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IBC और Arbitration पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ‘Set-Off’ की सीमित अनुमति, लेकिन स्वतंत्र वसूली पर रोक

IBC और Arbitration पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ‘Set-Off’ की सीमित अनुमति, लेकिन स्वतंत्र वसूली पर रोक

भारतीय कॉर्पोरेट कानून और मध्यस्थता (Arbitration) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकास करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भले ही Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के तहत स्वीकृत समाधान योजना में शामिल न किए गए दावे समाप्त हो जाते हैं, फिर भी ऐसे दावों का उपयोग मध्यस्थता कार्यवाही में “बचाव” (defence) के रूप में सीमित रूप से ‘Set-Off’ के तौर पर किया जा सकता है—बशर्ते उससे कोई स्वतंत्र या सकारात्मक वसूली (recovery) न हो।

यह निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने Ujaas Energy Ltd. बनाम West Bengal Power Development Corporation Ltd. मामले में दिया।


 क्या था पूरा मामला?

यह विवाद वर्ष 2017 में पश्चिम बंगाल में ग्रिड से जुड़े रूफटॉप सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के लिए हुए एक अनुबंध से जुड़ा था।

  • अपीलकर्ता: Ujaas Energy Limited (एक MSME)
  • प्रतिवादी: West Bengal Power Development Corporation Limited (सरकारी कंपनी)

बाद में सितंबर 2020 में उजास एनर्जी के खिलाफ कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हुआ। इस दौरान:

  • कंपनी ने मध्यस्थता कार्यवाही शुरू की
  • प्रतिवादी PSU ने एक Counterclaim (जवाबी दावा) पेश किया
  • लेकिन यह दावा CIRP के दौरान Resolution Professional के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया

अक्टूबर 2023 में NCLT द्वारा समाधान योजना को मंजूरी मिलने के बाद उजास एनर्जी ने तर्क दिया कि:

 जो दावे योजना में शामिल नहीं थे, वे सभी समाप्त (extinguished) हो चुके हैं।


 निचली अदालतों का रुख

  • Arbitration Tribunal: Counterclaim खारिज
  • Single Judge (High Court): ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार
  • Division Bench: आदेश पलटा, कहा—पूरे मामले की सुनवाई जरूरी

आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।


 सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

1.  Resolution Plan के बाहर के दावे समाप्त

कोर्ट ने दोहराया कि:

 IBC की धारा 31(1) के तहत समाधान योजना स्वीकृत होते ही
उसमें शामिल न किए गए सभी दावे समाप्त हो जाते हैं

इस संदर्भ में कोर्ट ने अपने पुराने फैसले Ghanashyam Mishra & Sons v. Edelweiss Asset Reconstruction पर भरोसा किया।


2. Counterclaim और Set-Off में अंतर

कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया:

आधार Counterclaim Set-Off
प्रकृति स्वतंत्र दावा बचाव (defence)
उद्देश्य वसूली (recovery) दावे को कम करना
IBC के बाद स्थिति  अमान्य  सीमित रूप से मान्य

 कोर्ट ने कहा कि Counterclaim एक स्वतंत्र दावा है, इसलिए यह समाप्त हो जाएगा।
लेकिन Set-Off केवल बचाव का तरीका है, इसलिए इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।


3. Set-Off की सीमित अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“प्रतिवादी स्वतंत्र रूप से अपना दावा आगे नहीं बढ़ा सकता,
लेकिन बचाव के तौर पर Set-Off की दलील उठा सकता है।”

इसका मतलब:

  • प्रतिवादी अपना पैसा वसूल नहीं कर सकता
  • लेकिन वह अपीलकर्ता के दावे को कम या शून्य कर सकता है

4. कोई “Positive Recovery” नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • अगर Set-Off के बाद भी अपीलकर्ता को कुछ राशि देय है → उसे मिलेगी
  • अगर प्रतिवादी का दावा ज्यादा है → अतिरिक्त वसूली नहीं होगी

 यानी Set-Off सिर्फ “defensive shield” है, “offensive weapon” नहीं।


5.  Resolution Plan में Set-Off पर रोक नहीं

कोर्ट ने पाया कि:

  • Resolution Plan में Set-Off पर कोई स्पष्ट रोक नहीं थी
  • केवल “payment/recovery” पर रोक थी

इसलिए Set-Off को अनुमति दी गई।


6.  Arbitration खत्म = Set-Off भी खत्म

कोर्ट ने यह भी कहा:

 यदि मध्यस्थता कार्यवाही समाप्त हो जाती है
तो Set-Off (जो केवल बचाव है) भी समाप्त हो जाएगा


 Bharti Airtel केस से अलग क्यों?

कोर्ट ने इस फैसले को Bharti Airtel Ltd. v. Aircel Ltd. से अलग बताया:

  • Bharti Airtel केस: CIRP के दौरान Set-Off
  • वर्तमान केस: Resolution Plan मंजूरी के बाद Set-Off

 इसलिए दोनों मामलों का कानूनी संदर्भ अलग है।


 कानूनी महत्व (Legal Significance)

यह फैसला कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है:

 1. IBC की Finality बरकरार

Resolution Plan के बाद:

  • कोई नया दावा नहीं
  • कोई recovery नहीं

 इससे insolvency प्रक्रिया की निश्चितता (certainty) बनी रहती है।


 2. Arbitration में न्यायसंगत संतुलन

कोर्ट ने संतुलन बनाया:

  • IBC के तहत दावों का समापन ✔️
  • लेकिन अन्य पक्ष को पूरी तरह असहाय नहीं छोड़ा ✔️

 Set-Off की अनुमति देकर “equitable justice” सुनिश्चित किया।


 3. MSME के लिए महत्वपूर्ण

Ujaas Energy Limited जैसी MSME कंपनियों के लिए यह फैसला अहम है क्योंकि:

  • उनके खिलाफ बड़े PSU के दावे सीमित हो जाते हैं
  • लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होते

 4. Arbitration Strategy पर असर

अब पक्षकारों को ध्यान रखना होगा:

  • CIRP के दौरान सभी दावे दाखिल करना जरूरी
  • नहीं तो recovery का अधिकार खत्म
  • लेकिन defence के रूप में सीमित उपयोग संभव

 व्यावहारिक उदाहरण से समझें

मान लीजिए:

  • कंपनी A (Corporate Debtor) दावा करती है: ₹100
  • कंपनी B का Counterclaim था: ₹120 (लेकिन CIRP में दाखिल नहीं किया)

 कोर्ट के अनुसार:

  • B ₹120 recover नहीं कर सकती
  • लेकिन ₹100 के खिलाफ Set-Off कर सकती है

 परिणाम:

  • A को ₹0 मिलेगा
  • B को अतिरिक्त ₹20 नहीं मिलेगा

 निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला IBC और Arbitration के बीच संतुलन बनाने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम है।

यह स्पष्ट करता है कि:

  • Resolution Plan के बाद दावे समाप्त हो जाते हैं
  • लेकिन न्यायसंगतता के लिए Set-Off जैसे सीमित बचाव की अनुमति दी जा सकती है

 यह निर्णय न केवल कॉर्पोरेट विवादों बल्कि भविष्य की मध्यस्थता कार्यवाहियों के लिए भी मार्गदर्शक साबित होगा।

अंततः, यह फैसला यह संदेश देता है कि कानून कठोर होते हुए भी न्यायसंगत संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है—जहां एक ओर insolvency प्रक्रिया की finality बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर पक्षकारों के वैध बचाव के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता।