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शादाब जकाती केस: हाई कोर्ट से राहत नहीं, गिरफ्तारी पर रोक से इनकार — सोशल मीडिया स्टार पर गंभीर आरोपों ने बढ़ाई मुश्किलें

शादाब जकाती केस: हाई कोर्ट से राहत नहीं, गिरफ्तारी पर रोक से इनकार — सोशल मीडिया स्टार पर गंभीर आरोपों ने बढ़ाई मुश्किलें

उत्तर प्रदेश के चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर और यूट्यूबर शादाब जकाती एक गंभीर कानूनी संकट में घिरते नजर आ रहे हैं। ‘10 रुपये का बिस्कुट कितने का है जी’ जैसे डायलॉग से लोकप्रियता हासिल करने वाले शादाब अब दुष्कर्म, अपहरण और शोषण जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इनकार करना उनके लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शादाब जकाती और उनकी पत्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने गिरफ्तारी पर रोक (स्टे) और अग्रिम जमानत की मांग की थी। कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। साथ ही, अदालत ने पुलिस से यह भी पूछा कि अब तक आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं की गई है।

यह आदेश यह संकेत देता है कि अदालत प्रथम दृष्टया आरोपों को हल्के में नहीं ले रही है और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली किसी भी राहत से बचना चाहती है।

क्या है पूरा मामला?

शादाब जकाती के खिलाफ यह मामला 5 फरवरी 2026 को दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता एक महिला है, जो कथित तौर पर उनके घर पर काम करती थी और सोशल मीडिया वीडियो बनाने में भी सहयोग करती थी। महिला ने आरोप लगाया है कि शादाब जकाती ने उसके साथ 34 बार दुष्कर्म किया।

महिला के अनुसार, उसे बंधक बनाकर रखा गया और लगातार शारीरिक व मानसिक शोषण किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस पूरे कृत्य में शादाब की पत्नी और उनके पिता यजीम की भी भूमिका रही। महिला ने मारपीट, धमकी और जबरन अश्लील वीडियो बनाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

FIR और आरोपों का दायरा

6 फरवरी 2026 को मेरठ के इंचौली थाने में इस मामले में औपचारिक रूप से FIR दर्ज की गई। आरोपियों में शादाब जकाती, उनकी पत्नी और उनके पिता को नामजद किया गया है।

उन पर निम्नलिखित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है:

  • दुष्कर्म (Rape)
  • अपहरण (Kidnapping)
  • बंधक बनाना (Wrongful confinement)
  • मारपीट (Assault)
  • आपराधिक धमकी (Criminal intimidation)

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस की कार्रवाई और अदालत की सख्ती दोनों ही अपेक्षित मानी जा रही हैं।

सोशल मीडिया से कोर्ट तक का सफर

शादाब जकाती ने सोशल मीडिया पर एक खास पहचान बनाई थी। उनका एक साधारण संवाद “10 रुपये का बिस्कुट कितने का है जी” वायरल हो गया था और इसके बाद उन्होंने लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए। वे अक्सर मजाकिया और लोकल अंदाज के वीडियो बनाकर लोगों का मनोरंजन करते थे।

लेकिन अब यही लोकप्रियता उनके लिए उल्टा दबाव बनती दिख रही है, क्योंकि मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है और हर कदम पर लोगों की नजर बनी हुई है।

पहले भी लगे थे आरोप

इस मामले से पहले भी शादाब जकाती विवादों में घिर चुके हैं। उनके साथ काम करने वाली एक अन्य महिला इरम के पति ने भी उन पर गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि, उस मामले में क्या कानूनी कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि उनके खिलाफ आरोपों की यह पहली घटना नहीं है।

कोर्ट की सख्ती के पीछे कारण

हाई कोर्ट द्वारा राहत न देने के पीछे कई कानूनी कारण हो सकते हैं:

  1. आरोपों की गंभीरता – दुष्कर्म जैसे अपराधों में अदालतें आमतौर पर अग्रिम जमानत देने में सतर्क रहती हैं।
  2. पीड़िता के बयान की अहमियत – यदि पीड़िता का बयान सुसंगत और विश्वसनीय प्रतीत होता है, तो अदालत राहत देने से बचती है।
  3. जांच पर प्रभाव की आशंका – आरोपियों के प्रभावशाली होने की स्थिति में साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने का खतरा रहता है।
  4. प्रथम दृष्टया मामला बनना – यदि केस में prima facie अपराध बनता दिखता है, तो कोर्ट राहत देने में हिचकिचाती है।

पुलिस की भूमिका और आगे की कार्रवाई

हाई कोर्ट ने मेरठ पुलिस से स्पष्ट जवाब मांगा है कि अब तक आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं की गई। यह निर्देश पुलिस के लिए एक तरह से चेतावनी भी माना जा सकता है कि जांच में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस कब तक आरोपियों को गिरफ्तार करती है और जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।

कानूनी दृष्टिकोण: अग्रिम जमानत क्यों नहीं?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत अग्रिम जमानत एक विशेष राहत है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जाता है। विशेषकर जब मामला दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध से जुड़ा हो, तो अदालतें इस राहत को देने में अत्यधिक सावधानी बरतती हैं।

अदालत यह देखती है कि:

  • क्या आरोपी के खिलाफ prima facie मामला बनता है?
  • क्या आरोपी फरार हो सकता है?
  • क्या आरोपी साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकता है?
  • क्या पीड़िता या गवाहों को खतरा हो सकता है?

यदि इन सवालों के जवाब अदालत को संतोषजनक नहीं मिलते, तो अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी जाती है।

समाज और कानून के बीच संतुलन

यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक अपराध का नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक संदर्भ को भी दर्शाता है, जहां सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।

एक ओर जहां कानून पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सख्त है, वहीं दूसरी ओर आरोपियों को भी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। ऐसे मामलों में अदालतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि न्याय का संतुलन बना रहे।

निष्कर्ष

शादाब जकाती का मामला फिलहाल एक गंभीर कानूनी मोड़ पर खड़ा है। हाई कोर्ट द्वारा राहत से इनकार किए जाने के बाद उनकी गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है। आने वाले दिनों में पुलिस की कार्रवाई और अदालत की आगे की सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।

यह मामला यह भी दर्शाता है कि चाहे कोई कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, कानून के सामने सभी बराबर हैं। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो सख्त सजा का प्रावधान है, और यदि आरोप झूठे साबित होते हैं, तो आरोपी को न्याय मिलना भी उतना ही जरूरी है।

अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच किस दिशा में जाती है और न्यायालय इस मामले में क्या अंतिम निर्णय देता है।