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दिव्यांगजनों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला—राज्य अधिक दिव्यांगता के आधार पर नहीं कर सकता बहिष्कार,

दिव्यांगजनों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला—राज्य अधिक दिव्यांगता के आधार पर नहीं कर सकता बहिष्कार, 90% दिव्यांग वकील की नियुक्ति का आदेश

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका ने समय-समय पर महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) केवल न्यूनतम पात्रता निर्धारित करता है, लेकिन यह राज्यों को यह अधिकार नहीं देता कि वे अधिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों को बाहर करने के लिए कोई अधिकतम सीमा तय करें।

अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य दिव्यांगजनों को अवसरों से वंचित करना नहीं बल्कि उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराना है। यदि राज्य अधिक दिव्यांगता को आधार बनाकर किसी व्यक्ति को नौकरी से बाहर कर देता है, तो यह न केवल कानून की भावना के विपरीत है बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि 90 प्रतिशत दिव्यांगता वाले एक वकील को सहायक जिला अटॉर्नी (ADA) के पद पर नियुक्त किया जाए।


मामला क्या था

यह मामला हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सहायक जिला अटॉर्नी (Assistant District Attorney – ADA) की भर्ती से जुड़ा था। इस भर्ती प्रक्रिया में दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए पात्रता 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत दिव्यांगता के बीच निर्धारित की गई थी।

याचिकाकर्ता, जो 90 प्रतिशत दिव्यांग हैं, ने इस परीक्षा में भाग लिया और उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए शीर्ष स्थान प्राप्त किया। हालांकि चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण में उन्हें केवल इस आधार पर नियुक्ति से वंचित कर दिया गया कि उनकी दिव्यांगता निर्धारित सीमा से अधिक है।

इस निर्णय को चुनौती देते हुए उन्होंने अदालत का रुख किया। उनका कहना था कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में केवल 40 प्रतिशत दिव्यांगता को “बेंचमार्क डिसेबिलिटी” के रूप में मान्यता दी गई है और इससे अधिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति को बाहर करने का कोई प्रावधान नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा कि कानून का उद्देश्य दिव्यांगजनों को अवसरों से वंचित करना नहीं बल्कि उन्हें समान अवसर प्रदान करना है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में केवल न्यूनतम सीमा तय की गई है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति की दिव्यांगता 40 प्रतिशत या उससे अधिक है, तो उसे बेंचमार्क दिव्यांग माना जाएगा और उसे कानून के तहत मिलने वाले अधिकार प्राप्त होंगे।

अदालत ने कहा कि राज्य द्वारा 60 प्रतिशत की अधिकतम सीमा तय करना पूरी तरह मनमाना है। इससे कानून की मूल भावना ही बदल जाती है।

न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“राज्य को यह अधिकार नहीं है कि वह अधिक दिव्यांगता को आधार बनाकर पात्र उम्मीदवारों को बाहर कर दे। ऐसा करना कानून की परिभाषा को ही बदलने के समान है।”


कार्यक्षमता को आधार बनाने की आवश्यकता

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की पात्रता का निर्धारण केवल दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

इसके बजाय यह देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति की कार्यात्मक क्षमता (Functional Capacity) क्या है और क्या उसे उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) प्रदान करके वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है या नहीं।

न्यायालय ने कहा कि आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल औपचारिक समानता प्रदान करना नहीं है बल्कि वास्तविक और प्रभावी समानता सुनिश्चित करना है।

इसलिए राज्य को यह देखना चाहिए कि दिव्यांग व्यक्ति किस प्रकार अपने कार्य को प्रभावी ढंग से कर सकता है, न कि केवल उसके दिव्यांगता प्रतिशत के आधार पर उसे बाहर कर देना चाहिए।


एडीए पद की प्रकृति पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने सहायक जिला अटॉर्नी के पद की प्रकृति पर भी विचार किया।

न्यायालय ने कहा कि एडीए का मुख्य कार्य:

  • कानूनी सलाह देना
  • न्यायालय में पेशी करना
  • मामलों की कानूनी तैयारी करना

जैसे कार्यों से संबंधित होता है।

अदालत ने कहा कि इन कार्यों में बौद्धिक क्षमता और कानूनी ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई व्यक्ति इन क्षेत्रों में सक्षम है, तो केवल उसकी शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर उसे नौकरी से वंचित करना अनुचित होगा।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता कई वर्षों से सफलतापूर्वक वकालत कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करने में पूरी तरह सक्षम हैं।


संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन

अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ऑफ India ने कहा कि राज्य की कार्रवाई भारतीय संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है।

विशेष रूप से यह कार्रवाई भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 के विपरीत है।

अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता है।

अदालत ने कहा कि अधिक दिव्यांगता के आधार पर किसी व्यक्ति को नौकरी से बाहर करना समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है।


अदालत का अंतिम आदेश

सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सहायक जिला अटॉर्नी के पद पर नियुक्त किया जाए।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि राज्य सरकार दो सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करे।

साथ ही न्यायालय ने कहा कि यह नियुक्ति 19 सितंबर 2019 से प्रभावी मानी जाएगी। इसका अर्थ यह है कि याचिकाकर्ता को उस तारीख से सेवा से संबंधित सभी लाभ प्राप्त होंगे।


राज्य पर जुर्माना

अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में याचिकाकर्ता को न्याय प्राप्त करने में अनावश्यक देरी हुई है।

इसलिए अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को अदा की जाए।


फैसले का व्यापक महत्व

यह निर्णय दिव्यांगजनों के अधिकारों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकारें दिव्यांगता के आधार पर मनमाने प्रतिबंध नहीं लगा सकतीं। यदि कोई व्यक्ति आवश्यक योग्यता और क्षमता रखता है, तो केवल अधिक दिव्यांगता के कारण उसे अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह फैसला सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में समानता और समावेशन के सिद्धांत को मजबूत करता है।


दिव्यांग अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करने का उद्देश्य रखता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस कानून की भावना को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की क्षमता को कम नहीं करती।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का यह फैसला दिव्यांगजनों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 केवल न्यूनतम पात्रता निर्धारित करता है और राज्य को अधिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों को बाहर करने का अधिकार नहीं देता।

इस निर्णय से यह सिद्धांत मजबूत हुआ है कि सार्वजनिक रोजगार में अवसर का निर्धारण केवल दिव्यांगता के प्रतिशत से नहीं बल्कि व्यक्ति की वास्तविक क्षमता और कार्य करने की योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए।

यह फैसला न केवल एक व्यक्ति को न्याय दिलाने का माध्यम बना, बल्कि देशभर में दिव्यांगजनों के अधिकारों और सम्मान को भी नई मजबूती प्रदान करता है।