सूरत दुष्कर्म मामला—नारायण साईं ने गुजरात हाईकोर्ट में दोषसिद्धि को दी चुनौती, कहा: पीड़िता के बयानों में विरोधाभासों को ट्रायल कोर्ट ने नजरअंदाज किया
सूरत के बहुचर्चित दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु नारायण साईं ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अदालत में अपील दायर कर दावा किया है कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयानों में मौजूद कई महत्वपूर्ण विरोधाभासों, बदलावों और सुधारों को नजरअंदाज कर दिया, जिससे उनके साथ न्याय नहीं हुआ।
इस अपील पर मंगलवार को गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ—न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर. टी. वच्छानी—के समक्ष सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान साईं की ओर से पेश हुए वकील ने ट्रायल कोर्ट के फैसले और अभियोजन की कहानी पर कई सवाल उठाए और कहा कि मामले की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सूरत में दर्ज उस आपराधिक मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें नारायण साईं पर एक महिला ने यौन शोषण और दुष्कर्म के गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के अनुसार, कथित घटनाएं वर्ष 2001 के आसपास की हैं, जब पीड़िता एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुई थी।
पीड़िता का आरोप था कि कार्यक्रम के बाद उसे विभिन्न स्थानों पर भेजा गया, जहां आरोपी ने उसके साथ कई बार यौन शोषण किया। उसने यह भी कहा कि उस समय वह भय और दबाव के कारण विरोध नहीं कर सकी।
बाद में वर्ष 2004 में आश्रम छोड़ने के बाद भी उसने काफी समय तक इस घटना के बारे में किसी को नहीं बताया। उसके अनुसार, लंबे समय तक वह मानसिक दबाव और भय में रही। अंततः हिम्मत जुटाकर उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
मामले की सुनवाई के बाद सूरत की सत्र अदालत ने 30 अप्रैल 2019 को नारायण साईं को दोषी ठहराते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने उन्हें दुष्कर्म सहित कई गंभीर धाराओं में दोषी पाया था।
बचाव पक्ष की मुख्य दलीलें
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए। साईं के वकील ने अदालत में कहा कि पीड़िता के अलग-अलग चरणों में दिए गए बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद हैं।
उन्होंने बताया कि पीड़िता के बयान:
- एफआईआर में दर्ज कथन
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 164 के तहत दर्ज बयान
- तथा अदालत में दी गई गवाही
इन तीनों में कई स्थानों पर भिन्नताएं और बदलाव दिखाई देते हैं।
बचाव पक्ष का कहना था कि इन विरोधाभासों का उचित मूल्यांकन किए बिना ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के कथन को अंतिम सत्य मान लिया। उनके अनुसार यह न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं था।
वकील ने अदालत में कहा, “जब किसी गवाह के बयानों में इतने महत्वपूर्ण अंतर हों, तो अदालत का दायित्व होता है कि वह उन पर गंभीरता से विचार करे। केवल एक पक्ष की कहानी को स्वीकार कर लेना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।”
पीड़िता के व्यवहार पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पीड़िता के कथित व्यवहार पर भी सवाल उठाए।
वकील ने अदालत से कहा कि यदि किसी महिला के साथ इतना गंभीर अपराध हुआ हो, तो सामान्यतः वह उस व्यक्ति से दूरी बनाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पीड़िता के साथ ऐसा अत्याचार हुआ था, तो वह बाद में आरोपी के बुलाने पर आश्रम क्यों जाती रही।
वकील ने यह भी कहा कि पीड़िता को कई अवसर मिले थे जब वह घटना के बारे में शिकायत कर सकती थी। उनके अनुसार वह स्वतंत्र रूप से बाहर जाती थी और उसके पास पुलिस या अपने परिवार को बताने का अवसर भी था।
बचाव पक्ष का तर्क था कि इन परिस्थितियों को ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
गवाहों को पेश न करने का आरोप
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
