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“घिसे-पिटे कॉलेजियम सिस्टम पर पुनर्विचार जरूरी”: जस्टिस मनमोहन की बड़ी टिप्पणी और न्यायिक सुधार की जरूरत

“घिसे-पिटे कॉलेजियम सिस्टम पर पुनर्विचार जरूरी”: जस्टिस मनमोहन की बड़ी टिप्पणी और न्यायिक सुधार की जरूरत

भारतीय न्यायपालिका में नियुक्तियों की प्रक्रिया लंबे समय से बहस का विषय रही है। हाल ही में Supreme Court of India के न्यायाधीश Justice Manmohan ने कॉलेजियम प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे “घिसा-पिटा सिस्टम” बताया और इसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया। यह टिप्पणी Supreme Court Bar Association के नेशनल कॉन्फ्रेंस 2026 में “पेंडेंसी से प्रॉम्प्ट जस्टिस” विषय पर बोलते हुए सामने आई।

उनकी यह टिप्पणी केवल एक राय नहीं, बल्कि न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में गहरे बैठे संरचनात्मक मुद्दों की ओर संकेत करती है।


कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल: क्या भरोसे की कमी है?

जस्टिस मनमोहन ने सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाया—क्या हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों पर भरोसा नहीं किया जा रहा?

उन्होंने कहा:

“अगर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने किसी नाम की सिफारिश की है, तो उस पर बार-बार बहस क्यों? क्या हम उन पर भरोसा नहीं करते?”

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति Collegium System के माध्यम से होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह सिफारिश करता है। लेकिन जस्टिस मनमोहन के अनुसार:

  • एक ही नाम कई स्तरों पर जांच के लिए जाता है
  • सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, सरकार और इंटेलिजेंस एजेंसियां सभी इसमें शामिल होती हैं
  • इससे प्रक्रिया धीमी और अविश्वासपूर्ण हो जाती है

उनका मानना है कि यह “सिस्टमेटिक डिस्ट्रस्ट” (प्रणालीगत अविश्वास) न्यायिक नियुक्तियों को प्रभावित कर रहा है।


संवैधानिक पदों पर अविश्वास: एक गंभीर चिंता

जस्टिस मनमोहन ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश कोई साधारण अधिकारी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पदाधिकारी होता है। ऐसे में उसकी सिफारिशों पर संदेह करना पूरे सिस्टम पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

यह टिप्पणी इस बड़े प्रश्न को जन्म देती है:

  • क्या न्यायपालिका अपने ही वरिष्ठ पदाधिकारियों पर भरोसा नहीं कर रही?
  • क्या यह बहु-स्तरीय जांच वास्तव में गुणवत्ता बढ़ाती है या सिर्फ देरी पैदा करती है?

ट्रांसफर का डर: न्यायिक स्वतंत्रता पर खतरा

जस्टिस मनमोहन ने न्यायपालिका के अंदरूनी दबावों पर भी प्रकाश डाला, खासकर ट्रांसफर (स्थानांतरण) के डर पर।

उन्होंने कहा:

  • एक न्यायाधीश तभी स्वतंत्र रूप से काम कर सकता है जब उसे पूर्ण अधिकार और सुरक्षा मिले
  • यदि वह स्थानांतरण के डर में रहेगा, तो उसकी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है

यह मुद्दा सीधे तौर पर न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) से जुड़ा है, जो लोकतंत्र का मूल स्तंभ है।


न्यायिक बुनियादी ढांचा: जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक

जस्टिस मनमोहन ने अपने Delhi High Court के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अनुभव साझा करते हुए न्यायिक ढांचे की गंभीर समस्याओं को उजागर किया।

1. जज हैं, लेकिन कोर्टरूम नहीं

उन्होंने बताया कि:

  • उन्होंने जिला न्यायपालिका में जजों की भर्ती बढ़ाई
  • लेकिन सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे का वादा पूरा नहीं किया गया
  • नतीजतन, नए जजों के पास बैठने तक की जगह नहीं थी

उन्हें “डिजिटल कोर्ट” बनाकर जजों को बारी-बारी से बैठाना पड़ा—यह स्थिति न्याय व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों को दर्शाती है।


2. एक जज पर हजारों मामलों का बोझ

रोहिणी कोर्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा:

  • एक फैमिली कोर्ट जज 1200-1300 मामलों की बजाय 3700 मामलों को संभाल रहा था

यह आंकड़ा बताता है कि न्यायालयों में लंबित मामलों (pendency) का बोझ कितना गंभीर है।


3. सुरक्षा और संसाधनों की कमी

उन्होंने यह भी बताया:

  • कुछ अदालतों में पहले बम विस्फोट और गोलीबारी की घटनाएं हो चुकी थीं
  • फिर भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई

यह स्थिति न्यायिक अधिकारियों और आम जनता दोनों की सुरक्षा पर सवाल उठाती है।


4. लोक अभियोजक की कमी

एक और चौंकाने वाला उदाहरण:

  • दो कोर्ट एक ही लोक अभियोजक (Public Prosecutor) साझा कर रही थीं
  • जब अभियोजक दूसरी कोर्ट में होता, तो पहली कोर्ट की कार्यवाही रुक जाती

यह समस्या केवल बुनियादी ढांचे की नहीं, बल्कि संसाधनों के प्रबंधन की भी है।


सरकार: सबसे बड़ी वादी, फिर भी गैर-जिम्मेदार?

जस्टिस मनमोहन ने सरकार की मुकदमेबाजी नीति पर भी कड़ी आलोचना की।

उन्होंने कहा:

  • अधिकारी अनावश्यक अपील दायर करते हैं
  • कारण: भविष्य में जांच एजेंसियों (जैसे Central Bureau of Investigation) से बचना

परिणाम:

  • अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है
  • मामलों की संख्या तेजी से बढ़ती है

यह स्थिति “Government as the biggest litigant” की समस्या को उजागर करती है।


ADR (वैकल्पिक विवाद समाधान) पर सरकार का विरोधाभास

भारत में Alternative Dispute Resolution को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें मध्यस्थता (Mediation) और पंचाट (Arbitration) शामिल हैं।

लेकिन जस्टिस मनमोहन ने चिंता जताई कि:

  • सरकार बड़े मामलों में मध्यस्थता से पीछे हट रही है
  • जबकि यह जटिल विवादों को जल्दी सुलझाने का प्रभावी तरीका है

उन्होंने सुझाव दिया:

  • यदि मध्यस्थता में समस्या है, तो कानून में सुधार करें
  • लेकिन पूरी प्रणाली को छोड़ना समाधान नहीं है

कॉलेजियम सिस्टम: सुधार की दिशा क्या हो सकती है?

जस्टिस मनमोहन की टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि:

  • नियुक्ति प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना जरूरी है
  • हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की सिफारिशों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए
  • अनावश्यक जांच की परतों को कम किया जाना चाहिए

हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि:

  • पारदर्शिता और जवाबदेही भी बनी रहनी चाहिए
  • नियुक्तियों में गुणवत्ता और निष्पक्षता से समझौता न हो

निष्कर्ष: न्यायिक सुधार का समय

जस्टिस मनमोहन की यह टिप्पणी केवल कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय प्रणाली के व्यापक सुधार की आवश्यकता का संकेत है।

Supreme Court of India के इस वरिष्ठ न्यायाधीश ने जिन मुद्दों को उठाया, वे हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि:

  • क्या वर्तमान प्रणाली वास्तव में न्याय को तेज और प्रभावी बना रही है?
  • क्या प्रशासनिक और संरचनात्मक सुधारों के बिना पेंडेंसी कम हो सकती है?

अंततः, न्याय केवल निर्णय देने से नहीं, बल्कि समय पर और प्रभावी तरीके से न्याय देने से पूरा होता है। यदि सिस्टम में अविश्वास, संसाधनों की कमी और जटिल प्रक्रियाएं बनी रहेंगी, तो “न्याय में देरी” एक स्थायी समस्या बनी रहेगी।

इसलिए, यह समय है कि कॉलेजियम प्रणाली और न्यायिक ढांचे दोनों पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाए—ताकि “न्याय” वास्तव में “प्रॉम्प्ट जस्टिस” बन सके।