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भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद: जैन समुदाय की एंट्री से बढ़ी कानूनी जटिलता, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मांगी आपत्तियां

भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद: जैन समुदाय की एंट्री से बढ़ी कानूनी जटिलता, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मांगी आपत्तियां

मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला केवल हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच सीमित नहीं रहा, बल्कि जैन समुदाय ने भी इस विवाद में अपना दावा पेश करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने इस नई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को अपनी आपत्तियां प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला

धार स्थित भोजशाला परिसर लंबे समय से धार्मिक स्वरूप को लेकर विवादों में रहा है। एक ओर हिंदू पक्ष इसे माता सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। अब जैन समुदाय ने भी दावा किया है कि यह स्थल मूल रूप से जैन मंदिर और गुरुकुल था।

दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेकचंद जैन द्वारा दायर इस जनहित याचिका में कहा गया है कि जैन समुदाय को भी इस परिसर में पूजा-अर्चना का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह स्थल 11वीं सदी में एक जैन धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र के रूप में स्थापित था।

अदालत में पहले से लंबित हैं कई मामले

इस पूरे विवाद की जटिलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर पहले से ही कई याचिकाएं अदालत में विचाराधीन हैं। हिंदू पक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए इसे प्राचीन मंदिर बता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग कर रहा है।

ऐसे में जैन समुदाय की एंट्री ने इस मामले को और अधिक बहुस्तरीय बना दिया है, जिससे अदालत के सामने तथ्यात्मक और कानूनी विश्लेषण की चुनौती बढ़ गई है।

हाईकोर्ट की कार्यवाही और अगली तारीख

इंदौर बेंच में सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने इस याचिका की स्वीकार्यता पर ही सवाल उठाया और कहा कि यह जनहित याचिका के रूप में सुनवाई योग्य नहीं है। इस पर न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने सभी पक्षों को निर्देश दिया कि वे अपनी लिखित आपत्तियां निर्धारित समय के भीतर प्रस्तुत करें।

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 अप्रैल की तारीख तय की है, जहां यह तय हो सकता है कि इस याचिका को आगे सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाए या नहीं।

जैन समुदाय का दावा: इतिहास और आस्था का प्रश्न

याचिका में दावा किया गया है कि भोजशाला परिसर में कभी जैन मंदिर और गुरुकुल संचालित होता था। जैन समुदाय का कहना है कि यहां स्थापित प्रतिमा वास्तव में देवी अम्बिका (जैन यक्षिणी) की थी, जिसे धार के राजा भोज ने वर्ष 1034 ईस्वी में स्थापित कराया था।

यह दावा हिंदू पक्ष के उस दावे से अलग है, जिसमें उक्त प्रतिमा को वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति बताया जाता है। इस प्रकार, एक ही प्रतिमा को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं सामने आ रही हैं, जो इस विवाद को और अधिक संवेदनशील बनाती हैं।

लंदन संग्रहालय में रखी प्रतिमा का मुद्दा

याचिका में एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया गया है—विवादित प्रतिमा की वर्तमान स्थिति। बताया गया है कि यह मूर्ति वर्ष 1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान खोजी गई थी और वर्तमान में लंदन के एक संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है।

जैन पक्ष ने अदालत से अनुरोध किया है कि इस प्रतिमा को भारत वापस लाने और पुनः भोजशाला परिसर में स्थापित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं। यदि अदालत इस मांग पर विचार करती है, तो यह मामला अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत और पुनर्स्थापन (repatriation) के मुद्दे से भी जुड़ सकता है।

एएसआई की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट का महत्व

भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में देखा जा रहा है। लगभग 2000 पन्नों की इस रिपोर्ट में संकेत दिए गए हैं कि वर्तमान संरचना से पहले यहां एक विशाल इमारत मौजूद थी, जो परमार काल की बताई जाती है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि वर्तमान ढांचे का निर्माण पुराने मंदिरों के अवशेषों का उपयोग करके किया गया हो सकता है। हालांकि, इस रिपोर्ट की व्याख्या को लेकर भी विभिन्न पक्षों के बीच मतभेद हैं।

2003 का एएसआई आदेश और वर्तमान व्यवस्था

भोजशाला परिसर में पूजा और नमाज को लेकर वर्तमान व्यवस्था भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 7 अप्रैल 2003 के आदेश पर आधारित है। इस आदेश के तहत:

  • हर मंगलवार हिंदू समुदाय को पूजा की अनुमति दी गई है
  • हर शुक्रवार मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की अनुमति है

यह व्यवस्था वर्षों से लागू है और इसे लेकर समय-समय पर विवाद भी उठते रहे हैं। अब जैन समुदाय द्वारा पूजा अधिकार की मांग इस संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

संवैधानिक अधिकारों का सवाल

याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का हवाला दिया गया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और सांस्कृतिक अधिकारों से संबंधित हैं। जैन समुदाय का तर्क है कि यदि यह स्थल ऐतिहासिक रूप से उनका धार्मिक केंद्र रहा है, तो उन्हें भी वहां पूजा करने का अधिकार मिलना चाहिए।

यहां अदालत को यह तय करना होगा कि क्या ऐतिहासिक दावों के आधार पर वर्तमान धार्मिक अधिकारों का पुनर्निर्धारण किया जा सकता है, और यदि हां, तो किस सीमा तक।

आगे की राह: कानूनी और सामाजिक संतुलन की चुनौती

भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद केवल एक धार्मिक स्थल का विवाद नहीं है, बल्कि यह भारत के बहुलतावादी समाज, इतिहास की व्याख्या और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा भी है। अब जब जैन समुदाय ने भी इस विवाद में अपनी दावेदारी पेश की है, तो अदालत के सामने यह मामला और अधिक जटिल हो गया है।

2 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस जनहित याचिका को स्वीकार करती है या नहीं, और यदि करती है, तो इससे मौजूदा व्यवस्था और अन्य लंबित मामलों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष

धार का भोजशाला परिसर आज केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और कानून के त्रिकोण में फंसा एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। अदालत का हर कदम न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक संतुलन के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।