वकील ने कहा कि मामले में कई ऐसे गवाह थे जिनके बयान जांच के दौरान दर्ज किए गए थे, लेकिन उन्हें अदालत में पेश नहीं किया गया। बचाव पक्ष के अनुसार इससे मामले की सच्चाई पर संदेह उत्पन्न होता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जांच प्रक्रिया में कई खामियां थीं, जिनका प्रभाव पूरे मुकदमे पर पड़ा।
बचाव पक्ष का कहना था कि यदि इन सभी पहलुओं का समुचित मूल्यांकन किया जाए, तो आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
अभियोजन पक्ष की कहानी
अभियोजन के अनुसार पीड़िता ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2001 में एक धार्मिक कार्यक्रम के बाद उसे अलग-अलग स्थानों पर भेजा गया। इन स्थानों पर आरोपी ने उसके साथ यौन शोषण किया।
पीड़िता ने यह भी कहा कि उस समय वह मानसिक रूप से बेहद दबाव में थी और आरोपी के प्रभाव के कारण वह खुलकर विरोध नहीं कर सकी।
उसने यह भी बताया कि आश्रम छोड़ने के बाद भी वह लंबे समय तक इस घटना के बारे में शिकायत करने का साहस नहीं जुटा पाई। बाद में परिस्थितियां बदलने पर उसने पुलिस में मामला दर्ज कराया।
अभियोजन का कहना था कि पीड़िता के बयान और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य आरोपी के खिलाफ पर्याप्त हैं।
लंबित अपील का मुद्दा
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी की अपील लंबे समय से लंबित है और इस पर शीघ्र सुनवाई होनी चाहिए।
इस पर गुजरात उच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मामलों में देरी केवल अदालतों की लंबित सूची के कारण नहीं होती। कई बार अन्य प्रक्रियात्मक कारण भी होते हैं।
हालांकि अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी और दोनों पक्षों को अपने-अपने तर्क रखने का अवसर दिया जाएगा।
अदालत की कार्यवाही
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना।
बचाव पक्ष ने जहां पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए, वहीं अभियोजन पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
अदालत ने इस चरण पर मामले के तथ्यों पर कोई अंतिम टिप्पणी करने से परहेज किया और कहा कि सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही निर्णय लिया जाएगा।
अगली सुनवाई की तारीख
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च के लिए तय की है।
इस दौरान अदालत आगे की दलीलें सुनेगी और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करेगी।
सूरत सत्र अदालत का फैसला
गौरतलब है कि सूरत की सत्र अदालत ने 30 अप्रैल 2019 को अपने फैसले में नारायण साईं को दोषी ठहराया था।
अदालत ने कहा था कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य आरोपी के खिलाफ पर्याप्त हैं और उन्होंने पीड़िता के साथ दुष्कर्म सहित कई गंभीर अपराध किए हैं।
इसी आधार पर अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
जेल में बंद आरोपी
नारायण साईं दिसंबर 2013 से जेल में बंद हैं। उनकी गिरफ्तारी के बाद यह मामला देशभर में काफी चर्चा में रहा था।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
कानूनी महत्व
यह मामला न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता, जांच प्रक्रिया की गुणवत्ता और ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन जैसे कई महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे शामिल हैं।
उच्च न्यायालय को अब यह तय करना होगा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में कोई ऐसी त्रुटि है या नहीं, जिसके कारण दोषसिद्धि को रद्द किया जा सके।
निष्कर्ष
सूरत दुष्कर्म मामले में नारायण साईं की अपील पर गुजरात उच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। बचाव पक्ष ने पीड़िता के बयानों में कथित विरोधाभासों और जांच प्रक्रिया की खामियों को आधार बनाकर दोषसिद्धि को चुनौती दी है।
दूसरी ओर अभियोजन पक्ष ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहरा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उच्च न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी तर्कों का मूल्यांकन करते हुए क्या निर्णय देता है।
फिलहाल अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को तय की है, जहां इस बहुचर्चित मामले में आगे की बहस जारी रहेगी।