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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सख्त रुख—इंदौर में अवैध होर्डिंग्स पर कार्रवाई के निर्देश, जन सुरक्षा और राजस्व हानि पर उठे गंभीर सवाल

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सख्त रुख—इंदौर में अवैध होर्डिंग्स पर कार्रवाई के निर्देश, जन सुरक्षा और राजस्व हानि पर उठे गंभीर सवाल

मध्य प्रदेश में शहरी प्रशासन, जन सुरक्षा और पारदर्शिता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए इंदौर नगर निगम को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि शहर में रोड डिवाइडर और फुटपाथ पर लगाए गए अवैध होर्डिंग्स के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए। यह आदेश 17 मार्च को एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान पारित किया गया, जिसमें न केवल नियमों के उल्लंघन बल्कि जन सुरक्षा और सरकारी राजस्व को हुए संभावित नुकसान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया।

यह मामला ‘Sudesh Gupta v. The State of Madhya Pradesh [WP-46800-2025]’ शीर्षक से न्यायालय के समक्ष लंबित है, जिसमें याचिकाकर्ता ने शहर में विज्ञापन होर्डिंग्स के अनियंत्रित और अवैध विस्तार को चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच द्वारा की जा रही है, जिन्होंने प्रारंभिक तौर पर ही इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए अंतरिम आदेश पारित किया।


पृष्ठभूमि: अनियंत्रित होर्डिंग्स और बढ़ता खतरा

शहरों में होर्डिंग्स और विज्ञापन बोर्ड आम दृश्य बन चुके हैं, लेकिन जब इनका उपयोग नियमों के विपरीत होने लगे तो यह न केवल सौंदर्य को प्रभावित करता है, बल्कि गंभीर दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकता है। इंदौर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में, जहां ट्रैफिक और पैदल यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहां सड़क के बीचों-बीच (डिवाइडर) और फुटपाथ पर होर्डिंग्स का लगाया जाना अत्यंत खतरनाक हो सकता है।

याचिका में यह आरोप लगाया गया कि कई स्थानों पर होर्डिंग्स ऐसे क्षेत्रों में लगाए गए हैं, जहां स्पष्ट रूप से प्रतिबंध है। विशेष रूप से फुटपाथ, जो पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित मार्ग होते हैं, वहां इनका अतिक्रमण लोगों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर करता है, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।


न्यायालय का दृष्टिकोण और अंतरिम आदेश

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि यह जन सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। अदालत ने कहा:

“एक अंतरिम उपाय के तौर पर यह निर्देश दिया जाता है कि प्रतिवादी नंबर 3/कमिश्नर, इंदौर नगर निगम उन होर्डिंग्स का पता लगाएंगे जो नियमों के विपरीत डिवाइडर या फुटपाथ पर लगाए गए हैं, और कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे।”

इसके साथ ही न्यायालय ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया। यह आदेश यह दर्शाता है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से लेते हुए त्वरित सुधारात्मक कदम चाहती है।


MP आउटडोर एडवर्टाइजमेंट मीडिया रूल्स, 2017 का उल्लंघन

याचिका का मुख्य आधार MP Outdoor Advertisement Media Rules, 2017 है, जो राज्य में विज्ञापन होर्डिंग्स और यूनिपोल्स के नियमन के लिए बनाए गए हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञापन संरचनाएं सुरक्षित, व्यवस्थित और सार्वजनिक हित के अनुरूप हों।

विशेष रूप से नियम 28 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि रोड मीडियन (डिवाइडर) और फुटपाथ जैसे स्थानों पर होर्डिंग्स लगाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह जन सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। इसके बावजूद, याचिका में आरोप लगाया गया कि बड़ी संख्या में ऐसे होर्डिंग्स लगाए गए हैं, जो इन नियमों का सीधा उल्लंघन करते हैं।


टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। याचिका में कहा गया कि 2019 और 2020 में ‘नोटिस इनवाइटिंग टेंडर’ (NIT) जारी किए गए थे, जिनमें होर्डिंग्स लगाने के लिए स्पष्ट शर्तें निर्धारित की गई थीं। इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि केवल योग्य और जिम्मेदार ठेकेदार ही इस कार्य को करें।

हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार:

  • ठेकेदारों ने अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं किया
  • संबंधित अधिकारियों ने इन शर्तों को लागू करने में लापरवाही बरती
  • टेंडर की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव रहा

