बाढ़ राहत घोटाले में तहसीलदार अमिता सिंह तोमर को सुप्रीम कोर्ट से झटका, अग्रिम जमानत याचिका खारिज—गिरफ्तारी की आशंका बढ़ी
मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में कथित बाढ़ राहत घोटाले से जुड़े मामले में विजयपुर की तहसीलदार अमिता सिंह तोमर को बड़ा कानूनी झटका लगा है। देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। इससे पहले उनकी याचिका मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ द्वारा भी अस्वीकार की जा चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब उनकी गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है और प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई है।
यह मामला वर्ष 2021 में आई बाढ़ के बाद पीड़ितों के लिए वितरित की गई राहत राशि में कथित गड़बड़ी से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि सरकारी राहत राशि को फर्जी खातों में ट्रांसफर कर करोड़ों रुपये का घोटाला किया गया। इस पूरे मामले में कई सरकारी कर्मचारियों, पटवारियों और कथित दलालों की भूमिका सामने आई है।
बाढ़ राहत वितरण में कथित अनियमितताएं
साल 2021 में मध्यप्रदेश के कई जिलों में भारी बारिश और बाढ़ से व्यापक नुकसान हुआ था। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए राहत राशि का वितरण किया गया।
श्योपुर जिले में भी बाढ़ से प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए प्रशासन ने कई चरणों में राशि वितरित की। आरोप है कि इसी प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं।
जांच में सामने आया कि उस समय बड़ौदा तहसील में पदस्थ तत्कालीन तहसीलदार अमिता सिंह तोमर सहित कुछ अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों ने कथित तौर पर फर्जी लाभार्थियों के नाम पर बैंक खातों में राहत राशि ट्रांसफर कर दी।
बताया जा रहा है कि लगभग 127 ऐसे बैंक खाते पाए गए, जिनमें बाढ़ पीड़ितों के नाम पर पैसे डाले गए, जबकि वास्तविकता में वे लोग राहत पाने के पात्र नहीं थे। इस तरह करीब 2.57 करोड़ रुपये की राशि का कथित दुरुपयोग किया गया।
ऑडिट में सामने आई गड़बड़ी
यह कथित घोटाला तब सामने आया जब राहत वितरण से संबंधित अभिलेखों की जांच के लिए प्रशासनिक स्तर पर ऑडिट कराई गई।
डिप्टी कलेक्टर द्वारा किए गए इस ऑडिट में कई खातों में संदिग्ध लेन-देन पाए गए। जांच में पाया गया कि कई ऐसे लोगों के खातों में राहत राशि ट्रांसफर की गई, जिनका बाढ़ से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
कुछ मामलों में लाभार्थियों के रूप में ऐसे लोगों के नाम दर्ज पाए गए जो कथित तौर पर अधिकारियों या कर्मचारियों के परिचित या रिश्तेदार बताए गए।
ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर बड़ौदा थाने में मामला दर्ज कराया गया और पुलिस ने विस्तृत जांच शुरू की।
बड़ी संख्या में आरोपी
पुलिस जांच के दौरान इस मामले में कई लोगों की भूमिका सामने आई। जांच एजेंसियों के अनुसार इस कथित घोटाले में तहसील कार्यालय के कर्मचारियों, पटवारियों और बिचौलियों की मिलीभगत थी।
पुलिस ने इस मामले में 100 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया है। इनमें करीब 25 पटवारी भी शामिल बताए जा रहे हैं।
मुख्य आरोपियों में तत्कालीन तहसीलदार अमिता सिंह तोमर का नाम भी शामिल किया गया है।
जांच एजेंसियों का कहना है कि राहत राशि वितरण की प्रक्रिया में जानबूझकर अनियमितताएं की गईं और फर्जी खातों के माध्यम से सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
अग्रिम जमानत के लिए कानूनी लड़ाई
मामले में नाम सामने आने के बाद गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए अमिता सिंह तोमर ने अदालतों का रुख किया।
सबसे पहले उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ में याचिका दायर की। हालांकि अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद उन्होंने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के साथ अग्रिम जमानत की मांग की।
