IBC में बड़ा फैसला: ‘मोरेटोरियम के बाद सिक्योरिटी डिपॉज़िट से बकाया समायोजन अवैध’, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कानून
दिवालियापन कानून (IBC) की व्याख्या करते हुए Supreme Court of India ने एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि मोरेटोरियम लागू होने के बाद लेनदार (Creditor) कॉर्पोरेट देनदार की जमा राशि (Security Deposit) से CIRP से पहले के बकाया (Pre-CIRP Dues) का समायोजन (Set-Off) नहीं कर सकता।
जस्टिस Sanjay Kumar और जस्टिस K. Vinod Chandran की खंडपीठ ने कहा कि जब तक जमा राशि को कानूनी रूप से समायोजित नहीं किया जाता, तब तक वह कॉर्पोरेट देनदार की संपत्ति बनी रहती है, और मोरेटोरियम के बाद किया गया कोई भी एकतरफा समायोजन कानूनन अस्वीकार्य होगा।
मामले की पृष्ठभूमि: CTUIL बनाम KMPCL
यह मामला Central Transmission Utility of India Limited (CTUIL) और KSK Mahanadi Power Company Limited (KMPCL) के बीच हुए ट्रांसमिशन समझौते से जुड़ा है।
मुख्य तथ्य:
- KMPCL एक बिजली उत्पादन कंपनी है, जो दिवालियापन प्रक्रिया (CIRP) से गुजर रही है
- कंपनी ने ट्रांसमिशन शुल्क के भुगतान की सुरक्षा के लिए
108.44 करोड़ रुपये नकद जमा (Security Deposit) किए थे
विवाद कैसे उत्पन्न हुआ?
जब KMPCL भुगतान में चूक (Default) कर गई, तो:
- 3 अक्टूबर 2019 को उसके खिलाफ CIRP शुरू हुआ
- Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 14 के तहत मोरेटोरियम लागू हो गया
इसके बावजूद:
- मार्च 2020 में CTUIL ने पूरी जमा राशि को अपने पास समायोजित (Appropriate) कर लिया
राशि का बंटवारा:
- 23.31 करोड़ रुपये — CIRP के बाद के बकाया (Post-CIRP Dues)
- 85.13 करोड़ रुपये — CIRP से पहले के बकाया (Pre-CIRP Dues)
यही समायोजन विवाद का मुख्य कारण बना।
रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल की चुनौती
इस समायोजन को Resolution Professional (RP) ने चुनौती दी और कहा:
- यह IBC की प्रक्रिया के खिलाफ है
- सभी दावों का निपटारा RP के माध्यम से ही होना चाहिए
NCLT और NCLAT का फैसला
National Company Law Tribunal और National Company Law Appellate Tribunal दोनों ने:
- CTUIL के समायोजन को अवैध करार दिया
- कहा कि:
- सिक्योरिटी डिपॉज़िट कॉर्पोरेट देनदार की संपत्ति है
- Pre-CIRP दावों का निपटारा IBC प्रक्रिया के तहत ही होगा
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: स्पष्ट और सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के फैसले को बरकरार रखते हुए CTUIL की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस K. Vinod Chandran ने अपने फैसले में कहा:
“भले ही जमा राशि को गारंटी माना जाए, फिर भी वह तब तक कॉर्पोरेट देनदार की संपत्ति बनी रहती है, जब तक उसे विधिवत समायोजित न किया जाए।”
कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
1. मोरेटोरियम के बाद Set-Off नहीं
- CIRP शुरू होने के बाद
- Pre-CIRP बकाया का समायोजन नहीं किया जा सकता
2. सिक्योरिटी डिपॉज़िट की स्थिति
- जब तक समायोजन कानूनी रूप से न हो
- यह कॉर्पोरेट देनदार की संपत्ति ही मानी जाएगी
3. RP की भूमिका अनिवार्य
- सभी दावों को
Resolution Professional के पास जमा करना होगा - वही दावों की जांच और स्वीकृति करेगा
CTUIL की गलती: एकतरफा कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:
- CTUIL ने पहले ही अपने दावे RP के सामने पेश कर दिए थे
- कुछ दावे स्वीकार भी हो चुके थे
इसके बावजूद:
- उसने एकतरफा तरीके से जमा राशि अपने पास रख ली
कोर्ट ने इसे:
- IBC के प्रावधानों का उल्लंघन
- और मोरेटोरियम का अनादर बताया
मोरेटोरियम का महत्व
Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 14 के तहत:
- CIRP शुरू होते ही मोरेटोरियम लागू होता है
इसका उद्देश्य:
- सभी लेनदारों को समान अवसर देना
- कंपनी की संपत्ति को सुरक्षित रखना
- एक निष्पक्ष समाधान प्रक्रिया सुनिश्चित करना
कानूनी प्रभाव: लेनदारों के लिए संदेश
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि:
- लेनदार अपने अधिकारों का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं कर सकते
- उन्हें IBC की प्रक्रिया का पालन करना होगा
मुख्य संदेश:
- कोई भी एकतरफा समायोजन स्वीकार नहीं होगा
- सभी दावे RP के माध्यम से ही तय होंगे
कॉर्पोरेट देनदार के लिए राहत
यह फैसला कॉर्पोरेट देनदारों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- उनकी संपत्ति को मनमाने तरीके से जब्त नहीं किया जा सकता
- उन्हें एक संरक्षित और निष्पक्ष प्रक्रिया मिलती है
निष्कर्ष: IBC की प्रक्रिया सर्वोपरि
Supreme Court of India के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि:
- IBC की प्रक्रिया सर्वोपरि है
- मोरेटोरियम का उल्लंघन किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है
जस्टिस Sanjay Kumar और जस्टिस K. Vinod Chandran की पीठ ने यह सुनिश्चित किया कि:
- दिवालियापन प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे
- और सभी पक्षों के हितों का संतुलन कायम रखा जाए
यह फैसला भविष्य में IBC से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा, खासकर उन स्थितियों में जहां लेनदार सिक्योरिटी डिपॉज़िट या अन्य संपत्तियों के माध्यम से अपने दावों की वसूली करना चाहते हैं।