यह आरोप प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है, क्योंकि यदि नियमों का पालन नहीं कराया गया, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि सार्वजनिक हित के साथ भी समझौता है।


राजस्व हानि का मुद्दा

याचिका में यह भी दावा किया गया कि नगर निगम को इस पूरी प्रक्रिया के कारण भारी राजस्व का नुकसान हुआ। 2019 और 2020 में जो टेंडर जारी किए गए थे, वे उस समय की राजस्व गणना के आधार पर थे। लेकिन बाद में:

  • ठेके बहुत देर से आवंटित किए गए
  • उनकी अवधि 7 वर्षों तक बढ़ा दी गई
  • इस दौरान दरों में कोई संशोधन नहीं किया गया

इसका सीधा प्रभाव यह हुआ कि बदलते आर्थिक परिदृश्य और बढ़ती विज्ञापन दरों के बावजूद नगर निगम को पुराने दरों पर ही भुगतान मिलता रहा, जिससे उसे संभावित आय का नुकसान हुआ।

यह पहलू केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस प्रकार प्रशासनिक उदासीनता से सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग हो सकता है।


साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत तस्वीरें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय के समक्ष कई तस्वीरें प्रस्तुत कीं, जिनमें कथित तौर पर स्पष्ट रूप से दिखाया गया कि होर्डिंग्स डिवाइडर और फुटपाथ पर लगाए गए हैं। इन तस्वीरों ने अदालत के समक्ष इस समस्या की वास्तविकता को उजागर किया।

तस्वीरों के माध्यम से यह भी दिखाया गया कि:

  • कई होर्डिंग्स ट्रैफिक सिग्नल के पास लगे हैं
  • कुछ होर्डिंग्स ड्राइवरों के दृश्य को बाधित करते हैं
  • फुटपाथ पूरी तरह से बाधित हो चुके हैं

इन तथ्यों ने अदालत को यह विश्वास दिलाया कि मामला केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि वास्तविक और गंभीर है।


जनहित याचिका (PIL) का महत्व

यह मामला इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि जनहित याचिका (PIL) किस प्रकार आम जनता के अधिकारों की रक्षा का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। जब प्रशासन अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है, तब न्यायपालिका हस्तक्षेप कर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।

इस मामले में भी, यदि याचिका दायर नहीं की जाती, तो संभवतः यह मुद्दा अनदेखा रह जाता और अवैध होर्डिंग्स का यह जाल और अधिक फैलता जाता।


शहरी प्रशासन और जवाबदेही

यह मामला शहरी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है। इंदौर नगर निगम, जो कि देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिना जाता है, उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह न केवल सफाई बल्कि शहरी नियोजन और सुरक्षा के मामलों में भी उच्च मानकों का पालन करे।

यदि नियमों के बावजूद अवैध होर्डिंग्स लगाए जा रहे हैं, तो यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत की ओर संकेत करता है। ऐसे में आवश्यक है कि:

  • जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान की जाए
  • उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए
  • भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित किया जाए

आगे की सुनवाई और संभावित प्रभाव

इस मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में निर्धारित की गई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि:

  • इंदौर नगर निगम अदालत के निर्देशों का किस हद तक पालन करता है
  • कितने अवैध होर्डिंग्स हटाए जाते हैं
  • क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है

यदि अदालत को यह लगता है कि प्रशासन ने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की है, तो वह और भी सख्त आदेश जारी कर सकती है, जिसमें जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।


निष्कर्ष

यह मामला केवल इंदौर शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि शहरी विकास के नाम पर नियमों की अनदेखी और जन सुरक्षा के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह रुख यह दर्शाता है कि न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा के प्रति सजग है।

अवैध होर्डिंग्स का मुद्दा केवल सौंदर्य या विज्ञापन का नहीं है, बल्कि यह जीवन और सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय है। ऐसे में आवश्यक है कि प्रशासन, ठेकेदार और नागरिक सभी मिलकर नियमों का पालन करें और एक सुरक्षित एवं व्यवस्थित शहरी वातावरण का निर्माण करें।

यह निर्णय न केवल इंदौर के लिए बल्कि अन्य शहरों के लिए भी एक चेतावनी है कि यदि नियमों का उल्लंघन किया गया, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करने में पीछे नहीं हटेगी।