17 मार्च को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत के इस निर्णय के बाद अब उनके सामने कानूनी विकल्प काफी सीमित हो गए हैं।
गिरफ्तारी की संभावना
सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद अब अमिता सिंह तोमर के सामने दो विकल्प बचे हैं।
पहला, वे स्वयं अदालत या पुलिस के समक्ष सरेंडर कर सकती हैं।
दूसरा, यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार जब अग्रिम जमानत की याचिका उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों स्तरों पर खारिज हो जाती है, तो आरोपी की गिरफ्तारी की संभावना काफी बढ़ जाती है।
प्रशासनिक महकमे में हलचल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद श्योपुर जिले के प्रशासनिक महकमे में भी हलचल देखी जा रही है।
क्योंकि इस मामले में कई सरकारी कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, इसलिए जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की भूमिका की जांच कर रही हैं।
अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
केबीसी से मिली थी पहचान
अमिता सिंह तोमर पहले भी कई कारणों से सुर्खियों में रही हैं।
वर्ष 2011 में उन्होंने लोकप्रिय टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति के पांचवें सीजन में हिस्सा लिया था। उस दौरान उन्होंने 50 लाख रुपये जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की थी।
उस समय उनकी सफलता की कहानी काफी चर्चा में रही थी और उन्हें एक प्रतिभाशाली प्रतिभागी के रूप में सराहा गया था।
सोशल मीडिया विवाद
पिछले कुछ वर्षों में अमिता सिंह तोमर सोशल मीडिया से जुड़े विवादों के कारण भी चर्चा में रही हैं।
बताया जाता है कि उन्होंने कुछ पोस्ट और टिप्पणियां साझा की थीं, जिन्हें प्रशासन ने अनुचित माना। इन पोस्टों में कथित तौर पर प्रशासनिक निर्णयों की आलोचना और संविधान से संबंधित टिप्पणियां शामिल थीं।
इन विवादों के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की गई और उन्हें निलंबित किया गया था।
तबादलों को लेकर भी चर्चा
अमिता सिंह तोमर का नाम बार-बार तबादलों को लेकर भी सुर्खियों में रहा है।
उन्होंने अपने स्थानांतरण से जुड़ी शिकायतों को लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था।
बताया जाता है कि उन्होंने प्रशासनिक निर्णयों पर असंतोष जताते हुए कई बार अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।
इस्तीफे की पेशकश
वर्ष 2023 में भी उनका नाम उस समय चर्चा में आया था जब उन्होंने कथित तौर पर तहसील का प्रभार न मिलने से नाराज होकर इस्तीफे का पत्र लिखा था।
हालांकि बाद में इस मामले में क्या निर्णय हुआ, यह स्पष्ट नहीं हो पाया, लेकिन उस समय यह मुद्दा प्रशासनिक हलकों में काफी चर्चा का विषय बना रहा।
जांच जारी
फिलहाल बाढ़ राहत घोटाले के मामले में पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां पूरे प्रकरण की जांच कर रही हैं।
जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि फर्जी खातों में राहत राशि किस प्रकार ट्रांसफर की गई और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका थी।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा।
निष्कर्ष
श्योपुर जिले के कथित बाढ़ राहत घोटाले में तहसीलदार अमिता सिंह तोमर को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया से अग्रिम जमानत नहीं मिलने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
अब उनके सामने सरेंडर करने या गिरफ्तारी का सामना करने की स्थिति बन गई है। दूसरी ओर जांच एजेंसियां पूरे मामले में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही हैं।
यह मामला न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा है, बल्कि यह भी दिखाता है कि आपदा राहत जैसी संवेदनशील योजनाओं में किसी भी प्रकार की अनियमितता को गंभीरता से लिया जाता है।