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पॉक्सो कानून का दुरुपयोग और न्यायिक सख्ती: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिवक्ता की जमानत अर्जी खारिज की

पॉक्सो कानून का दुरुपयोग और न्यायिक सख्ती: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिवक्ता की जमानत अर्जी खारिज की

न्याय व्यवस्था में जहां एक ओर कानून पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर उसके दुरुपयोग की घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं। ऐसा ही एक गंभीर मामला उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया है, जिसमें पॉक्सो अधिनियम के तहत झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी देकर कथित रूप से जबरन वसूली और मारपीट करने के आरोपी अधिवक्ता अखिलेश दुबे को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

यह निर्णय न केवल इस विशेष मामले में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायालय कानून के दुरुपयोग को लेकर कितनी गंभीरता से विचार करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कानपुर के किदवईनगर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां अगस्त 2025 में अधिवक्ता अखिलेश दुबे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता व्यवसायी रवि सतीजा ने आरोप लगाया कि उन्होंने पहले कुछ धनराशि आरोपी को दी थी, लेकिन जब आगे पैसे देने से मना किया, तो उन्हें झूठे केस में फंसाने की साजिश रची गई।

एफआईआर के अनुसार, आरोपी ने वर्ष 2022 में नौबस्ता थाने में पॉक्सो अधिनियम सहित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करवाया और बाद में समझौते के नाम पर करीब ढाई करोड़ रुपये वसूल लिए। यह राशि स्वयं आरोपी और उसके सहयोगियों के माध्यम से ली गई।


न्यायालय की टिप्पणी और निर्णय

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने की। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी एक प्रभावशाली व्यक्ति है और यदि उसे जमानत दी जाती है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकता है।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि जब तक गवाहों के बयान दर्ज नहीं हो जाते, तब तक आरोपी को जमानत देना न्यायहित में नहीं होगा। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद आरोपी पुनः जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

यह दृष्टिकोण भारतीय न्यायालयों द्वारा अपनाए जाने वाले उस सिद्धांत को दर्शाता है, जिसमें न्यायालय साक्ष्य की सुरक्षा और निष्पक्ष ट्रायल को सर्वोपरि मानते हैं।


साक्ष्य और जांच में सामने आए तथ्य

अदालत ने मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया। विशेष रूप से एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का उल्लेख किया गया, जिसमें आरोपी और वादी के बेटे के बीच बातचीत हुई थी। इस रिकॉर्डिंग से यह संकेत मिलता है कि आरोपी न तो पीड़िता का वकील था और न ही आरोपित पक्ष का, फिर भी उसने कथित रूप से पीड़िता पर अपने आरोप वापस लेने के लिए दबाव बनाया।

इसके अलावा, पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने कथित रूप से समझौते के नाम पर भारी धनराशि वसूलने के बाद अंतिम रिपोर्ट में हेरफेर कराने की कोशिश की।

नौबस्ता थाने में दर्ज पुराने मामले में पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट को 2024 में न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था। इस तथ्य ने भी अदालत को यह विश्वास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं।


गवाहों के बयान और उनका महत्व

मामले में एक महत्वपूर्ण गवाह वादी का ड्राइवर कंचन कुशवाहा है, जिसने खुद को चश्मदीद बताया है। उसके बयान में घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसमें आरोपी द्वारा मोबाइल फोन पर धमकी देने और विभिन्न तारीखों पर जबरन धन वसूली करने का आरोप शामिल है।

गवाह ने यह भी कहा कि वह आरोपी के दबाव में कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हुआ, जिसके आधार पर 2022 में एक झूठा मामला दर्ज कराया गया। बाद में उसी गवाह पर मामले को वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया और उसका बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया गया।

गवाहों के इस प्रकार के बयान न्यायालय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये न केवल घटनाओं की पुष्टि करते हैं, बल्कि आरोपी के आचरण और मंशा को भी उजागर करते हैं।


बचाव पक्ष की दलीलें

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में यह तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने ऑडियो रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया और कहा कि उसमें न तो स्पष्ट तारीख है और न ही पैसे की मांग का कोई ठोस उल्लेख।

इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तुत पेनड्राइव के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63(4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है, जिससे उसकी वैधता संदिग्ध हो जाती है।

बचाव पक्ष ने यह भी उल्लेख किया कि इसी प्रकार के एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को 2025 में जमानत दे दी थी, इसलिए इस मामले में भी उसे राहत मिलनी चाहिए।


राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दी गई जमानत मामले के गुण-दोष पर आधारित नहीं थी, बल्कि केवल इस आधार पर दी गई थी कि आरोप पत्र दाखिल हो चुका है और आगे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, जो आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोपों की पुष्टि करते हैं। इसलिए, उसे जमानत देना न्याय के हित में नहीं होगा।


पॉक्सो कानून के दुरुपयोग पर चिंता

यह मामला एक बार फिर इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है कि क्या सख्त कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन यदि इस कानून का उपयोग व्यक्तिगत दुश्मनी या आर्थिक लाभ के लिए किया जाता है, तो यह न केवल निर्दोष लोगों के लिए हानिकारक है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के न्याय को भी प्रभावित करता है।

न्यायालयों ने कई बार इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि कानून का दुरुपयोग रोकना उतना ही आवश्यक है जितना कि उसका सही उपयोग सुनिश्चित करना।


निष्कर्ष

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक सतर्कता और संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। अदालत ने एक ओर जहां आरोपी के अधिकारों का ध्यान रखा, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित किया कि न्याय प्रक्रिया प्रभावित न हो।

जमानत याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा कानून के दुरुपयोग और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को गंभीरता से लिया जाएगा।

यह मामला आने वाले समय में ट्रायल के दौरान और भी महत्वपूर्ण मोड़ ले सकता है, लेकिन फिलहाल यह निर्णय न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और सख्ती को दर्शाता है।