दिव्यांगों के लिए सुगम परिवहन का अधिकार: कैब सेवाओं को समावेशी बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की पहल
भारत में न्यायपालिका समय-समय पर समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए देशभर में संचालित कैब सेवाओं को दिव्यांग व्यक्तियों (Persons with Disabilities – PwDs) के अनुकूल बनाने की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार किया। यह मामला न केवल परिवहन सुविधाओं की उपलब्धता से जुड़ा है, बल्कि समानता, गरिमा और स्वतंत्र जीवन के संवैधानिक अधिकारों से भी सीधे तौर पर संबंधित है।
मामले की पृष्ठभूमि और न्यायालय की टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ द्वारा की जा रही है। याचिका में यह मांग की गई है कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच सुनिश्चित करने हेतु ‘फर्स्ट और लास्ट माइल’ कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया जाए।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कैब सेवाओं को भी व्यापक अर्थ में सार्वजनिक परिवहन का हिस्सा माना जाना चाहिए, विशेषकर महानगरों में, जहां इन सेवाओं का उपयोग अत्यधिक होता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कैब में व्हीलचेयर और अन्य सहायक उपकरणों को रखने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों को स्वतंत्र रूप से यात्रा करने में किसी प्रकार की बाधा न हो।
‘फर्स्ट और लास्ट माइल’ कनेक्टिविटी का महत्व
‘फर्स्ट और लास्ट माइल’ कनेक्टिविटी का तात्पर्य उस यात्रा से है, जो व्यक्ति अपने घर से सार्वजनिक परिवहन के मुख्य साधन (जैसे बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन) तक पहुंचने और वहां से अपने अंतिम गंतव्य तक जाने के लिए करता है।
दिव्यांग व्यक्तियों के लिए यह यात्रा अक्सर सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होती है। यदि इस चरण में उन्हें उचित साधन उपलब्ध नहीं होते, तो वे सार्वजनिक परिवहन का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में कैब सेवाएं उनके लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती हैं, बशर्ते उन्हें दिव्यांग-अनुकूल बनाया जाए।
कैब सेवाओं में व्यावहारिक समस्याएं
याचिकाकर्ता की ओर से यह बताया गया कि भले ही नियमों और नीतियों में दिव्यांगों के लिए सुविधाओं का प्रावधान किया गया हो, लेकिन उनका वास्तविक पालन नहीं हो रहा है। विशेष रूप से, अधिकांश कैब में CNG सिलेंडर लगाए जाने के कारण डिक्की (boot space) में पर्याप्त स्थान नहीं बचता, जिससे व्हीलचेयर रखना कठिन हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप, दिव्यांग व्यक्तियों को न केवल असुविधा का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह उनके साथ अप्रत्यक्ष भेदभाव का भी कारण बनता है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के विपरीत है।
विशेष रूप से डिजाइन की गई कैब का सुझाव
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने सुझाव दिया कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई कैब या कैरियर की व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी और व्यावहारिक समाधान तलाशना समय की आवश्यकता है, ताकि दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
यह सुझाव केवल एक अस्थायी उपाय नहीं है, बल्कि यह परिवहन प्रणाली में एक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम है। यदि ऐसे विशेष वाहनों को बढ़ावा दिया जाता है, तो यह न केवल दिव्यांगों के लिए, बल्कि बुजुर्गों और अस्थायी रूप से अक्षम व्यक्तियों के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा।
सरकार और समिति की भूमिका
प्रतिवादियों की ओर से यह जानकारी दी गई कि यह मुद्दा पहले से ही एक समिति के समक्ष विचाराधीन है, जो “राजीव रतूरी” मामले में गठित की गई थी। हालांकि, जब न्यायालय ने समिति की संरचना और कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी मांगी, तो स्पष्ट विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
इस पर न्यायालय ने नाराजगी व्यक्त करते हुए मामले को पुनः सूचीबद्ध किया और ऐश्वर्या भाटी से इस विषय में सहायता मांगी। यह कदम दर्शाता है कि न्यायालय इस मुद्दे को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक आवश्यकता के रूप में देख रहा है।
कानूनी और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 लागू किया गया है। इस अधिनियम के तहत सरकार और निजी संस्थाओं पर यह दायित्व डाला गया है कि वे दिव्यांगों के लिए समान अवसर और सुलभ वातावरण सुनिश्चित करें।
इस अधिनियम की धारा 41 विशेष रूप से परिवहन सुविधाओं को दिव्यांग-अनुकूल बनाने की बात करती है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र का “Convention on the Rights of Persons with Disabilities (CRPD)” भी भारत पर यह दायित्व डालता है कि वह अपने नागरिकों के लिए समावेशी और सुलभ परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित करे।
समावेशी परिवहन: एक सामाजिक आवश्यकता
दिव्यांग व्यक्तियों के लिए परिवहन की सुविधा केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का आधार है। यदि वे स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकते हैं, तो वे शिक्षा, रोजगार और अन्य सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले सकते हैं।
आज के डिजिटल युग में, जहां कैब सेवाएं जैसे Ola, Uber आदि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं, यह आवश्यक है कि इन सेवाओं को भी समावेशी बनाया जाए। इससे न केवल दिव्यांगों का जीवन आसान होगा, बल्कि समाज में समानता और संवेदनशीलता की भावना भी विकसित होगी।
व्यावहारिक समाधान और आगे की राह
इस समस्या के समाधान के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं:
- विशेष कैब का संचालन – सरकार और निजी कंपनियों को मिलकर दिव्यांग-अनुकूल कैब का एक अलग बेड़ा (fleet) तैयार करना चाहिए।
- डिजाइन में बदलाव – मौजूदा कैब के डिजाइन में ऐसे परिवर्तन किए जाएं, जिससे व्हीलचेयर आसानी से समा सके।
- ड्राइवरों का प्रशिक्षण – कैब चालकों को दिव्यांग व्यक्तियों के साथ व्यवहार और उनकी सहायता करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- ऐप में सुविधाएं – कैब बुकिंग ऐप में दिव्यांगों के लिए विशेष विकल्प दिए जाएं, जिससे वे अपनी जरूरत के अनुसार वाहन चुन सकें।
- नियमों का सख्त पालन – सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मौजूदा नियमों का कड़ाई से पालन हो।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप भारतीय समाज को अधिक समावेशी और संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करना केवल सरकार या न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का कर्तव्य है। कैब सेवाओं को दिव्यांग-अनुकूल बनाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है, जो लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि जब तक समाज के प्रत्येक वर्ग को समान सुविधाएं और अवसर नहीं मिलते, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम हमें उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, जहां हर व्यक्ति को गरिमा और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले।