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दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त संदेश: ‘वेंडिंग का अधिकार है, लेकिन सफाई और सार्वजनिक रास्तों पर कब्जा नहीं’

दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त संदेश: ‘वेंडिंग का अधिकार है, लेकिन सफाई और सार्वजनिक रास्तों पर कब्जा नहीं’

राजधानी में सड़क किनारे व्यवसाय करने वाले वेंडर्स (फेरीवालों) के अधिकार और जिम्मेदारियों को लेकर Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण और संतुलित निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि वेंडिंग (सड़क पर सामान बेचने) का अधिकार भले ही कानून द्वारा संरक्षित हो, लेकिन इसके साथ साफ-सफाई बनाए रखना और सार्वजनिक रास्तों को बाधित न करना एक “अनिवार्य जिम्मेदारी” है।

यह फैसला शहरी जीवन के एक अहम मुद्दे—फुटपाथों पर अतिक्रमण और स्वच्छता—पर एक स्पष्ट न्यायिक दिशा प्रदान करता है।


मामले की पृष्ठभूमि: मालवीय नगर का वेंडर विवाद

यह मामला दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित B-42 बस स्टैंड के पास सामान बेचने वाले एक वेंडर रजनीश सिंह की याचिका से जुड़ा है। रजनीश सिंह, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं, ने आरोप लगाया कि नगर निगम के अधिकारी उन्हें उनके वैध व्यवसाय से रोक रहे हैं।

उन्होंने अदालत को बताया कि:

  • वह वर्ष 2014 से पहले से ही उस स्थान पर वेंडिंग कर रहे हैं
  • उनके पास वैध ‘सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग’ है
  • इसके बावजूद Municipal Corporation of Delhi (MCD) के अधिकारी उन्हें परेशान कर रहे हैं

रजनीश सिंह ने अदालत से अपने व्यवसाय को सुरक्षित रखने की गुहार लगाई।


सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग: कानूनी सुरक्षा का आधार

इस मामले में ‘सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग’ एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर उभरा। यह प्रमाणपत्र स्ट्रीट वेंडर्स को कानूनी रूप से निर्धारित स्थान पर व्यापार करने का अधिकार देता है।

भारत में स्ट्रीट वेंडर्स के अधिकारों को Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014 के तहत मान्यता दी गई है। इस कानून का उद्देश्य है:

  • वेंडर्स के आजीविका के अधिकार की रक्षा करना
  • साथ ही सार्वजनिक स्थानों के उचित उपयोग को सुनिश्चित करना

यानी कानून खुद ही “अधिकार” और “नियमन” के बीच संतुलन की बात करता है।


एमसीडी का पक्ष: सफाई और अतिक्रमण का मुद्दा

MCD ने अदालत के सामने फोटो सबूत पेश किए, जिनमें यह दिखाया गया कि:

  • वेंडिंग स्थल के आसपास स्टूल और अन्य सामान रखकर फुटपाथ को घेर लिया गया था
  • इलाके में साफ-सफाई का अभाव था
  • कूड़ा जमा हो गया था

नगर निगम का तर्क था कि यह स्थिति न केवल पैदल चलने वालों के लिए परेशानी पैदा करती है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है।


अदालत की टिप्पणी: अधिकार के साथ जिम्मेदारी जरूरी

इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि:

“वेंडिंग का अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है; इसके साथ सार्वजनिक स्थानों को साफ रखने और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।”

अदालत ने कहा कि:

  • फुटपाथ और सड़कें केवल वेंडर्स के लिए नहीं हैं
  • पैदल चलने वालों को भी समान अधिकार प्राप्त हैं
  • सार्वजनिक स्थानों का उपयोग संतुलित तरीके से होना चाहिए

यह टिप्पणी शहरी प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि किसी एक वर्ग के अधिकार दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं कर सकते।


कोर्ट द्वारा लगाई गई कड़ी शर्तें

अदालत ने एक ओर वेंडर के व्यवसाय के अधिकार को बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर कई सख्त शर्तें भी लागू कीं:

1. साफ-सफाई अनिवार्य

याचिकाकर्ता को अपने वेंडिंग स्थल पर एक कूड़ेदान रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि आसपास गंदगी न फैले।

2. फुटपाथ पर कब्जा नहीं

वेंडर यह सुनिश्चित करेगा कि:

  • फुटपाथ पूरी तरह अवरुद्ध न हो
  • पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त जगह बनी रहे

3. नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई

यदि इन शर्तों का पालन नहीं किया जाता, तो MCD को कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है।


‘राइट टू लिवलीहुड’ बनाम ‘राइट ऑफ वे’

यह मामला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संतुलन को उजागर करता है:

राइट टू लिवलीहुड (जीविका का अधिकार)

  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आजीविका का अधिकार
  • वेंडर्स को रोजगार का अवसर

राइट ऑफ वे (आवागमन का अधिकार)

  • आम नागरिकों का स्वतंत्र रूप से चलने का अधिकार
  • सार्वजनिक स्थानों का निर्बाध उपयोग

अदालत ने स्पष्ट किया कि इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।


शहरी प्रशासन के लिए संदेश

यह फैसला केवल एक व्यक्ति के मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शहरी प्रशासन के लिए एक दिशा-निर्देश है:

  • नगर निकायों को नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिए
  • वेंडर्स को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा
  • शहरों में “अतिक्रमण बनाम आजीविका” की बहस को संतुलित दृष्टिकोण से देखना होगा

दिव्यांग वेंडर का पहलू: संवेदनशीलता की जरूरत

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि याचिकाकर्ता एक दिव्यांग व्यक्ति हैं। अदालत ने उनके अधिकारों को पूरी तरह नकारा नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखते हुए शर्तों के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की।

यह दिखाता है कि न्यायपालिका:

  • संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाती है
  • लेकिन नियमों और सार्वजनिक हित से समझौता नहीं करती

अगली सुनवाई और आगे की राह

इस मामले में अगली सुनवाई 22 मई को निर्धारित की गई है। तब तक यह देखा जाएगा कि:

  • याचिकाकर्ता अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों का पालन करते हैं या नहीं
  • MCD और वेंडर के बीच विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है

निष्कर्ष: संतुलन ही समाधान

Delhi High Court का यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि अधिकार और जिम्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सड़क पर व्यापार करना न तो पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जा सकता है और न ही इसे पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ा जा सकता है।

शहरों की वास्तविकता यही है कि:

  • वेंडर्स आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत हैं
  • लेकिन सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है

अदालत ने इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की जो कोशिश की है, वह भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।