अधिक आलोचना के केंद्र में ला दिया है, क्योंकि यह सीधे-सीधे स्व-पहचान के अधिकार को सीमित करता है।


पहचान की प्रक्रिया में बदलाव: मेडिकल बोर्ड की भूमिका

2019 के कानून में जहां व्यक्ति केवल एक शपथ-पत्र के आधार पर अपनी पहचान दर्ज करा सकता था, वहीं 2026 संशोधन के बाद यह प्रक्रिया काफी जटिल हो गई है।

अब:

  • पहचान प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले मेडिकल बोर्ड की सिफारिश अनिवार्य होगी
  • यह बोर्ड मुख्य चिकित्सा अधिकारी या डिप्टी CMO की अध्यक्षता में गठित होगा
  • जिला मजिस्ट्रेट (DM) को इस सिफारिश की जांच करनी होगी
  • DM अतिरिक्त मेडिकल विशेषज्ञों की राय भी ले सकता है

इस बदलाव का अर्थ यह है कि अब जेंडर पहचान एक व्यक्तिगत अधिकार न रहकर एक प्रशासनिक और चिकित्सकीय सत्यापन का विषय बन गया है।


धारा 7 में संशोधन: सर्जरी के बाद अनिवार्य सूचना

संशोधित धारा 7 के तहत:

  • यदि कोई व्यक्ति जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी करवाता है, तो उसे DM को आवेदन देना होगा
  • संबंधित मेडिकल संस्थान को भी इसकी सूचना प्रशासन को देनी होगी

यह प्रावधान गोपनीयता (Privacy) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रश्न खड़े करता है, क्योंकि इसमें राज्य को व्यक्ति की निजी चिकित्सा जानकारी तक सीधा पहुंच मिलती है।


धारा 18: कठोर दंडात्मक प्रावधान

संशोधन में धारा 18 को भी कड़ा किया गया है। अब:

  • यदि किसी वयस्क को जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है → कम से कम 10 वर्ष की सजा + 2 लाख जुर्माना
  • यदि यह अपराध किसी बच्चे के खिलाफ किया जाता है → आजीवन कारावास + 5 लाख जुर्माना

ये प्रावधान पहली नजर में सुरक्षात्मक लगते हैं, लेकिन “अनुचित प्रभाव” (Undue Influence) जैसे अस्पष्ट शब्दों के कारण इनके दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है।


संसद में उठे सवाल: विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया

इस विधेयक को लेकर संसद में कई विपक्षी सांसदों ने गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं।

Renuka Chowdhury का सवाल

उन्होंने पूछा कि राज्य को यह अधिकार क्यों दिया जा रहा है कि वह किसी व्यक्ति की पहचान तय करे, जबकि सभी नागरिकों के समान संवैधानिक अधिकार हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय से कोई वास्तविक परामर्श नहीं किया।

Saket Gokhale की आलोचना

उन्होंने इस विधेयक को “औपनिवेशिक मानसिकता” वाला कानून बताते हुए कहा कि सरकार उन लोगों की बात नहीं सुनती, जिन पर इसका सीधा असर पड़ता है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रभावों—विशेष रूप से Donald Trump—का हवाला देते हुए सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाया।

Manoj Kumar Jha का दृष्टिकोण

उन्होंने दार्शनिक Michel Foucault और लेखक George Orwell का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून “अधिकार-आधारित दृष्टिकोण” से हटकर नियंत्रणवादी सोच को बढ़ावा देता है।

Priyanka Chaturvedi की चिंता

उन्होंने कहा कि लाखों ट्रांसजेंडर लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला यह कानून बिना पर्याप्त परामर्श के लाया गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि बड़ी संख्या में पहचान आवेदन खारिज किए गए, जिनके कारण सार्वजनिक नहीं किए गए—जो पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।


संवैधानिक प्रश्न: क्या यह NALSA फैसले के खिलाफ है?

इस संशोधन का सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न यह है कि क्या यह NALSA v. Union of India के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है?

NALSA फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि:

  • जेंडर पहचान एक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है
  • इसे बाहरी जांच या चिकित्सा प्रमाण पर निर्भर नहीं किया जा सकता

2026 संशोधन इन सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है, क्योंकि यह:

  • स्व-पहचान को हटाता है
  • मेडिकल सत्यापन को अनिवार्य बनाता है

यह संभावना है कि भविष्य में इस कानून को संवैधानिक चुनौती का सामना करना पड़े।


सामाजिक प्रभाव: अधिकार बनाम नियंत्रण

यह विधेयक एक बड़े सामाजिक प्रश्न को सामने लाता है—क्या राज्य को किसी व्यक्ति की पहचान तय करने का अधिकार होना चाहिए?

ट्रांसजेंडर समुदाय पहले से ही सामाजिक भेदभाव, आर्थिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, इस समुदाय में आत्महत्या के प्रयासों की दर काफी अधिक है।

ऐसे में पहचान की प्रक्रिया को और कठिन बनाना उनकी स्थिति को और जटिल कर सकता है।


निष्कर्ष: संतुलन की चुनौती

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 एक जटिल और बहुआयामी कानून है।

जहां एक ओर यह जबरन लिंग परिवर्तन जैसे अपराधों के खिलाफ कठोर सजा का प्रावधान करता है, वहीं दूसरी ओर यह स्व-पहचान के अधिकार को सीमित करके एक गंभीर संवैधानिक और नैतिक बहस को जन्म देता है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि:

  • न्यायपालिका इस पर क्या रुख अपनाती है
  • क्या यह कानून संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है
  • और सबसे अहम—क्या यह वास्तव में ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को बेहतर बनाता है या उन्हें और हाशिए पर धकेलता है

भारत जैसे लोकतांत्रिक समाज में कानून का उद्देश्य केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि सम्मान, गरिमा और समानता सुनिश्चित करना होना चाहिए। यही इस बहस का मूल सार है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।